माँ काली और गौरी – देवी के इन दो रूपों में क्या अंतर है?

माँ काली और गौरी – देवी के इन दो रूपों में क्या अंतर है

सद्‌गुरुकुछ मंदिरों में हम माँ काली की तो कुछ अन्य अन्दिरों में माँ गौरी की प्रतिमाएं देखते हैं। क्या अंतर है देवी के इन दोनों रूपों? सद्‌गुरु बता रहे हैं कि ये रंग से नहीं अस्तित्व की ज्यामिति से जुड़ा है –

प्रश्न : सद्‌गुरु, भारत के मंदिरों की जो मूर्ति-कला है, वे क्या सिर्फ  सौंदर्य के लिए हैं या वे यंत्र की तरह किसी खास मकसद से बनाए गए हैं? कृपया यह भी बताएं कि यंत्र कैसे बनाया जाता है?

यंत्र बनाने की तकनीक, एक भीतरी तकनीक है

सद्‌गुरु : तो आप यंत्र बनाने की तकनीक सीखना चाहती हैं! इन देवताओं के नष्ट होने की वजह किताबी ज्ञान ही था। पहले यह ज्ञान हमेशा अनुभव के स्तर पर एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुंचता था, मगर समय के साथ जब यह क्षमता कमजोर पड़ी, तो लोगों ने इन चीजों के बनाने की विधि को लिखकर रखना शुरू कर दिया। वास्तव में इन ग्रंथों के आने के बाद ही कर्मकांडों में विकृति आनी शुरू हुई, क्योंकि फिर कोई भी उसे पढक़र चीजें बना सकता था ‐ चाहे वह काम करे, या न करे ‐ उन्होंने सिर्फ लोगों के भोलेपन का फायदा उठाकर चीजें करनी शुरू कर दीं। इसलिए मुझे उस दिशा में ले जाने की कोशिश मत कीजिए, मैं उस दिशा में कभी न जाने का पक्का इरादा करके बैठा हूं। तो हम इस बारे में कोई किताब नहीं लिखने जा रहे कि आपके घर में कोई यंत्र कैसे बनाया जाए। क्योंकि ऐसा करना ठीक नहीं है। किसी को इस बात की जानकारी नहीं होनी चाहिए, जब तक कि यह ज्ञान आपको अपने अपनी भीतरी ज्यामिति के बोध से न मिले।

माँ काली और गौरी – देवी के दो रूप

अब सवाल है कि क्या ये मूर्तियां सिर्फ  सुंदरता के लिए हैं? सौंदर्यशास्त्र के लिहाज से ये बहुत अच्छी नहीं हैं। अगर आप लिंग भैरवी को ही देखें, तो मैंने उन्हें किसी खूबसूरत स्त्री की तरह नहीं बनाया है।

दोनों काले ग्रेनाइट पत्थर से बने होते हैं। ऐसा नहीं होता कि एक को सफेद संगमरमर से और दूसरे को काले ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया हो।
मगर उन्हें इस तरह बनाने की वजह यह है कि स्त्रैण के दो आयाम हैं, जिन्हें पारंपरिक रूप से काली और गौरी कहा जाता है। लोगों को लगता है कि यह सिर्फ  रंग से जुड़ा मामला है, काला रंग और गोरा रंग। मगर इसका रंग से कोई संबंध नहीं है। हम हमेशा ‘राग’ शब्द का प्रयोग करते हैं, जो भारत में चीज़ों के गुण के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है। जब आप एक खास गुण पैदा करते हैं, तो आपके दिमाग में एक खास चित्र, एक खास रंग उभरता है। उसी के आधार पर हम किसी ध्वनि, स्पंदन, काम, वातावरण के लिए एक खास रंग तय करते हैं, क्योंकि ये सभी चीज़ें आखिर में एक रंग की झलक पैदा करती हैं। मंदिरों में जो स्त्री रूप होते हैं, वे या तो गौरी के या काली के होते हैं। दोनों काले ग्रेनाइट पत्थर से बने होते हैं। ऐसा नहीं होता कि एक को सफेद संगमरमर से और दूसरे को काले ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया हो।

काली अकेली होती हैं, और गौरी शिव के बगल में

तो स्याह और श्वेत सिर्फ त्वचा के रंग या अच्छे और बुरे के संदर्भ में नहीं हैं, बल्कि जीवन के अलग-अलग आयामों के संदर्भ में है। इसे अस्तित्व के दो अलग-अलग आयामों के रूप में देखा जाता है और दुनिया में चीजों के घटित होने के लिए इन दोनों की जरूरत होती है। स्याह यानी काला रंग उग्रता का प्रतीक होता है। गोरा या गौरी सौम्य होती हैं। सौम्य रूपों को आम तौर पर मुख्य देवता के सहचर के रूप में पूजा जाता है। शिव होंगे, तो उनके बगल में गौरी होंगी। वह उनकी पूरक है, मुख्य शक्ति शिव हैं। गौरी बस पूरक की तरह वहां मौजूद हैं, क्योंकि वह सौम्य, सभ्य, घरेलू स्त्री हैं। काली हमेशा अकेली होती हैं, उनके बगल में कोई पुरुष रूप नहीं होता। वह अकेले ही संपूर्ण शक्ति होती हैं। तो ये आकार या रूप सिर्फ  सौंदर्य की दृष्टि से हैं या बस इनका सांस्कृतिक या दार्शनिक मतलब ही है? दुर्भाग्यवश लोग हमेशा शाब्दिक अर्थ खोजते हैं, इसलिए इसके पीछे के सिद्धांत को समझाने की कोशिश की जाती है। इसके पीछे कोई दर्शन या सिद्धांत नहीं है। यह कला ज्यामिति की है।

तर्क नहीं ज्यामिति पर आधारित होती है पूर्व की कलाएं

आपको समझना चाहिए कि पूरब की कलाओं की कोई दार्शनिक पृष्ठभूमि नहीं है। यूरोपीय चीजों के पीछे हमेशा एक दर्शन होता है, एक सिद्धांत होता है। दर्शन का मतलब है कि आपने जो किया है, उसके समर्थन में आपने एक तर्क दिया है।

इसलिए जब हम देखते हैं कि हमारे गढ़े हुए रूप में वह बात नहीं है क्योंकि ज्यामितिय सटीकता पाना आसान नहीं होता, तो आसान तरीका यह है कि आम तौर पर छाती या गले के गड्ढे या माथे पर कहीं एक तांबे या सोने का बना धातु यंत्र लगा दिया जाता है ताकि पत्थर के रूप में जो भी कमियां रह गई हैं, उसकी भरपाई धातु से हो जाए।
पूरब की कलाओं में अपना कोई दर्शन बनाने की परंपरा नहीं है। यहां कलाकार हमेशा अस्तित्व की मौजूदा ज्यामिति के साथ एक समरूपता लाने की कोशिश करता है। इसलिए उसे तभी कामयाब माना जाता है जब उसकी गढ़ी हुई चीज अस्तित्व संबंधी किसी खास रूप के साथ अपने आपमें तालमेल में हो। यही वजह है कि पूर्वी कलाकार कभी अपनी कलाकृति पर अपना नाम नहीं लिखते, क्योंकि उसे पता होता है कि उसने अस्तित्व के किसी चीज की महज नकल ही की है। जब वह बिल्कुल सटीक नकल बना लेता है तो उसे खुशी मिलती है, क्योंकि वह जानता है कि अब लोग उसका अनुभव कर पाएंगे।

अस्तित्व में जो बड़ी चीजें घटित हो रही हैं, उन तक ज्यादातर लोगों की पहुंच नहीं होती। इसलिए भारत में कलाकृतियों का संबंध सुंदरता से नहीं, ज्यामिति से होता है। अगर ज्यामितीय सटीकता  हो, तो हम बाहरी रूप में हाथ और पैर के सही आकार गढऩे में बहुत ध्यान नहीं देते। इसलिए सुंदरता उसके बाहरी रूप-रंग में नहीं है। सुंदरता उसकी ज्यामिति और आप पर पडऩे वाले उसके असर में है। इन देवताओं को गढ़ते समय बहुत सारी चीजें की जाती हैं। इसलिए जब हम देखते हैं कि हमारे गढ़े हुए रूप में वह बात नहीं है क्योंकि ज्यामितिय सटीकता पाना आसान नहीं होता, तो आसान तरीका यह है कि आम तौर पर छाती या गले के गड्ढे या माथे पर कहीं एक तांबे या सोने का बना धातु यंत्र लगा दिया जाता है ताकि पत्थर के रूप में जो भी कमियां रह गई हैं, उसकी भरपाई धातु से हो जाए। देवताओं को इसी तरह गढ़ा गया था, वे सब यंत्र ही हैं।


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