नोटबंदी – क्या फायदे मिलेंगे हमें इसके?


सद्‌गुरु500 और 100 के नोटों की बंदी को कुछ समय हो चूका है। जानते हैं इसके अलग-अलग आयामों के बारे में और कर देने और चुराने के बारे में भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित अब तक के सबसे बड़े नोटों की नोटबंदी को अब तीन हफ्ते हो चुके हैं। आशा करता हूं कि कारोबार की दुनिया और आम लोग एक-दो महीनों में शुरुआती दिक्कतों और पैसों की किल्लत के उबर जाएंगे, संभव है ज्यादा समय भी लगे।
राजनैतिक दृष्टि से सरकार के लिए यह फैसला काफी जोखिमभरा था। इस बात को लेकर वे जागरुक भी थे। पूरी जागरुकता में, सोच-समझ कर उठाया गया कदम था यह। इस कदम के पीछे एक मकसद देश में मौजूद नकली नोटों को खत्म करना है। रिजर्व बैंक के अनुमान के मुताबिक दस लाख में ढाई सौ यानी 0.025 प्रतिशत नकली नोट चलन में हैं।

कुछ साल पहले जिन प्रिंटिंग प्रेसों में हमारी मुद्रा छपती थी, उन्हीं प्रेसों में नकली नोट छापे गए। ये नकली नोट इतनी होशियारी से तैयार किए गए थे कि कभी-कभी तो बैंक भी इन नकली नोटों को पहचान नहीं पाए।
मेरा मानना है कि भारत में नकली नोटों की मात्रा इस अनुमान से कहीं ज्यादा है। देश में चल रहे ये नकली नोट किसी मामूली प्रेस में नहीं छपे थे, बल्कि देश के बाहर बाकायदा नोट छापने वाली टकसाल में तैयार किए गए थे। कुछ साल पहले जिन प्रिंटिंग प्रेसों में हमारी मुद्रा छपती थी, उन्हीं प्रेसों में नकली नोट छापे गए। ये नकली नोट इतनी होशियारी से तैयार किए गए थे कि कभी-कभी तो बैंक भी इन नकली नोटों को पहचान नहीं पाए।
इस नोटबंदी का एक आयाम और था – काले धन की समस्या से निबटना। मेरा मानना है कि इस दिशा में यह कदम सिर्फ कुछ हद तक ही मदद करेगा। हो सकता है कि इससे सिर्फ 25 से 40 फीसदी काला धन ही बाहर निकाला जा सके, बाकी का काला धन कोई न कोई दूसरा रास्ता तलाश लेगा। अफसोस की बात है कि इस देश में रोजमर्रा के कारोबार और लेन-देन का लगभग 50 फीसदी हिस्सा अभी तक कर-अधिकारियों की निगाह से बचा कर होता है। हमारी छिपी अर्थव्यवस्था का कम से कम तीस से चालीस प्रतिशत हिस्सा अब अधिकारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हो जाएगा। इन आयों को कर के दायरे में लाने से हमें विश्व समुदाय के सामने अपने देश की आर्थिक मजबूती को दिखाने का मौका मिलेगा, जो कि अपने आप में महत्वपूर्ण है।
जब अंग्रेज भारत में आए तो उन्होंने जिला प्रशासक को ‘कलेक्टर’ कहना शुरू कर दिया, क्योंकि उनका सिर्फ एक ही काम हुआ करता था – लोगों से कर वसूलना, न कि उन्हें किसी तरह की सेवा देना। यह बेहद अफसोस की बात है कि हमने आज भी उसी शब्दावली को बरकरार रखा है।
इसका मतलब है कि अभी तक की सवा दो ट्रिलियन डाॅलर की हमारी अर्थव्यवस्था अचानक लगभग तीन ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था हो जाएगी। अब यह सही वक्त आ गया है कि बतौर एक देश हम सब मिलकर काम करें। भारतीय अर्थव्यवस्था को एक स्थायित्व देने और इसके निखार के लिए हमें अस्थायी मुश्किलों के इस दौर से गुजरना होगा। इसके लिए जरूरी है कि हमारे आर्थिक लेन-देन का बाकायदा लेखाजोखा हो और उस पर टैक्स लगे।
भारत में हमेशा से कारोबार होता रहा है। प्राचीन काल से ही, राजा महाराजाओं के समय से ही कर लगता आया है। जब अंग्रेज भारत में आए तो उन्होंने जिला प्रशासक को ‘कलेक्टर’ कहना शुरू कर दिया, क्योंकि उनका सिर्फ एक ही काम हुआ करता था – लोगों से कर वसूलना, न कि उन्हें किसी तरह की सेवा देना। यह बेहद अफसोस की बात है कि हमने आज भी उसी शब्दावली को बरकरार रखा है।

पीढ़ियों से हम सोचते आए हैं कि अगर आप कर देने से बच निकलते हैं तो आप स्मार्ट हैं। अपनी कमाई का एक हिस्सा सरकार चलाने के लिए देने का विचार अभी भी हमारी मानसिकता में गहराई तक उतरा ही नहीं है। यह सोच किसी आपराधिक इरादे से नहीं है, बल्कि लोगों को इस बात का अहसास ही नहीं है कि जनहित के कामों के लिए कर देना जरूरी है।

मानसिक तौर पर हम अभी भी आजादी से पहले के दौर में अटके हुए हैं, जब कानून तोड़ना गर्व की बात, वीरता और राष्ट्रभक्ति माना जाता था।
उन्हें लगता है कि जनहित में काम करने का तरीका यही है कि किसी मंदिर, किसी गरीब को या अनाथ आश्रम को दान कर दो। यही वजह है कि अभी तक देश एक ऐसी भौगोलिक इकाई भर है जहां विभिन्न समुदायों के लोग रहते हैं। यहां लोग अपने समुदायों में एक दूसरे की मदद तो कर सकते हैं, लेकिन उस दायरे से बाहर जा कर मदद नहीं करते। कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो हज़ारों करोड़ रुपये जमा किए बैठे हैं। उन्हें लगता है कि पैसा एक तरह की वस्तु है, जिसे इकट्ठा किया जाना चाहिए। पैसा कोई वस्तु नहीं है, बल्कि यह लेन-देन का सिर्फ एक जरिया है। लेन-देन के साधन को एक जगह ठहरने की बजाय गतिशील रहना चाहिए। इतना ही नहीं, देश में कई लोग सोचते हैं कि कानून तोड़ना ठीक है। मानसिक तौर पर हम अभी भी आजादी से पहले के दौर में अटके हुए हैं, जब कानून तोड़ना गर्व की बात, वीरता और राष्ट्रभक्ति माना जाता था। महात्मा गांधी ने रास्ता रोको, बंद व हड़ताल जैसी तमाम चीजें जबरदस्त उत्साह, ऊर्जा व निपुणता के साथ कीं।

लंबे समय तक हम एक गुलाम देश थे, जहां प्रशासन हमारे विरुद्ध था। नतीजा, जिन लोगों ने कानून तोड़ा, वे हमारे हीरो बन गए। यह रवैया और सोच तब के लिए तो ठीक थी, लेकिन आज हमें यह समझने की जरूरत है कि वह समय बहुत पीछे चला गया। हम आज भी एक ऐसी स्थिति में हैं, जहां हम एक राजा चाहते हैं।

लंबे समय तक हम एक गुलाम देश थे, जहां प्रशासन हमारे विरुद्ध था। नतीजा, जिन लोगों ने कानून तोड़ा, वे हमारे हीरो बन गए। यह रवैया और सोच तब के लिए तो ठीक थी, लेकिन आज हमें यह समझने की जरूरत है कि वह समय बहुत पीछे चला गया।
हम किसी इंसान का इस हद तक स्तुतिगान करना चाहते हैं कि वह खुद अपने आप में संस्थान बन जाए। अगर आप आजकल के सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों पर नजर डालें तो आप हैरान रह जाएंगे कि कैसे समाज में किसी एक खास पद पर पहुँच चुके लोग टीवी कैमरे के सामने जाकर सरासर झूठ बोल सकते हैं। यहां तक कि जैसे ही वह बोलना शुरू करते हैं लोग समझ जाते हैं कि यह सब झूठ है, फिर भी वे बच निकलते हैं। अगर जानबूझ कर कोई इंसान लोगों को झूठ बोल कर भ्रमित कर रहा है तो उसे अगले दिन ही पद से हट जाना चाहिए। लेकिन अपने निजी करिश्माई व्यक्तित्व के चलते उनके प्रशंसकों या अनुयायियों की संख्या काफी होती है, जिसके बल पर वे बिना किसी जवाबदेही के जो चाहें वो बोलते जाते हैं। अगर हमें आगे बढ़ना है तो हमें ऐसे लोगों को और ऐसी चीजों से दूर होना होगा।
हमें हर किसी को यह समझाने की जरुरत है कि देश मात्र एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि एक संस्थान है। इस संस्थान के अपने कुछ नियम व कानून हैं, जिनका पालन होना चाहिए, जहां हरेक के कुछ कर्तव्य हैं और यहां के कुछ फायदे हैं, जिन्हें हासिल किया जा सकता है। एक नागरिक के तौर पर अगर हमें बुनियादी ढांचा और बुनियादी सेवाओं का लाभ नहीं मिलता तो हमें उन्हें मांगने का अधिकार है।
आज सबसे बड़ी जरूरत कानूनों के सरलीकरण की और देश के हर नागरिक को इन कानूनों की स्पष्ट रूप से समझाने की है।
हमें बाकायदा यह पूछने का हक है कि हमारा पैसा कहां जा रहा है। फिलहाल हम न तो अपना योगदान दे रहे हैं और न ही अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। यह भाव अभी तक हममें आया ही नहीं है। हमने कभी यह सोचा ही नहीं कि सरकार हमें सेवाएं व सुविधाएं मुहैया कराने के लिए जिम्मेदार है और ना ही ये कि सरकार को काम करने के लिए जरूरी पैसों को मुहैया कराने की जिम्मेदारी हमारी है। अगर हम चाहते हैं कि देश कुशलतापूर्वक काम करे तो इसके लिए हम सब को अपना योगदान देना होगा। इसके लिए हमें स्पष्ट व सटीक कानूनों की जरूरत है, जिनका हरेक को पालन करना होगा। आज सबसे बड़ी जरूरत कानूनों के सरलीकरण की और देश के हर नागरिक को इन कानूनों की स्पष्ट रूप से समझाने की है।
प्रेम व प्रसाद,

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