पहाड़ी रास्तों का सफ़र

कैलाश उत्तरी दृश्य

सद्‌गुरु अपनी कैलाश यात्रा के दौरान नेपाल में हैं, जहां से उस देश की खासियत, और कैलाश के अपने स्नेह के बारे में लिख रहे हैं…पेश है आपके लिए इस बार का स्पॉट-

नेपाल अपने आप में एक अनूठा देश है, यह पूरी दुनिया में अपनी तरह का अकेला देश है। सांस्कृतिक रूप से यह कुछ वैसा ही है, जैसा भारत विदेशी हमलों से पहले हुआ करता था।

एक बार फिर से काठमांडू में हूं, जहां आना मुझे हमेशा सुखद लगता है। भारत व नेपाल के बीच में लंबे समये से रिश्तों को और बेहतर बनाने की जरूरत थी। यह देखकर खुशी हुई, कि इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा से हो चुकी है। इस यात्रा में उन्होंने अपने स्टाइल में जिस तरह से नेपाल को एच. आई. टी. (एच. हाइवेज, आई. इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, व टी. ट्रांसमिशन लाइंस) देने का इरादा व्यक्त किया, उसने नेपाल का दिल जीत लिया।

नेपाल अपने आप में एक अनूठा देश है, यह पूरी दुनिया में अपनी तरह का अकेला देश है। सांस्कृतिक रूप से यह कुछ वैसा ही है, जैसा भारत विदेशी हमलों से पहले हुआ करता था। हालांकि राजनैतिक रूप से वहां का पिछला दशक बेहद उथल-पुथल भरा बीता है। लेकिन अब राजनैतिक स्थिरता आने व भारत से उचित सहयोग मिलने के बाद, नेपाल को – बिना अपनी मौलिक सांस्कृतिक पहचान खोए – आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहिए। नेपाल अगर अपने सांस्कृतिक जड़ों की तरफ वापस पलटता है, तो उससे भारत को भी कुछ फायदा होगा।

हम लोग अगले दो दिनों में सिमीकोट से हिल्सा वाले पहाड़ी रास्ते पर होंगे। आने वाले आठ दिनों में स्वर्ग और नर्क दोनों का अनुभव होने वाला है। आंखों को तो स्वर्ग की अनुभूति होगी और पैरों को नरक की। खासकर, मेरे पैरों की हालत ठीक नहीं है, जिसमें इन दिनों चोट लगी हुई है। ऐसे में जो रास्ता हमें पार करना है, वह पैरों के लिए तो कतई ठीक नहीं माना जा सकता। लेकिन कैलाश का मोह व आकर्षण इन सारी पीड़ाओं और छटपटाहट पर भारी पड़ने वाला है।

हे कैलाश

हिम की तरह,

मैं आता हूं और जाता हूं

हिम की तरह,

तुम्हारे कदमों तले पिघल जाता हूं

हिम की तरह,

मैं तुम्हें संवारता हूं

मैं तुम्हारी पादुका भी हूं और ताज भी

बस कोशिश यही है मेरी

तुम्हारे लिए वही बनने की

जो हो तुम – मेरे लिए.

 

आता रहूंगा तुम्हारे पास तब तक

जब तक ताकत है मेरे सीने में

जीवन-श्वांस चलाने की

ताकत है मेरे पैरों में –

धरती माँ के आलिंगन के

दबाव को झेलने की,

 

कहीं भूल न कर बैठना

मेरे दक्षिणी मूल को जोड़ने की

लंकापति दशानन के दंभ से

 

अपनी निरी अनुपस्थिति से ही

थाम लूंगा मैं तुम्हें और ले जाऊंगा

विन्ध्य के दक्षिण में

चाहा है तुम्हें अटल भक्ति से

इस सौम्य भूखण्ड के

प्राचीन लोगों ने

काफ़ी समय से

धड़कते हैं उनके उर में एक ही भाव

जो है तुम्हारे, तुम्हारे और तुम्हारे लिए.

प्रेम व प्रसाद,

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