भाव + राग + ताल = भारत

bharatnatyam

इस हफ्ते के स्पाट में सद्‌गुरु सात समंदर पार के अपने व्यस्त और घटनापूर्ण दौरे का बयान कर रहे हैं। अपनी थकाऊ कार्यक्रम में से फुरसत का थोड़ा-सा वक्त निकाल कर वे लंदन में अपनी पुत्री राधे के साथ कुछ वक्त गुजार सके।

पिछले एक पखवाड़े में मैं पांच अलग-अलग देशों और टाइम-जोन्स से उड़ान भरता हुआ कई तरह की गतिविधियों में व्यस्त रहा हूं। थोड़ी थकान जरूर हुई, लेकिन मजा आ रहा है। पूर्वी तट, खास तौर से वाशिंगटन डीसी में, मैंने बहुत लाभकारी चार दिन बिताए। यह पहला मौका है जब अमेरिका की राजधानी की तरफ मेरा ध्यान गया और मैं यहां का दौरा कर रहा हूँ। सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों में जाना, जो सही मायने में जरूरी न हो, मेरे एजेंडा में नहीं है। लंदन जा कर बड़ी राहत मिली और यहां मैंने बड़ा खुशनुमा वक्त गुजारा, क्योंकि यहां कार्यक्रमों का निर्धारण मेरे अनुकूल था। इन सबसे बढ़िया बात थी लगातार तीन शामें राधे के तीन नृत्य कार्यक्रम देखते हुए बिताना। और फिर चौथी शाम की तो बात ही क्या! प्रीमियर लीग के प्रारंभिक चरण का शानदार फुटबाल मैच देखने का मौका मिला!

  कई साल बाद मैं राधे के साथ चार हफ्तों के लिए एक ही छत के नीचे था। हमेशा घर से गायब और सिर्फ टेलिफोन के जरिए रिश्ता बनाए रखने वाला पिता होने के कारण यहां साथ रहने का नतीजा सचमुच शानदार था। 

यूएसए और यूके का यह दौरा निजी तौर पर बड़ा आनंददायक था, क्योंकि कई साल बाद मैं राधे के साथ चार हफ्तों के लिए एक ही छत के नीचे था। हमेशा घर से गायब और सिर्फ टेलिफोन के जरिए रिश्ता बनाए रखने वाला पिता होने के कारण यहां साथ रहने का नतीजा सचमुच शानदार था। राधे एक सुंदर नवयुवती और एक जीवंत नृत्यांगना बन चुकी है। नृत्यकला की एक शैली के रूप में भरतनाट्यम ने मेरे जीवन में दो-तीन बार दस्तक दी है। जब मैं 18 साल का था, मेरी चाची मुझे एक भावुकता-भरी तेलुगु फिल्म दिखाने अपने साथ जबरदस्ती खींच ले गईं थीं। उस फिल्म की नायिका एक भरतनाट्यम नृत्यांगना थी। इस नृत्यशैली के लचीलेपन और जटिल ज्योमेट्री ने मानो मेरा मन मोह लिया, और मैं इस नृत्यशैली को सीखने के बारे में गंभीरता से सोचने लगा। सौभाग्य से मुझे सही गुरु नहीं मिल पाए और ट्रेकिंग, हैंग ग्लाइडिंग, मोटर साइक्लिंग और दूसरे रोमांचक कामों में लगे रहने के कारण कहीं जाकर नृत्य सीखने का मौका नहीं मिला। इस तरह दर्शक मेरी ‘थक – थई’ से बच गए। फिर बाद में विज्जी ने इसको लाने की नाकाम कोशिश की।

यह देख कर दिल खुश हो जाता है कि राधे इस शानदार नृत्यशैली में पूरी तरह से लगी हुई हैं और इस नृत्यशैली की शानदार ज्योमेट्री और अपने खुद के मनभावन लावण्य से वह दर्शकों को मुग्ध करने की क्षमता रखती हैं। 

 इस राष्ट्र को हमेशा ‘भारत वर्ष’ कहा गया है, यानी भाव, राग और ताल की वर्षा।  

भा – र – त, जिसमें ‘भा’ भावनात्मक बुद्धि का प्रतीक है; यह बुद्धि का समावेशी रूप है, जो विश्लेषण करने वाले ज्ञानात्मक बुद्धि से अलग होता है। पूरब की संस्कृतियों ने हमेशा भावनात्मक बुद्धि को अहमियत दी है, क्योंकि इसका स्वभाव सबको समाहित कर लेने वाला होता है। जिंदगी की ओर इसका रुझान ज्यादा होता है और किसी दूसरे से बेहतर होने की तरफ कम। यह चूहा-दौड़ में जीतने से अधिक मानव संभावना की एक खूबसूरत अभिव्यक्ति ढूंढ़ने के बारे में है।

‘र’ राग या जीवन-सुर का प्रतीक है। यह हमारा बनाया हुआ नहीं, बल्कि सृजन के स्रोत या दिव्य शक्ति का तय किया हुआ है। इसके साथ सुर मिलाना सीख लेना ही जानने की परम स्थिति है।

‘त’ ताल का प्रतीक है। एक ऐसा ताल पा लेना, जो हमें अलग-अलग व्‍यक्तित्‍व देता है, पर सब एक ही सुर पर थिरकें। अपने अस्तित्व की सार्वव्‍यापकता को जानते हुए उस वैयक्तिगत खुशी व उल्लास को प्रकट करना, जो अनूठा है।

यह महज एक नृत्यशैली नहीं, बल्कि यह नाम इस संस्कृति का पर्याय बन गया, इसलिए इस राष्ट्र को हमेशा ‘भारत वर्ष’ कहा गया है, यानी भाव, राग और ताल की वर्षा।

भारत में सिर्फ दो दिन रहने के बाद अब मैं कौतूहल और हलचल-भरी जमीन पर हूं। स्पॉट लिखते-लिखते मेरा नाश्ता ठंडा हो चला है। बचपन के लाड़-प्यार ने गरमागरम खाना खाने की आदत लगा दी – ये कोई अच्छे लक्षण नहीं है।

प्रेम व प्रसाद,

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