साधना: खूब तेजी से करें या फिर सहज

shekhar and sadhguru
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क्या अपने जीवन में तीव्रता लाने का अर्थ यह है कि हम तीव्रता से कोई काम करें? या फिर इसका अर्थ यह है कि हम हमेशा अपने भीतर तीव्रता बनाए रखें, और फिर जो भी काम हमारे सामने आए उसे सहजता से करें? शेखर कपूर के एक सवाल का उत्तर दे रहे हैं सद्‌गुरु…

शेखर कपूरः आपके लिए एक सवाल है सद्‌गुरु। आध्यात्मिकता तीव्रता से समझने और जानने की चीज है। तमाम चीजों में मैं बहुत तीव्रता से काम करता हूं, लेकिन मुझे इस बात का भरोसा नहीं रहता कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूं, वह मेरी आध्यात्मिकता को आगे बढ़ाएगा। मैं अपने रास्ते पर तीव्रतापूर्वक चल रहा हूं। क्या यह गलत है?
सद्‌गुरु: नहीं। किसी चीज को तीव्रता से करने की कोई जरूरत नहीं है। जब आप कहते हैं कि मैं कोई चीज बेहद तीव्रता से कर रहा हूं तो आपके कहने का मतलब होता है कि आप उस चीज के पीछे पागल की तरह लगे हैं। स्वयं में तीव्रता लानी चाहिए, आपको यह देखना चाहिए कि अपने अस्तित्व, अपने मस्तिष्क व अपने वजूद में तीव्रता कैसे लायी जा सकती है। अगर आप इसको (अपनी तरफ इशारा करते हैं) बेहद तीव्र बना लेते हैं, तो आप जो भी करेंगे, उसके अंदर तीव्रता, प्रचंडता व प्रबलता होगी। लेकिन अगर आप चीजों को तीव्रता से करने के चक्कर में पड़े रहेंगे तो जान लीजिए आप बेवकूफी कर रहे हैं। साथ ही, ऐसा करते-करते आप बुरी तरह थक भी सकते हैं। इसलिए किसी चीज को बेहद तीव्रता से करने की जगह आवश्यक यह है कि हम अपने आप को तीव्र और जीवंत बनाएं। अगर हम ऐसा कर पाए तो हम जो भी काम करेंगे, उसमें सहजता और तीव्रता दोनों एक साथ होंगी। बिना सहजता के अगर तीव्रता आ भी गई तो वह बहुत थकाऊ होगी।
शेखर कपूरः बहुत दिलचस्प बात है। मैंने फैसला कर लिया है कि मैं इस बात को अपनी फिल्ममेकिंग में इस्तेमाल करूंगा और देखूंगा कि ये चीजें कैसे काम करती हैं। मैं आपकी बातों से सहमत हूं कि हमारे अंदर तीव्रता होनी चाहिए।

सदगुरुः बिल्कुल। बात यही है कि आपको खुद को तीव्र बनाना चाहिए। चीजों को तीव्रता से करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

शेखर कपूरः सदगुरु, यह सवाल प्रीति की तरफ से है। आजकल हम देखते हैं कि बहुत सारे गुरु हो गए हैं, आध्यात्मिकता के बहुत सारे तरीके हैं और तमाम भक्त भी हैं, लेकिन आत्मज्ञानी बहुत कम हैं। क्या आध्यात्मिकता का रास्ता मुश्किल है या फिर लोगों की कोशिशों में कमी रह जाती है?
सद्‌गुरु: मैं इस सवाल से ही सहमत नहीं हूं। गुरु बहुत ज्यादा नहीं हैं। हां, विद्वान बहुत हैं, टीचर्स बहुत हैं, कपटी और ठग भी बहुत हैं और अच्छे लोगों की भी कमी नहीं है, लेकिन गुरु बहुत ज्यादा नहीं हैं। दूसरा सवाल यह कि आत्मज्ञानी लोगों की तादाद कम क्यों हैं? मैं ऐसा भी नहीं मानता कि ऐसे लोगों की तादाद कम है। ऐसे बहुत से लोग हैं। बात बस इतनी है कि वे इस बात का ढिंढोरा नहीं पीटते कि वे आत्मज्ञानी हैं। उनको आसानी से नहीं पहचाना जा सकता। एक आत्मज्ञानी पुरुष को लेकर आपके जो विचार हैं, उनमें वे फिट नहीं बैठते, क्योंकि आपके विचारों का आत्मज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। आजकल हो यह रहा है कि अगर किसी ने गीता का एक अध्याय पढ़ लिया तो वह गुरु होने का दावा करने लगता है, भले ही वह खुद तक को न जान पाया हो। कोई शख्स अगर दो मंत्रों का जाप करना सीख जाए खासकर पश्चिमी देशों में, तो उसे लगने लगता है कि वह गुरु बन गया।

बात बस इतनी है कि वे इस बात का ढिंढोरा नहीं पीटते कि वे आत्मज्ञानी हैं। उनको आसानी से नहीं पहचाना जा सकता।
यह मानकर चलिए कि आत्मज्ञानी लोगों की तादाद कितनी भी हो सकती है और इन लोगों का अनुभव का स्तर भी अलग अलग हो सकता है। ऐसे लोग अपने साथ ऐसा कोई बैनर लेकर नहीं चलते कि वे आत्मज्ञानी हैं, लेकिन अनुभव और ज्ञान के मामले में उनका कोई जवाब नहीं होता। जब भी कोई गुरु आता है, उसे कहीं न कहीं स्वाभाविक तौर पर कष्ट सहना पड़ता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि आपको लगता है कि आत्मज्ञानी एक ख़ास तरह का शख्स होना चाहिए। लेकिन वह आपकी इस सोच में फिट नहीं बैठता। इसकी वजह यह है कि आपकी जो सोच बनी है, वह उस गुरु की वजह से बनी है, जो कल आपकी जिंदगी में था। कल आए उस गुरु को भी कष्ट सहना पड़ा होगा, क्योंकि उसके विचार उस गुरु से नहीं मिले होंगे, जो उससे एक दिन पहले आपके जीवन में था। आज भी आपको वैसी ही दिक्कत महसूस हो रही है। अब आप किसी और आत्मज्ञानी की तलाश करना चाहेंगे। आप सोचेंगे कि वह बिल्कुल मेरे जैसा हो। आपको ऐसा लगता है कि जो भी आत्मज्ञानी आपके इर्द गिर्द हों, वे सभी एक जैसे हों। ऐसा संभव नहीं है। ज्ञान प्राप्त करना कार्बन कॉपी करने जैसा नहीं है। यह तो फूलों के एक बगीचे की तरह है, जिसमें गुलाब के फूल भी हैं, कमल भी है, चमेली भी है, एक छोटा सा तुंब भी है, जो शिव को बहुत प्रिय है। ऐसा नहीं होता कि आपने बस कमल का फूल देखा और अंदाजा लगा लिया कि आत्मज्ञानी ऐसा ही होता है। यह तय करने का आपके पास कोई रास्ता नहीं है। मैं खुद का उदाहरण देकर समझाता हूं। आपको नहीं पता कि मैं आत्मज्ञानी हूं या नहीं। आपके पास कोई तरीका ही नहीं है यह पता लगाने का। बस आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि मेरे संपर्क में आकर क्या आपके जीवन में कोई बदलाव आ रहा है? क्या इससे आपको कोई फायदा हो रहा है? अगर बदलाव आ रहा है, तो बस मेरे साथ रहिए। इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं आत्मज्ञानी हूं या नहीं।

किसी चीज को जब आप खुद ही नहीं जानते, जिस चीज को आपने महसूस ही नहीं किया है, उसके बारे में भला आप यह कैसे पता करेंगे कि वह चीज किसी दूसरे शख्स के अंदर है या नहीं। तो बस इतना कहना चाहूंगा कि इस चक्कर में मत पड़िएए कि मैं आत्मज्ञानी हूं या नहीं। बस यह देखिए कि मैं आपके लिए उपयोगी हूं या नहीं।
शेखर कपूरः यह सवाल है दर्शकों की तरफ से। दुनिया से हिंसा खत्म हो जाए और यहां शांति की स्थापना हो, इसके लिए तमाम आध्यात्मिक गुरु अपने-अपने तरीकों से काम कर रहे हैं। इस दिशा में आपने क्या कदम उठाए हैं? क्या आपको लगता है कि युद्ध में उलझे देशों के नेताओं पर आपका कोई प्रभाव पड़ सकता है? क्या आपके प्रयासों से शांति की स्थापना हो सकती है?
सद्‌गुरु: देखिये, इस धरती पर दशकों से कुछ बातों को लेकर अलग-अलग तरह के झगड़े रहे हैं। आध्यात्मिक नेताओं और आध्यात्मिक प्रक्रिया का फोकस इस बात पर होता है कि किसी व्यक्ति विशेष के अंदर शांति और आनंद आए। जब मैं कहता हूं कोई व्यक्ति विशेष तो वह कोई भी हो सकता है। वह देश का कोई राजनेता हो सकता है, कोई बिजनेस लीडर हो सकता है या कोई आम आदमी भी हो सकता है। आध्यात्मिक प्रक्रिया का मकसद हर किसी तक पहुंचना है, खासकर उन लोगों तक जो जिम्मेदार और ताकतवर हैं, क्योंकि ऐसे लोग बहुत सारे लोगों की जिंदगी में बदलाव ला सकते हैं। दरअसल, जब आप कोई बड़े राजनेता या कोई बिजनेस लीडर होते हैं तो आप जो कुछ भी बोलते हैं, जो कुछ भी करते हैं, वह लाखों लोगों पर प्रभाव डालता है। आपका एक विचार ही लाखों लोगों को प्रभावित करने के लिए काफी है। जिन लोगों को इस तरह की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई हैं, उन्हें ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिनसे वे भीतर से मजबूत हो सकें। ऐसे लोगों के जीवन में आध्यात्मिक प्रक्रिया होना आवश्यक है, क्योंकि ऐसे लोग जो भी बोलेंगे, उसका लाखों लोगों पर असर होगा। सोचिए, अगर आपके पास ऐसा विशेषाधिकार हो कि आप जो भी कर रहे हैं, उसका लाखों लोगों पर प्रभाव पड़ेगा तो क्या आपका यह कर्तव्य नही बन जाता है कि आप जो भी कदम उठाएं, पूरी जिम्मेदारी के साथ उठाएं? और ऐसा आप तभी कर सकते हैं, जब आपके भीतर किसी तरह की आध्यात्मिक प्रक्रिया चल रही होगी।

भविष्य में आप देखेंगे कि अर्थव्यवस्था से जुड़े इकनॉमिक लीडर्स सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर लोग होंगे। 
हमने लाखों लोगों के साथ काम किया है। हमने जेलों में काम किया है और लोगों की हंसी खुशी को बढ़ाने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए हैं। अब दक्षिण भारत की सभी केंद्रीय जेलों में यह अनिवार्य हो गया है। हमने बड़े नेताओं के साथ काम करने की भी कोशिश की है, खासकर बिजनेस लीडर्स पर हमने काफी फोकस किया है। दरअसल, अगर आज से सौ साल पहले की दुनिया पर नजर डालेंगे तो पता चलेगा कि सैन्य नेतृत्व सबसे ताकतवर नेतृत्व हुआ करता था। लेकिन पिछले सौ सालों के दौरान एक ऐसी स्थिति आ गई है, जहां प्रजातांत्रिक तरीके से चुने गए राजनेता सबसे ताकतवर लोग बन गए हैं, लेकिन यह भी बदलने जा रहा है। यह बदलाव आना शुरू भी हो गया है और अगले 10 से 15 साल के अंदर इसमें और तेजी आएगी। भविष्य में आप देखेंगे कि अर्थव्यवस्था से जुड़े इकनॉमिक लीडर्स सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर लोग होंगे। इस बात को ध्यान में रखते हुए अब मैंने इकनॉमिक लीडर्स के साथ काम करना शुरू कर दिया है। हमें यह बताते हुए खुशी महसूस होती है कि हमने इनके व्यवसाय संबंधी फैसले लेने के तरीको को प्रभावित किया है। हम यह कर रहे हैं, लेकिन बहुत सावधानी से और चुपचाप, क्योंकि यह कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे सार्वजनिक तौर से किया जाए।


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