अपनी सुरक्षा बेल्ट बाँध लें !

sadhguru in plane

मुझे शायद यह बात आपको बता देना चाहिए। बात तकरीबन एक हफ्ते से कुछ पहले की है, मैं जिस हवाई जहाज में यात्रा कर रहा था, वह लगभग दुर्घटनाग्रस्त होते-होते बच गया। यह घटना सम्यमा के दौरान की है, मैं केरल के कोल्लम में एक सम्मेलन के लिए जा रहा था, जहां से मुझे सम्यमा के शाम के सत्र में भाग लेने के लिए दोपहर तक वापस लौटना था। इस सम्मेलन के आयोजकों ने पिछले साल इसकी एक तारीख तय की थी, लेकिन पिछले साल भी सम्यमा से इसकी तारीख टकरा रही थीं, इसलिए मैंने जाने से साफ मना कर दिया। इसलिए उन लोगों ने उसी समय इस साल की यह तारीख तय करते हुए मुझसे कहा था कि हम आपकी तारीख तय कर रहे हैं। हम इसे अवश्य करेंगे। तब मैंने उनसे कहा था, ‘ठीक है, अगले साल मैं इसे खाली नहीं जाने दूंगा।’

सम्यमा को कायदे से शिवरात्रि के पहले होना चाहिए, लेकिन विभिन्न हालातों, निर्माण कार्य और देश के बाहर आने वाले लोगों की सुविधा जैसी वजहों को देखते हुए हमने महाभारत को दिसंबर से फरवरी में खिसकाया और सम्यमा को महाभारत के बाद धकेला। हालांकि संयोग से इस बार फिर सम्मेलन की तारीख सम्यमा से टकरा रही थी, लेकिन मैं इसके लिए एक साल पहले अपनी सहमति दे चुका था। सच कहूं तो एक साल नहीं, बल्कि डेढ़ साल पहले। इसलिए मैंने आयोजकों से कहा कि ‘मैं वहां जरूर आऊंगा। लेकिन अगर मैं सड़क से आता हूं तो मुझे दो दिन लगेंगे, क्योंकि एक तरफ की यात्रा में नौ से दस घंटे लगेंगे। इसलिए मुझे हवाई जहाज से वहां ले चलो और दोपहर बाद तक वापस पहुंचा दो।’ ऐसा कहने के पीछे योजना थी कि सुबह चार बजे यात्रा शुरू करके दोहपर एक बजे तक वापस आ जाएंगे।

हम कोयंबटूर से उड़े। हमारा जहाज जेट क्राफ्ट न होकर, दो छोटे इंजन वाला एक छोटा सा क्राफ्ट था। यह चार सीटों वाला क्राफ्ट था, जिसमें तीन यात्री और दो चालक यानी पाइलट बैठे थे। हम लोग त्रिवेंद्रम की तरफ उड़ चले, जहां हमें उतरना था। वहां से सम्मेलन तक पहुंचने के लिए आगे डेढ़ घंटे की सड़क यात्रा करनी थी। जैसे ही हम हवाई अड्डे पर पहुंचने वाले थे कि सहसा मैंने देखा कि हमारे जहाज के दोनों युवा पाइलटों के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं और वे लगभग जड़वत लग रहे थे। मैंने उनकी तरफ देखा, मुझे उनके चेहरे पर छाए डर का अससास हो रहा था। मैंने उनसे पूछा, ‘क्या कोई गड़बड़ है?’ इस पर उन्होंने फौरन जवाब दिया- बिल्कुल, नहीं सर। लेकिन मैं समझ गया कि वाकई यहां कुछ गड़बड़ है। कुछ समय बीतने के बाद भी वह लगातार बुरी तरह से कोशिश करने में लगा था कि किसी तरह हाइड्रोलिक्स मैनुअली काम करने लगे। तब मुझे अहसास हुआ कि जहाज के उतरने वाले गियर खुल नहीं पा रहे। मैंने चारों तरफ नजर दौड़ाई, मुझे केरल में हर तरफ पानी दिखाई पड़ रहा था। इसलिए मैंने पाइलट से पूछा, ‘बताओ क्या मैं तैराकी वाली पोशाक पहन लूं।’ इस पर उसने जवाब दिया- बिल्कुल नहीं सर। मैं उसे बुरी तरह हाइड्रोलिक्स से जूझते देख रहा था। लेकिन जाहिर है, कोई नतीजा सामने नहीं आ रहा था।

मेरे साथ जहाज में कुमार के अलावा एक और महत्वपूर्ण व्यक्ति सफर कर रहा था। वे लोग किसी बात पर चर्चा कर रहे थे। कुमार को सीट बेल्ट लगाना बिल्कुल पसंद नहीं। आखिर यह एक निजी जहाज था, जहां सीट बेल्ट लगाने के लिए कोई आप पर जोर डालने वाला नहीं होता। तब मैंने कुमार और अपने अन्य सहयात्री से कहा कि कृपया आप लोग अपनी सीट बेल्ट कस लीजिए, ताकि आप सीट से अच्छी तरह जकड़ जाएं। आज सीट बेल्ट बांधना कोई औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह वक्त की मांग है। और फिर हम सबने अपनी-अपनी बेल्टें कस लीं।

मेरे साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि जब भी कोई आपात स्थिति होती है तो यह मुझे रोमांचित कर देती है। उस समय भी मैंने अपने चेहरे पर बड़ी सी मुसकान लिए उनसे कहा- ‘जहाज के उतरने वाले गियर नहीं खुल रहे।’ मैंने उनसे कहा, ‘ऐसे में सबसे अच्छा तो यही होगा कि हम पानी पर उतरें, लेकिन पाइलट हमारी बात नहीं सुनेगा। वह सिर्फ एटीसी यानी एयर ट्रैफिक कंटोल के निर्देश का पालन करेगा। जबकि वे कह रहे हैं कि हम बिना पहियों की मदद के पक्की सड़क पर उतरेंगे। यह एक छोटा जहाज है, जैसे ही यह सड़क का स्पर्श करेगा, यह नष्ट हो जाएगा… किसी कागज की तरह इसकी चिंदियां बिखर जाएंगी।’ मैंने उन लोगों को बताया कि इसका दायां पहिया तो खुल गया है, लेकिन बायां पहिया नहीं खुल पा रहा। अब पाइलट की सबसे बड़ी समस्या है कि अगर वह चाहे भी तो खुले हुए पहिए को बंद नहीं कर सकता। इसके हाइड्रोलिक्स पूरी तरह से फेल हो चुके हैं, जिसकी वजह से पाइलट बायां पहिया खोल नहीं पा रहा और दायां बंद नहीं कर पा रहा।’

मैंने अपने साथियों से कहा, ‘यह एक छोटा जहाज है। अगर पाइलट एक पहिए पर उतरता है तो सबसे पहले इसका बाएं तरफ का इंजन जमीन से टकराएगा ओर उसके परखच्चे उड़ जाएंगे। अगर यह बाहर की तरफ जाता है तो चिंता की कोई बात नहीं, लेकिन अगर यह भीतर की तरफ आया तो हमें जबदस्त टक्कर लगेगी। और फिर जहाज धीमी गति से तो उतर नहीं सकता। जिस सबसे कम गति पर यह उतर सकता है, वह नब्बे किलोमीटीर की है, जबकि इसकी औसत गति नब्बे से एक सौ दस किलोमीटर होती है। चूंकि यह छोटा जहाज है, इसलिए यह टूटने वाला है।’ मैंने कहा, ‘अपनी सीट से जकड़े रहो। देखो, अगर आप सीट के साथ फिसल सके तो ठीक, नहीं तो अगर आप दायीं ओर लुढके तो आपका दाहिना हाथ काम से जाएगा और अगर आप बांयीं ओर लुढके तो बांया हाथ काम से जाएगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना कि आपके पैर ऊपर की ओर हों, ताकि आप चलने फिरने लायक रहें। हो सकता है कि आप कभी लिख न पाओ, लेकिन चल तो पाओगे।’

मैं सेाच रहा था कि मैं बांयीं तरफ जाऊं या दाहिनी तरफ। सीधी तरफ का मतलब हुआ कि मैं कभी लिख नहीं पाऊंगा। मैं पेंटिंग नहीं कर पाऊंगा। जबकि उल्टे हाथ मतलब हुआ कि मैं गोल्फ नहीं खेल पाऊंगा। इसलिए मैं सोच रहा था कि सीधा हाथ गंवाना बेहतर होगा। लेकिन हर व्यक्ति समझ नहीं पाया कि यह वाकई एक आपात स्थिति है। इसलिए मैंने नीचे जमीन की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ‘वह देखो।’ नीचे रोशनी चमकाती दमकलें पहले ही पहुंच चुकी थीं, कई एंबुलेंस तैयार खड़ी थीं। वहां पूरी तरह से आपातकालीन स्थिति घोषित कर दी गई थी। सारा हवाई ट्रैफिक रोक दिया गया था। जबकि पाइलट अपने रेडियो सेट पर बुदबुदा रहे थे। इसके बाद हमारे जहाज ने नीचे की तरफ उड़ान भरने का फैसला किया, ताकि जमीन पर खड़ा एटीसी देख सके कि हमारे जहाज के पहिए नीचे आए हैं या नहीं, क्योंकि हमें कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था। तभी एटीसी ने कहा, ‘पहिए नीचे आ गए हैं लेकिन हम देख नहीं पा रहे कि यह जहाज को थाम सकेंगे या नहीं, उसके आलंब अपनी जगह पर है या नहीं।’

हमारे पाइलट पसीने से तर-बतर और जड़वत हो चुके थे, जिनके मुंह से शब्द नहीं निकल रहा था। तब मैंने उसने कहा कि ‘क्या आप हमें पानी पर उतरने की अनुमति नहीं देंगे या फिर क्या आप हमें पानी पर नहीं उतार सकते। अगर आप नीचे उड़ान भरोगे तो हम पानी में छलांग लगा लेंगे।’ ऐसे में हम आसानी से तैर के पार हो जाते, क्योंकि उसमें कोई बड़ी बात नहीं थी। मान लीजिए अगर यह कोयंबटूर का हवाई अड्डा होता तो कूदने की कोई जगह ही नहीं होती, तब तो हमें जहाज के साथ ही जाना होता। लेकिन यह केरल था, जहां हर तरफ पानी था। इसलिए मैंने कहा, ‘चलो हम इसका फायदा उठाएं।’ लेकिन उसने जवाब दिया, ‘नहीं, हमें एटीसी निर्देशों पर ही चलना होगा।’

दमकलें और एंबुलेंसों को देखकर सबको अहसास हो गया कि यह कोई मजाक न होकर वाकई आपातकालीन स्थिति है। हां, शायद मेरे चेहरे से जरूर यह नहीं लग रहा था कि कोई आपातकालीन जैसी स्थिति है। मैं काफी उत्तेजित था कि सचमुच कुछ होने जा रहा है। मैंने कहा, ‘आज मेरा दिन नहीं है।’ आज विमान का उतरना, आपातकालीन स्थिती में उतारना या पानी पर उतरना कुछ भी हो सकता है। हमें लग रहा था कि हो सकता है कि हम सम्मेलन में ही जा न पाएं। हो सकता है कि हम जख्मी हो जाएं। आज मेरा दिन नहीं है। चूंकि यह मेरा दिन नहीं है, इसलिए यह आपका भी दिन नहीं हो सकता। मुझे इसकी चिंता नहीं थी कि मेरी उंगली टूटेगी या मेरा हाथ। मैं सोच रहा था, जो होगा देखा जाएगा। आखिरकार हमारा विमान रनवे पर उतर ही गया। रनवे पर खडी दमकलें, एंबुलेंसें और अपातकालीन गाड़ियां सभी हमारे विमान के पीछे भागने लगीं। जैसे ही हमारा विमान रुका, वे भी तुरंत हमें घेर कर वहीं खड़ी हो गईं। उन्हें डर था कि कहीं विमान की हाइड्रॉलिक प्रणाली नाकाम न हो जाए।

इसलिए जबरदस्त उत्तेजना थी। तकरीबन एक घंटे तक हम हवाई अड्डे के ऊपर हवा में गोल-गोल चक्कर लगाते रहे। उस दौरान हमारे साधक एक दूसरे को एसएमएस करते रहे कि ‘सद्गुरु का जहाज क्षतिग्रस्त होने जा रहा है।’ तब तक एक बड़ी भीड़ जमा हो चुकी है, जो रोए जा रही थी। फिर हम सम्मेलन में पहुंचे। हमारे आयोजनकर्ता भी रो रहे थे, क्योंकि वह जहाज उन्होंने भेजा था। वहां पहुंचकर हम लिफ्ट में गए… और तभी लिफ्ट फंस गई। फिर हम लिफ्ट से बाहर आकर सीढ़ियों से पहुंचे। खैर, वह सभा जबरदस्त रही। यह सभा वाकई बेहद महत्वपूर्ण थी।

जब सभा खत्म हुई तो हमने देखा कि हमारा जहाज उड़ने लायक नहीं हुआ था, क्योंकि वो तब तक उसे ठीक नहीं कर पाए थे। इसलिए उन्होंने एक दूसरे छोटे जहाज की व्यवस्था की, जो कि एक जेट क्राफ्ट था। हम जाकर इसमें बैठ गए। जैसे ही हम बैठे, कुमार ने सबसे पहले जो काम किया, वह था सीट बेल्ट बांधना। मैं खिड़की से बाहर देखने लगा। कोई मूर्ख हवाई ईंधन को विंग यानी पंख के छोर पर बने मुंह से टंकी में ईंधन भर रहा था। विमान के दोनो पंख पर ईंधन की दो टंकियां होती हैं। एक स्थाई टंकी और दूसरी अतिरिक्त टंकी होती है। वह पहले मुख्य टंकी में तेल भर रहा था। मैं उसे देख रहा था। कुछ समय बाद अचानक उसने ऐसा कुछ किया कि तेल किसी फव्वारे की तरह चारों तरफ बिखरने लगा। लगभग पचास से सौ लीटर तेल सब तरफ बिखर चुका था, काफी तेल हमारे जहाज पर, मेरी खिड़की पर भी पड़ा था। यह देख मैंने बोल पड़ा, ‘कुमार अपनी सुरक्षा बेल्ट खोल लो, किसी भी क्षण हमें भागना पड़ सकता है।’

जब तक ईंधन डालनेवाला व्यक्ति अपना काम खत्म करता, जब तक पाइलट यह सारा दृश्य देख चुका था। जहाज का हाल देख वह बुरी तरह बौखला गया, उसने चारों तरफ हो हल्ला मचा दिया। उसने एटीसी को फोन कर दिया। एक फिर से वही डरावनी आवाज में साइरन बजातीं दमकलें और एबुंलेंस आ धमकीं। ऐसे में अगर इंजन चालू किया जाता तो चारों तरफ आग फैल जाती। खैर फिर दसियों लोगों ने मिल कर जहाज को धकेलना चालू किया। सब उसे धकेलते हुए लगभग आधे किलोमीटर तक दूर ले गए। वहां उन्होंने जहाज पर बिखरे सारे तेल को पोंछ कर साफ किया। उसके बाद जहाज उड़ा और इस तरह हम शाम तक सम्यमा के लिए वापस लौट आए।

देखिए यह मेरी एक बड़ी समस्या है। अगर मैं चेहरे पर मुस्कान लिए लोगों से सबसे गंभीर बात भी कहूं तो वे उसकी गंभीरता को समझ और महसूस नहीं कर पाते। फिर चाहे वह जहाज की क्रैश लैंडिंग की बात हो या ज्ञानप्राप्ति की, लोग उसे समझ ही नहीं पाते। अगर आप रोते हैं, तभी लोगों को इसकी गंभीरता समझ में आती है। लेकिन मैं दर्द या डर की वजह से नहीं रोता, मैं रोता हूं तो खुशी में। मैं उस वक्त रो ही नहीं सकता, जब हालात बेहद गंभीर हों। दरअसल, जब हालात बेहद गंभीर होते हैं तो अपने भीतर से मुझमें एक अजीब सी हंसी फूटने लगती है, क्योंकि इस धरती पर सबसे हैरान कर देने बात यह है कि लोग सेाचते हैं कि वे अमर हैं।

मेरी किस्मत ने अपनी पूरी ताकत के साथ मुझसे खेल खेला, लेकिन वह इतनी ताकतवर साबित न हो सकी कि मेरा खेल खत्म कर सके। चिरनिद्रा में डूबने से पहले मुझे अभी चलना है मीलों दूर…

प्रेम व प्रसाद,

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