नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता असली काबिलियत को

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किसी कामयाब नेता के सबसे बेहतरीन सहयोगियों को भी वो सम्मान नहीं मिलता, जो नेता को मिलता है। उन्हें क्या करना चाहिए?

सद्‌गुरु:

नेतृत्व का मतलब है, हर किसी की उन्नति को आसान बनाना। अगर मैं अपनी ही उन्‍नति को आसान बना रहा हूं, तो आप इसे नेतृतव नहीं कह सकते। जब आप अपने आस-पास की बहुत सी चीजों को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं, तभी आप नेता बन सकते हैं। नेता का सहयोग करने वाले प्रतिभावान लोग चित्र-पहेली के छोटे-छोटे खंड के समान होते हैं। अपने आप में उनका कोई अस्तित्व नहीं है। इन लोगों को साथ रखने के लिए एक आधार की जरूरत होती है। अपने आप वे कुछ नहीं कर सकते। अगर कोई नेता नहीं होता, तो इन लोगों को कभी काम में नहीं लाया जा सकता था। वो अपनी प्रतिभा को अभिव्यक्त नहीं कर पाते। हो सकता है उनके पास कोई विशेष प्रतिभा हो, लेकिन उनमें नेतृत्व की क्षमता नहीं होती।

इसलिए अगर किसी को अधिक सम्मान (या तनख्वाह) मिल रही है तो उसकी प्रतिभा के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि वह प्रतिभा का इस्तेमाल करने में समर्थ है। जिस प्रतिभा का इस्तेमाल न हो सके, उसका क्या लाभ? असल में जिस प्रतिभा को काम में नहीं लाया जाता, वह बहुत बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है। इसलिए, हो सकता है कि नेता का आईक्यू या बौद्धिक स्तर तथाकथित प्रतिभाशाली व्यक्ति जितना न हो लेकिन वह इन सभी बुद्धिजिवियों को संभालने में सक्षम है- यही उसकी योग्यता है। उसे इसी बात का सम्मान(या तनख्वाह) मिलता है। आपको अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुसार मिलता है।

आपके जीवन की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि आप जीवन को किस तरह से महसूस करते हैं, न कि इस बात पर कि आपके पास क्या है या आप कहां रहते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि आपकी जिंदगी की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आपको कितनी तनख्वाह मिलती है। मैं यह नहीं कह रहा कि आपको उस पर ध्यान नहीं देना चाहिए। आपको कितने पैसे मिलते हैं, इससे यह तय होता है कि आपके जीवन में कितनी सुख-सुविधा होगी, लेकिन वह आपके जीवन की गुणवत्ता को कभी तय नहीं करता। आपकी ज़िंदगी की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि आप जो काम कर रहे हैं, उसे कितनी खुशी से कर रहे हैं। अगर आप पूरे समर्पण के साथ काम कर रहे हैं और उतने ही प्रतिभाशाली हैं, जितना कोई दावा करता है, और आप वास्तव में अपनी बेहतरीन क्षमता के साथ कामयाबी हासिल कर रहे हैं, तो आप अपने समूह के लिए अनिवार्य हो जाते हैं।

इसलिए मेरे ख्याल से तनख्वाह में बढ़ोत्तरी के बारे में सोचने की बजाय, लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वह संस्था के लिए इतने जरूरी हो जाएं कि लोग उनके बिना स्थिति को संभालने की कल्पना भी न कर पाएं। वैसे चाहे कुछ भी हो जाए, काम चलता रहता है। कल सुबह अगर मेरी मृत्यु हो जाए या आपकी मृत्यु हो जाए, तो दुनिया फिर भी आराम से चलती रहेगी। इसके बारे में कोई भ्रम न पाले। लेकिन लोगों को लगना चाहिए कि आपके बिना जीवन कैसे चलेगा, काम कैसे चलेगा। अगर लोगों को ऐसा लगेगा तो आपको अच्छा सम्मान मिलेगा। लेकिन असली ईनाम आपकी वह खुशी है, जो आपको अपना काम करके मिलती है, वह नहीं जो महीने के अंत में आपको मिलता है।

महीने के अंत में आपको जो मिलता है, वह बस कुछ चीजों को आसान बनाता है। जैसे उससे यह तय हो सकता है कि आप किस तरह के मकान में रहेंगे, किस तरह की कार चलाएंगे लेकिन आप उस कार को कितनी खुशी के साथ चलाएंगे, यह उससे तय नहीं होता। उस घर में कितने आनंद से आप रहेंगे यह उससे तय नहीं होता। आपके जीवन की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि आप जीवन को किस तरह से महसूस करते हैं, न कि इस बात पर कि आपके पास क्या है या आप कहां रहते हैं। इसलिए एक बार आप अपने जीवन की गुणवत्ता तय कर लें और आपका खुश रहने का स्वभाव हो, तो आप अपनी बेहतरीन क्षमता में काम करेंगे और आपको अपनी योग्यताओं का ईनाम मिलेगा। आज या कल इसका फल मिलना ही है।

कभी-कभी मंदी आ सकती है। कभी आपको अपनी मौजूदगी का एहसास कराने के लिए थोड़ा शोर करना पड़ सकता है क्योंकि यह एक बड़ी तस्वीर है, हो सकता है कि आप पर नजर न पड़े। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि आप जीवन का आनंद उठा रहे हैं या बस ज़िंदगी काट रहे हैं? आप भले हर महीने दस लाख डॉलर कमा रहे हों लेकिन दुखी हों, तो उसका क्या फायदा? क्योंकि आप ज्यादा नहीं खा सकते, अगर आप ज्यादा खाएंगे, तो आपको ज्यादा काम करना पड़ेगा वरना आप बीमार हो जाएंगे।

वे मुझे मारुति में ले जाएंगे या मर्सीडीज बेंज में, मेरे लिए दोनों बराबर हैं क्योंकि मैं दोनों की सवारी का आनंद लेता हूं।
आप सिर्फ इतना ही कर सकते हैं। कोई आपकी प्रतिभा के अनुरूप आपके लिए ऐसा अवसर उत्पन्‍न करता है, जहां आपकी प्रतिभा को पूरी अभिव्यक्ति मिले, तो क्या यह एक वरदान नहीं है? महीने में क्या मिलता है, यह आपके दिमाग में भी नहीं होगा। उसे तो वैसे भी मिलना ही है।

आपको पता होगा कि हमारा संगठन पूरी तरह स्वयंसेवकों की मदद से चलता है। हमारे पास 2000 से अधिक फूलटाइम और दस लाख से अधिक पार्टटाइम स्वयंसेवक हैं। इसका मतलब यह है कि किसी को भी पैसे नहीं मिलते, मुझे भी नहीं। मैं देश से बाहर जाता हूं, यात्रा करता रहता हूं। मेरी जेब में एक डॉलर भी नहीं होता है। मुझे एक क्रेडिट कार्ड दिया गया है जिसे मैंने पिछले आठ सालों में इस्तेमाल नहीं किया है। मुझे यह भी नहीं पता कि यह चल रहा है या नहीं। लेकिन जैसे ही मैं कहीं पहुंचूंगा, कोई न कोई मेरा ध्यान रखेगा, कोई मुझे ले जाएगा। यह मायने नहीं रखता कि मैं कहां जाता हूं, दुनिया के किस हिस्से में जाता हूं, कहीं भी मेरा ख्याल रखा जाएगा। ऐसा इसलिए नहीं है कि मैं गुरु हूं। ऐसा इसलिए कि आप इसकी परवाह नहीं करते। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वे मुझे मारुति में ले जाएंगे या मर्सीडीज बेंज में, मेरे लिए दोनों बराबर हैं क्योंकि मैं दोनों की सवारी का आनंद लेता हूं। आपको पता है कि हमारा 70 फीसदी काम तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में होता है। इसलिए वहां कैसी भी स्थिति हो सकती है। मैं दुनिया के सबसे बढ़िया घरों में रहा हूं, मैं धरती के सबसे गरीब घरों में रहा हूं। मतलब सिर्फ इस बात से है कि आप वही कर रहे हैं जो करना आपको अच्छा लगता है, और यह एक बहुत अच्छी बात है।

अंत में आपको क्या मिलता है, यह अहम नहीं है। अंत में तो आपको बस कब्र का एक पत्थर मिलता है। भारत में तो वह भी नहीं मिलता। आपको जला दिया जाता है।

अंत में आपको क्या मिलता है, यह अहम नहीं है। अंत में तो आपको बस कब्र का एक पत्थर मिलता है। भारत में तो वह भी नहीं मिलता। आपको जला दिया जाता है। अंत में, आपको कुछ नहीं मिलता। आखिरी नतीजा क्या है? आखिरी नतीजा कुछ भी नहीं है। ज़िंदगी का मतलब है कि आप अभी उसे कैसे जी रहे हैं। महीने के अंत में या आपकी ज़िंदगी के अंत में क्या होता है, यह समस्या नहीं है। आपको चंदन की लकड़ी पर जलाया जाए या जंगली जानवरों के आगे फेंक दिया जाए, क्या फर्क पड़ता है? आपने ज़िंदगी कैसे जी, यही मायने रखता है। इसलिए उस खुबू के लिए महीने के अंत का इंतजार न करें। ज़िंदगी की खुशबू इसी पल मौजूद है।


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