साधक का असमंजस: साधना करूं या सेवा?

साधक का असमंजस: साधना करूं या सेवा?
साधक का असमंजस: साधना करूं या सेवा?

लोगों के मन में अकसर यह सवाल आता है कि किसी वजह से अगर साधना और सेवा में से किसी एक को चुनना हो तो किसे चुनें? साधना और सेवा से जुड़े कुछ सवालों के जवाब आइए जानते हैं हम भी-

प्रश्‍न:

अगर मेरे पास समय की कमी है तो मुझे क्या करना चाहिए? जो थोड़ा वक्त मेरे पास है उसमें मैं अपनी साधना करूं या सेवा?

 

सद्‌गुरु:

यह तो हर किसी की समस्या है। साधना तो बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर सेवा करने के उत्साह में आपने अभ्यास करना छोड़ दिया, तो कुछ समय के बाद अचानक एक दिन आप सोचेंगे कि मैं यह सब क्यों कर रहा हूं।

जो भी काम आप अनिच्छा से करते हैं, वह कष्ट बन जाता है। तो ऐसे में आप ही बताइए कि आपके जीवन का हर पहलू, हर सांस, हर कदम, आपका हर शब्द, आप जो भी करते हैं, वह इच्छापूर्वक होना चाहिए या अनिच्छा से?
क्योंकि तब आपको यह पता ही नहीं होगा कि आप यह क्यों कर रहे हैं। आप अभ्यास करते रहिए। यह आपको साफ तौर पर बताता रहेगा कि सेवा करना क्यों महत्वपूर्ण है, और सेवा क्यों करनी चाहिए।

 

अगर आपने अपना अभ्यास छोड़ दिया तो कुछ समय बाद आपका मन और शरीर दोनों आपसे प्रश्न करेंगे – आखिर मैं सेवा क्यों करूं? मैं भी अपने जीवन को उसी तरह मजे में क्यों न बिताऊं जैसे बाकी लोग बिता रहे हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वे लोग मजे में जीवन जी रहे हैं, लेकिन कोशिश तो कर ही रहे हैं। यानी आपके भीतर इस तरह के सवाल उठेंगे। इसलिए अभ्यास तो आपको जारी रखना पड़ेगा, केवल तभी आपको यह बात समझ में आएगी कि सेवा क्यों जरूरी है

प्रश्‍न:

जब मैं ईशा प्रोग्राम में सेवा करने आता हूं तो मेरे अंदर बहुत ज्यादा ऊर्जा होती है। यहां तक कि वही काम जब मैं अपने घर में करता हूं तो मुझे ऊर्जा का वही स्तर महसूस नहीं होता। मैं चाहता हूं कि घर में, ऑफिस में या कहीं भी जो भी काम करुं, वह उसी तरह से करूं जैसे आश्रम में करता हूं। कैसे हो सकता है यह?

 

सद्‌गुरु:

ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि यहां आप यह सब एक समर्पण, एक भेंट के रूप में कर रहे हैं। घर में आप उसे एक काम के रूप में करते हैं, बोझ की तरह करते हैं। काम वही है, यह आप हैं जो इसे या तो परेशानी भरा बना देते हैं या मजेदार; खूबसूरत बना देते हैं या भद्दा। तो जो भी काम आप घर में, ऑफिस में करते हैं, क्यों न उसे भी एक समर्पण की तरह करें। आपको कौन रोक रहा है? मैं आकर आपकी सैलरी नहीं चुरा लूंगा, मैं आकर आपका भोजन नहीं खा जाऊंगा, आप यह सब एक भेंट, एक अर्पण की तरह क्यों नहीं करते? इससे बड़ा खूबसूरत अंतर आ जाएगा। सब कुछ खूबसूरती से होगा सिर्फ  इसलिए नहीं कि आपके नजरिये में बदलाव आ जाएगा, सबसे बड़ी बात यह है कि आप ईश्वरीय कृपा के प्रति ग्रहणशील हो जाएंगे। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आप कृपा को ग्रहण कर पाने की स्थिति में होंगे। अगर यह एक चीज नहीं है, तो कोई भी काम बड़ा कठिन लगेगा। मैं यह नहीं कहता कि काम असंभव हो जाएगा, लेकिन कष्टकारी अवश्य लगेगा। अगर आप कृपा के साथ आगे बढ़ते हैं तो आप बिना किसी खास कोशिश के आनंदपूर्वक बस यूं ही फिसलते चले जाएंगे। अगर आप चलने की कोशिश करेंगे तो यह आपके लिए कष्टकारी यात्रा हो जाएगी।

तो सेवा करने का मतलब बर्तन मांजना नहीं है, न इसका मतलब सब्जी काटने या ऐसे ही दूसरे कामों से है। इसका मतलब है, हर तरह की परिस्थिति के लिए तत्पर रहना, इच्छुक बने रहना।

अगर आपने अपना अभ्यास छोड़ दिया तो कुछ समय बाद आपका मन और शरीर दोनों आपसे प्रश्न करेंगे – आखिर मैं सेवा क्यों करूं?
 अपने जीवन के हर पल आप जो भी करें, वह स्वेच्छा से करें, अनिच्छा से नहीं क्योंकि जिस पल अनिच्छा आती है, उस पल अगर कोई बहुत खूबसूरत चीज भी आपके साथ घटित हो रही होगी, तो वह भी आपको ऐसी लगेगी जैसे जिंदगी आपको परेशान कर रही है। अगर आप इच्छुक हैं तो बड़ी ही अच्छी बात है। इच्छुक होने पर ही आप पर कृपा भी बरसती है। नहीं तो आपको अपने हर कदम को घसीटना पड़ेगा जो कठिन होगा।

प्रश्‍न:

अभी मैं फुलटाइम स्वयंसेवी बनने की स्थिति में नहीं हूं। सत्संग में मैं जाती हूं लेकिन शायद उससे उतना लाभ नहीं मिल रहा है। मैं क्या करूं?

सद्‌गुरु:

आपको निश्चित रूप से फुलटाइम स्वयंसेवी बन जाना चाहिए। बस यही एक तरीका है। अगर आप अपने जीवन में फुलटाइम स्वयंसेवी नहीं हैं तो आपका जीवन दुखदाई होगा। जीने का कोई दूसरा तरीका नहीं हो सकता। अगर आप जीवन में कुछ चीजें स्वेच्छा से कर रहे हैं और कुछ चीजें अनिच्छा से, तो जाहिर है कि आपके जीवन का अनिच्छा वाला हिस्सा आपको कष्ट पहुंचाएगा। जो भी काम आप अनिच्छा से करते हैं, वह कष्ट बन जाता है। तो ऐसे में आप ही बताइए कि आपके जीवन का हर पहलू, हर सांस, हर कदम, आपका हर शब्द, आप जो भी करते हैं, वह इच्छापूर्वक होना चाहिए या अनिच्छा से?

प्रश्‍नकर्ता:

इच्छापूर्वक।

सद्‌गुरु:

इसका मतलब है कि आप फुलटाइम स्वयंसेवी हैं।


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1 Comment

  • Ved Prakash Thawait says:

    साधना का मार्ग असमंजस का नहीं कि साधना करूँ या सेवा-
    साधना व सेवा एक ही सिक्के के दो पहलु है …मनीषी ऋषि आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा जी ने अपने जीवन यात्रा से चरितार्थ है कि अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है | जीवन साधना के तीन चरण उन्होंने दिए है – 1. उपासना – ईश्वर के समीप बैठकर उनके गुणों को आत्मसात करने का भाव/ अभ्यास 2. साधना – सा (वह)+ ध (धैर्य /संयम ) + न (नियोजन)+अ (अभ्यास/आत्मसात)- अपने जीवन में संयम का नियोजन (व्यवहारिक/सामाजिक रूप से संयम / विचारों का /इन्द्रियों, समय का / अर्थ का संयम , जीवन को साधना सही करना सही मार्ग देना , सद्गुणों का अभिवर्धन करना 3. अराधना – सेवा भाव …उपासना साधना से प्राप्त उर्जाओं को सेवा मार्ग में लगाना कल्याण के मार्ग में लगाना | एक साधक का दूसरा रूप सेवा का ही है ..जो वह आत्मिक स्तर के रूप में करता है (शरीर मन आत्मा तीन माध्यम है सेवा के)…साधना सेवा असमंजस का विषय नहीं जहां साधना वहाँ असमंजस नहीं वहाँ दृढ़ संकल्प है फिर चाहे वह साधना भौतिक स्तर की हो या अध्यात्मिक स्तर की| साधना में एक संकल्प होता है जिससे असमंजस की स्थिति समाप्त होती है और व्यक्ति साधक रूप में परिणित होने लगता है जिसकी जैसी चेतना रूपी पुरुषार्थ व स्वाध्याय उसकी वैसी ही साधना बनते जाति है | जीवन देवता की साधना ही वास्तविक साधना है :-)…साधक का सविता को अर्पण शिष्यों का गुरु को समर्पण ….
    #vedprakashthawait

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