भारत कोई भू-भाग नहीं- एक इंसान है

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भारत देश को जमीन के एक हिस्से के रूप में नहीं, एक इंसान के रूप में माना जाता है और हम कहते हैं- ‘भारत माता’। देश के तमाम हिस्से इसके शरीर के अंग हैं।

 

कुछ हजार साल पहले जब पूरी दुनिया में बंजारों या यायावरों की टोलियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी, उस समय भारत संगीत, गणित, खगोल शास्त्र और वैज्ञानकि प्रगति की नई बुलंदियां छू रहा था।
आमतौर पर कोई भी राष्ट्र जाति, धर्म, भाषा या संस्कृति के आधार पर बनता और साथ रहता है। किसी भी राष्ट्र के निर्माण का फाॅर्मूला एकरूपता होती है, लेकिन भारत इस सामान्य से नियम की पूरी तरह अवहेलना करता है। हजारों सालों से भारतवर्ष दो सौ से ज्यादा राज्यों के एक संघ के रूप चलता आया है। महाराजा भरत ने अपने इस साम्राज्य का विस्तार राज्यों को जीत कर के नहीं बल्कि सबको मिला कर के किया।

भारत का शाब्दिक अर्थ है- ‘भा’ यानी भाव, ‘रा’ यानी राग और ‘ता’ यानी ताल, जो कि संगीत व नृत्य के मूलभूत आधार हैं। इस धरती पर कला असाधारण रूप से विकसित हुई। कुछ हजार साल पहले जब पूरी दुनिया में बंजारों या यायावरों की टोलियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी, उस समय भारत संगीत, गणित, खगोल शास्त्र और वैज्ञानकि प्रगति की नई बुलंदियां छू रहा था।

इंसानी एकरूपता पर आधारित न होकर विविधता पर बने अपने इस देश पर हमें गर्व है। अगर हिंदुस्तान की यात्रा करें तो यहां हर पचास किलोमीटर पर लोगों की भाषा और जीवन-शैली बदली हुई मिलेगी। भारत देश को जमीन का एक हिस्से के रूप में नहीं, एक इंसान के रूप में माना जाता है और हम कहते हैं- ‘भारत माता’। देश के तमाम हिस्से इसके शरीर के अंग हैं। हम ऐसी उम्मीद नहीं करते कि हमारी उंगली और नाक एक जैसा व्यवहार करें, लेकिन फिर भी सब साथ हैं। जैसे इनमें एक जैविक एकता होती है, उसी तरह यहां की संस्कृति में एक चैतन्य एकता रही जिसे इस संस्कृति ने पूरी सावधानी से पोषित किया। सारी विविधता एक मजबूत आध्यात्मिक डोर से बंधी रही।

भारत में रहने का मूलभूत आधार है कि यहां हर व्यक्ति, चाहे वह राजा हो, व्यापारी हो या फिर गृहस्थ, सभी के जीवन का परम लक्ष्य है- मुक्ति। यहां तक कि हम स्वर्ग या भगवान की कामना भी नहीं करते, क्योंकि भगवान भी हमारे लिए इस परम लक्ष्य तक बढ़ने का एक जरिया मात्र है। यह देश इस धरती का अकेला भगवान विहीन देश होगा, क्योंकि हमें पता है कि हम ही भगवान बनाते हैं। हमने भगवान बनाने का एक पूरा विज्ञान विकसित किया है, जिसके जरिए हम अपना ‘इष्ट देवता’ बनाते हैं। इस देश की धरती 33 करोड़ देवी देवताओं का निवास मानी गई है।

हमारे देश के नेतृत्व को सही मायने में उस चीज को समझना होगा, जो हमें आपस में एकता के सूत्र में बांध कर रखती है। इस देश के अतीत की महानता की जडे़ इसकी आध्यात्मिक संभावनाओं और योग्यता में धंसी हैं।
भारत में कभी कोई विश्वास प्रणाली या स्थापित नैतकिता नहीं रही है। यहां रही है तो सिर्फ उर्जा से भरी आध्यात्मिकता, जो हमेशा से इस देश का मार्गदर्शन करने वाली शक्ति रही है। फिलहाल भारत के सामने एक खास तरह का खतरा है, जहां बड़े व्यवस्थित तरीके से इस आध्यात्मिकता की डोर को काटा जा रहा है। सबसे बड़ी बात कि हमारे पास नैतिकता का ऐसा कोई ढांचा नहीं है कि जिसके भरोसे हम इस संकट से उबर सकें। अगर हमने इस आध्यात्मिकता को खो दिया तो यह दुनिया का सबसे अनैतिक देश हो उठेगा, क्योंकि हमारे पास पश्चिमी देशों जैसा अपराध बोध भी नहीं है। अगर हमने इस डोर को अपने-अपने विश्वास व अपनी दूसरी तरह की पहचान से काट दिया तो 25 साल बाद हमें इस बात पर हैरानी होगी कि आखिर हम एक राष्ट्र क्योँ हैं और तब हमारा देश टुकड़ों में बंट जाएगा। हमारे देश के नेतृत्व को सही मायने में उस चीज को समझना होगा, जो हमें आपस में एकता के सूत्र में बांध कर रखती है। इस देश के अतीत की महानता की जडे़ इसकी आध्यात्मिक संभावनाओं और योग्यता में धंसी हैं।

इस भारतीय इलाके ने इंसान के अंदरूनी कल्याण के नियमों पर महारत हासिल की हुई है। आज के आधुनिक दौर में दुनिया के तमाम समृद्ध और ताकतवर देश अपने भीतर से भयानक विरक्ति और मोहभंग के दौर से गुजर रहे हैं। हमारे पास वह जानकारी और वैज्ञानिक तरीका मौजूद है, जिसके जरिए सभी का कल्याण हो सकता है। इसके पहले कि इंसान बाहरी उपलब्धियों को हासिल करने के लिए कदम बढ़ाए, उसे अपने भीतर आत्म कल्याण तक पहुंचना बहुत जरूरी है। केवल इसी तरीके से इंसान अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर उठकर अपेक्षाकृत बड़े नजरिए के लिए कोशिश कर सकता है। यह अब इसलिए अति महत्वपूर्ण हो उठा है, क्योंकि पहली बार एक पीढ़ी के तौर पर हम उस स्थिति में पहुंचे हैं, जहां हमारे पास दुनिया के हर एक इंसान की समस्या से निपटने के लिए जरूरी साधन, क्षमता और तकनीक मौजूद है। बस अगर किसी चीज की कमी है तो सिर्फ उस चेतनता की जो सबको शामिल कर के, सबको साथ ले कर चल सके। हम जिसे भारत कहतेे हैं उसका बुनियादी आधार यही सम्मिलित करने की भावना है।

अब वो समय आ गया है कि हम इस गहन परंपरा की महानता का पूरा लाभ ले सकें। हम महान संभावनाओं से भरे हुए एक राष्ट्र हैं। आइए, हम सब इसे साकार करें।

प्रेम व प्रसाद,

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