भक्ति एक बाढ़ है, जो बहा देगी आपकी सारी सीमाएं


भक्ति आखिर है क्या? 17 जनवरी 2014 को थाईपूसम सत्संग के अवसर पर सद्‌गुरु ने बताया सच्ची भक्ति का महात्म्य।

इस प्राचीन धरती ने, इस वैभवशाली देश और इसकी प्राचीन सभ्यता ने गुजरे दौर में जबरदस्त प्रतिभाओं को जन्म दिया है। ये प्रतिभाएं मूल रूप से भक्ति की देन थीं, अध्ययन की नहीं। अपने यहां जितने भी महान वैज्ञानिक, चिकित्सक या गणितज्ञ हुए, वे सभी उच्च कोटि के भक्त थे। दरअसल, जब आप भक्ति करते हैं तो, आप खुद में सबको शामिल कर लेते हैं, जहां आपसे परे कुछ नहीं रहता। भक्त होने का मतलब बोध और बुद्धि के ऐसे धरातल पर पहुंचना है, जहां जाकर आपकी सारी तुच्छता खत्म हो जाती है और आप ईश्‍वरीय संभावना को निमंत्रण देते हैं। भक्त कभी हीरे जड़े सिंहासन पर नहीं बैठता और न ही वह ऐसी चाहत रखता है। उसकी तो सिर्फ एक ही चाहत होती है, ईश्‍वर के करीब पहुंचने की, उसके गोद में बैठने की। इस चाहत में कहीं जाने या पहुंचने का भाव नहीं होता, बल्कि यह तो पूरी प्रकृति के प्रति उसकी बुनियादी समझ में बदलाव भर होता है। भक्ति इंसान के भीतर मौजूद सभी सीमाओं को तोड़ने का एक जबरदस्त साधन है- चाहे मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक सीमाएं हों या कार्मिक बंधन। अगर आपमें भक्ति की धारा बहेगी तो यह बिना किसी खास कोशिश के, आपको इन सभी सीमाओं के पार बहा ले जाएगी।

इंसानी बुद्धि के लिए यह सामान्य सी बात है कि जब भी वह कोई नई या अलग चीज देखता है, उसके भीतर एक कौतुहल पैदा हो जाती है। जैसे अगर कहीं दो-चार फूलों को भी बहुत अच्छे से सजा कर रखा है तो उसको देखकर मन में यह खयाल आता है कि यह किसने किया है। अगर आप कोई खूबसूरत कलाकृति देखते हैं तो आप यह जानना चाहते हैं कि यह किसने बनाई है। अगर आप कोई सुंदर बच्चा देखते हैं तो जानना चाहते हैं कि इसके माता-पिता कौन हैं। लेकिन यह बेहद हैरानी की बात है कि इस सृष्टि जैसी अनुपम कृति को देखकर महज कुछ ही लोगों के मन में यह सवाल आता है कि इसका रचयिता कौन है। बेशक लोगों के पास इसका रेडीमेड जवाब मौजूद है। लेकिन भक्ति कोई रेडीमेड जवाब नहीं है। भक्ति इस सवाल का जवाब पाने का साधन है। भक्ति कोई नतीजा नहीं है, जो भक्त निकालता है। भक्ति इन सभी नतीजों से परे जाने का रास्ता है। भक्ति एक तेज बाढ़ की तरह है जो आपको सीमाओं और बंधन के सभी संभावनों से परे ले जाएगी।

यह बेहद हैरानी की बात है कि इस सृष्टि जैसी अनुपम कृति को देखकर महज कुछ ही लोगों के मन में यह सवाल आता है कि इसका रचयिता कौन है। बेशक लोगों के पास इसका रेडीमेड जवाब मौजूद है। लेकिन भक्ति कोई रेडीमेड जवाब नहीं है।

अगर आपने इन 21 दिनों के लिए खुद को समर्पित किया है तो आपने न केवल खुद को, बल्कि अपने आसपास की जगह को भी शुद्ध कर लिया है। इससे देश व दुनिया को जबरदस्त फायदा होगा। भक्ति कोई 21 दिन करने वाला काम-काज नहीं है। आपको इसकी धारा में रोजाना बहते रहना होगा। भक्ति कोई ऐसी चीज नहीं है, जो आपने कभी की और कभी नहीं की, बल्कि इसे आप जीते हैं। यह आपकी सांस की तरह है। अगर आप दिल में भैरवी की कृपा और उनके चरण-चिन्ह अंकित हो गए तो फिर आपको जीवन में कभी जीत-हार, अमीरी-गरीबी और जीवन-मृत्यु की चिंता नहीं करनी होगी। जो व्यक्ति रचयिता की गोद में किसी तरह पहुंच जाता है, किसी तरह ईश्‍वर की कृपा पाने में सफल हो जाता है, उसके लिए ये सारी चीजें तुच्छ हो जाती हैं। हमारी कामना है कि आपने जो यह प्रक्रिया शुरू की है, वह वाकई आपको अभिभूत कर सके।

तमिलनाडु का प्रतीक मंदिर है। दरअसल, यहां की धरती भक्ति से इतनी ओत-प्रोत है कि आप यहां कहीं भी चले जाइए, आपको एक मंदिर सी अनुभूति होगी। भक्ति यहां के लोगों के जीवन का मुख्य हिस्सा थी। पहले यहां लोगों ने शानदार मंदिर बनाए और फिर अपने रहने के लिए उसके आस पास कुछ झोपडियों की बस्ती बनाई। इन हैरतअंगेज मंदिरों को बनाने में लोगों ने अपनी दो-तीन पीढ़यां लगा दीं, लेकिन वे खुद झोपड़ी और कुटिया में रहे। उन्होंने अपने लिए कभी कुछ परवाह नहीं की, क्योंकि उनके लिए ईश्‍वर की कृपा पाना और सबको उससे जोड़ना कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था।

समय आ गया है कि हम इस धरती पर कुछ ऐसा ही फिर से करें। कृपया इसे अपने साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए साकार कीजिए, क्योंकि हमें जरूरत है भक्ति के एक लहर की। बिना भक्ति के परमानंद को पाना एक मुश्किल काम है। इसके लिए बहुत ज्यादा काम करना होगा। लेकिन भक्ति के साथ परम आनंद को बहुत आसानी से पाया जा सकता है। अगर आप इस धरती और यहां के लोगों को भक्ति के भाव में भिगो दीजिए, फिर देखिए आनंद पाना कितना आसान हो जाता है। यह आसान इसलिए है, क्योंकि भक्ति से भरा दिल काफी उपजाऊ हो जाता है, जिसमें परमानंद का फूल जरूर खिलेगा। कृपया इसे अपने लिए और अपने आस-पास के लोगों के लिए साकार कीजिए।

प्रेम व प्रसाद,

 


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