गर्भावस्था के समय बच्चे में दोष पता चलने पर क्या करें?

गर्भावस्था के समय बच्चे में दोष पता चलने पर क्या करें?

सद्‌गुरुबायोटेक्नोलॉजी की कंपनी ‘बायोकॉन लिमिटेड’ और आई आई एम बेंगलुरु की चेयरपर्सन डॉ किरन मजूमदार शॉ ने सद्गुरु से बातचीत की। पेश है उस संवाद की पहली कड़ी जिसमें वे सद्‌गुरु से असामान्य पैदा हुए बच्चों के बारे में सवाल पूछ रही हैं:

डॉ.किरण मजूमदार शॉ: आजकल कुछ युवा दंपतियों को गर्भावस्था के टेस्ट के समय पता चलता है कि बच्चे में कोई जेनेटिक डिफेक्ट्स यानी, आनुवांशिक दोष है। कुछ दंपति पूछते हैं कि क्या इस बच्चे को दुनिया में लाना चाहिए क्योंकि उस बच्चे को अपनी पूरी जिंदगी और उसके साथ उसके मां-बाप को भी कष्ट भोगना पड़ेगा। कुछ लोगों को लगता है कि इस बच्चे का दुनिया में आना भगवान की मर्जी है। साफ  है कि इस निर्णय में कुछ सही या गलत नहीं है। ऐसे युवा दंपतियों को आप क्या सलाह देंगे?

बच्चे हमारी मर्जी से दुनिया में आते हैं

सद्‌गुरु : देखिए बच्चा भगवान की नहीं, आपकी मर्जी से दुनिया में आता है। यह बुनियादी बात आपको समझ लेनी चाहिए। अब मान लेते हैं कि बच्चा सामान्य नहीं पैदा हो रहा।

आपने कभी प्रकृति में किसी पशु को बिना पैरों के साथ जीते नहीं देखा होगा। ऐसी किसी विकृति वाला जानवर थोड़े दिनों में ही मर जाता है।
लेकिन ‘सामान्य’ क्या है, यह कौन तय करेगा? मान लीजिए, हम सभी के पास एक पैर नहीं होता। फि र हमें लगता कि एक पैर होना सामान्य बात है। इसलिए हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाना चाहिए कि क्या सामान्य है और क्या नहीं। जो भी आपकी तरह नहीं दिखता, वह आपके लिए असामान्य है। सामान्य-असामान्य की बात करना गैरजरूरी है, जब तक कि कोई ऐसा जन्मजात दोष न हो जिससे बच्चे को बहुत कष्ट सहना पड़े। आपको समझना चाहिए कि इस धरती के सभी प्राणियों के साथ ऐसा है कि अगर वे जीने के लिए फिट नहीं हैं, तो उनका जीवन वैसे ही समाप्त हो जाएगा। आपने कभी प्रकृति में किसी पशु को बिना पैरों के साथ जीते नहीं देखा होगा। ऐसी किसी विकृति वाला जानवर थोड़े दिनों में ही मर जाता है।

भौतिक तन्त्र में गड़बड़ हो सकती है

कोई मुझे एक प्रीनेटल लेबोरेटरी में ले गया जहां इंक्यूबेटर रखे थे। इनमें कुछ बच्चे ऐसे थे जो पांच, साढे पांच महीने में पैदा हुए थे। वे इंसान जैसे दिखते भी नहीं थे। 

जब उसमें गड़बड़ी आती है, तो चाहे हमने उसके साथ कितनी भी भावनाएं जोड़ी हों, हमें सिर झुकाकर उसे स्वीकार कर लेना चाहिए और कहना चाहिए, ‘ठीक है, इसमें गड़बड़ हो गई।’
इंक्यूबेटर में ढाई से तीन साल उन्हें रखकर बचाने की कोशिश की जाती है। इसके पीछे जीवन बचाने की चिंता नहीं है, यह एक गलत तरह का कारोबार है। मुझे दुख है कि मैं ऐसा कह रहा हूं मगर मुझे यह पूरी तरह गलत लगता है, क्योंकि जब आप साफ तौर पर जानते हैं कि यह व्यक्ति कभी पूर्ण विकसित इंसान नहीं बन सकता और यह जीवन भर कष्ट उठाएगा, उसके साथ रहने वाला हर कोई परेशानी में रहेगा तो आप प्रकृति के खिलाफ जाकर कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं।

आपको समझना चाहिए कि इस विशाल ब्रह्मांड में यह सौर मंडल एक नन्हा सा कण है। उस नन्हें से कण में हमारी धरती एक सूक्ष्म कण की तरह है। उस सूक्ष्म कण में कोई एक शहर बेहद सूक्ष्म कण है। मगर उस शहर में रहने वाले आप – एक बड़े आदमी हैं! यह एक गंभीर समस्या है। समस्या यह है कि हम अपने बारे में कुछ ज्यादा ही सोचते हैं। यह सारी समस्या इसलिए है क्योंकि हमारी पहचान अपने शारीरिक बनावट से बहुत गहराई से जुड़ी है। हमारे अंदर कुछ खास तरह के विचार और भावनाएं होती हैं और हमने उन सभी को अपने शरीर के साथ जोड़ दिया है। हमें लगता है कि यह शरीर बहुत बड़ी चीज़ है। भौतिक शरीर एक तंत्र है। यह तंत्र कभी-कभी निर्माण की प्रक्रिया में ही गड़बड़ हो सकता है। जब उसमें गड़बड़ी आती है, तो चाहे हमने उसके साथ कितनी भी भावनाएं जोड़ी हों, हमें सिर झुकाकर उसे स्वीकार कर लेना चाहिए और कहना चाहिए, ‘ठीक है, इसमें गड़बड़ हो गई।’

क्या उस जीवन के लिए यह निर्णय सही है ?

तो आप इसे नैतिकता, निष्ठा और न जाने कई और नजरिए से देखते हैं, मगर आपको सिर्फ  यह देखना चाहिए कि उस जीवन के लिए यह निर्णय सही होगा या नहीं। इसके आधार पर आपको फैसला करना चाहिए।

यह पूरी तरह अमानवीय है क्योंकि यह उस जीवन के लिए अच्छा नहीं है, यह उसके लिए एक सजा है। इसलिए चाहे यह फैसला कितना भी मुश्किल हो, आपको करना चाहिए।
हो सकता है कि यह सुनने में बहुत कठोर और निष्ठुर लगे, हो सकता है कि मेरी बात आपको धर्म के खिलाफ  लगे, जीवन का अनादर लगे लेकिन यदि आपके मन में जीवन के प्रति सम्मान है तो आपको यह पक्का करना चाहिए कि वह जीवन एक संपूर्ण जीवन हो, आधा-अधूरा नहीं। जीवन का अर्थ है कि उसे अपने दम पर टिके रहने में समर्थ होना चाहिए। हो सकता है कि हम सब काबिलियत के मामले में बराबर न हों लेकिन हर कोई अपना जीवन जीने के काबिल है। इतनी काबिलियत उस जीवन में भी होनी चाहिए। प्रकृति ऐसी ही होती है। हमने शहरों और मेडिकल उद्योग वगैरह के अपने इकोसिस्टम बना लिए हैं, इसलिए हम पंद्रह-बीस फीसदी ज्यादा खींच सकते हैं। मगर उसे सौ फीसदी तक मत खींचिए कि ‘चाहे मेरे बच्चे के अंदर दस ट्यूब लगी हों, मैं उसे सौ साल तक जिंदा रखूंगा।’ यह पूरी तरह अमानवीय है क्योंकि यह उस जीवन के लिए अच्छा नहीं है, यह उसके लिए एक सजा है। इसलिए चाहे यह फैसला कितना भी मुश्किल हो, आपको करना चाहिए। इसमें नैतिकता की कोई बात नहीं है यह बस जीवन के बारे में एक व्यावहारिक समझ है। मान लेते हैं कोई बच्चा आधे सिर या ऐसी किसी विकृति के साथ पैदा होता है, तो क्या वह कामचलाऊ जीवन भी जी सकता है, अगर अच्छे जीवन की बात न भी करें? इसलिए आपको समझदारी से फैसला करना चाहिए। यह सोच सही नहीं है कि ‘यह मेरा बच्चा है, इसे किसी भी कीमत पर जिंदा रहना होगा।’ क्या आप जानते हैं, दुर्योधन का जन्म इसी तरह हुआ था। दुर्योधन की मां ने मांस का एक लोथड़ा पैदा किया था, जिसका कोई मानव-रूप नहीं था। फिर उसे करीब सौ टुकड़ों में काटकर किसी तरह के घोल में रखा गया। हर टुकड़ा एक-एक बच्चे में बदल गया। इसके बाद कितनी मुसीबतें आई!


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