लोकतंत्र में नेता और जनता के बीच क्या रिश्ता होना चाहिए?

लोकत्रंत्र में नेता और जनता के बीच क्या रिश्ता होना चाहिए?

सद्‌गुरुजाने-माने फिल्म निर्माता-निर्देशक सुभाष घई ने कुछ दिन पहले सद्‌गुरु से बातचीत की। इस बातचीत में वे सद्‌गुरु से नेता और जनता के बीच के रिश्ते के बारे में पूछ रहे हैं। सद्‌गुरु हमें बताते हैं कि लोकतंत्र में जनता और नेता के बीच कोई फर्क ही नहीं है…

सुभाष घई : सद्‌गुरु, आपकी नजर में लोकतंत्र क्या है और नेता और जनता के बीच क्या रिश्ता होना चाहिए?

लोकतंत्र में जनता और नेता एक ही होते हैं

सद्‌गुरु : तमिल में लोकतंत्र के लिए शब्द है – जननायकम, जिसका मलतब है कि जनता ही नेता है। यह भी कह सकते हैं कि न कोई नेता है, न कोई जनता है। दुर्भाग्य की बात है कि आम लोग यह भूल गए हैं कि वे नेता हैं।

दर्शक बनकर आप चुपचाप बैठ गए और जब किसी ने कुछ गलत किया तो चीखने-चिल्लाने लगे, इससे काम नहीं होगा। अगर आप पूरा ध्यान नहीं देंगे, तो आपका घर भी ठीक से नहीं चलने वाला।
एक बार लखनऊ में एक पत्रकार मेरा इंटरव्यू ले रहे थे। उन्होंने ‘ये राजनेता’ बोलकर एक जुमला इस्तेमाल किया। मैंने उनसे कहा कि कोई राजनेता नहीं है। वे कोई आसमान से नहीं टपके हैं। वे हममें से ही हैं। जिस काम को आप गंदा समझते हैं और इसलिए आप खुद या अपने बच्चों को उस ओर नहीं जाने देते, कोई और उस काम को आपके लिए कर रहा है। एक बार इस क्षेत्र में जाते ही कुछ ऐसा होता है कि इंसान के हाथ गंदे हो जाते हैं, आप कुछ नहीं कर सकते। पूरा सिस्टम ही ऐसा हो गया है। इसलिए लोकतंत्र में न कोई नेता होता है और न कोई जनता। बस लोग होते हैं। होना यह चाहिए कि हर पांच साल में आप खड़े हों और नेता बनें। हमने इस सबको प्रवाह मान या मोबाइल नहीं रखा है, क्योंकि हमारी आदत है कि एक बार किसी को जिम्मेदारी देने के बाद हम भूल जाते हैं। जब कोई कुछ गलत करता है, तो हम चीखने लगते हैं, नहीं तो हमें कोई परवाह नहीं होती।

अगर आप लोकतंत्र में रह रहे हैं, तो आपकी इसमें सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। दर्शक बनकर आप चुपचाप बैठ गए और जब किसी ने कुछ गलत किया तो चीखने-चिल्लाने लगे, इससे काम नहीं होगा। अगर आप पूरा ध्यान नहीं देंगे, तो आपका घर भी ठीक से नहीं चलने वाला। तो जब बात पूरे देश की है, इतने सारे लोगों की है, तब अगर हर व्यक्ति इस बात पर ध्यान नही देगा कि क्या करना जरुरी है, तो गड़बड़ी तो होगी ही। और जब गड़बड़ी होती है तो हम रोते हैं। लोकतंत्र को लेकर सबसे खूबसूरत बात यह है कि बिना किसी खून-खराबे के सत्ता बदलती रहती है। मानव इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

हमें खुद ही देश को संभालना होगा

हमने एक बड़ी गलती यह की है कि शिक्षा व्यवस्था में, अपने घरों में इस मुद्दे पर हमने कोई जागरूकता नहीं लाई है। हम जानते ही नहीं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कुछ ऐसे तरीके होते हैं जिनके जरिए हम सभी रोजमर्रा के आधार पर इसमें हिस्सा ले सकते हैं।

कोई इंसान हमें दिशा देगा, कोई नीतियां बनाएगा, कोई फैसले लेगा, लेकिन देश सारे लोग ही मिलकर चलाएंगे। अगर हमें यह बात समझ नहीं आई तो हम हमेशा शिकायतें ही करते रहेंगे।
आज अच्छे लीडरशिप को लेकर हमारी सोच ये है कि अगर हमें कोई अच्छा नेता मिल जाए तो हम उसकी पूजा करना शुरू कर देते हैं। अगर एक काबिल नेता शिखर तक पहुंचता है, तो उसे पूजा की जरूरत नहीं है, उसे अपने नीचे कई स्तरों पर लीडरशिप की जरूरत है, जिससे उसे उन कामों को पूरा करने के लिए सहयोग मिलता रहे, जो वह करना चाहता है। लेकिन अगर कोई बड़ा नेता उभरता है तो वह अपनी जगह ही घूमता रहता है, क्योंकि नीचे से कोई सहयोग मिल ही नहीं रहा। या तो ऐसे लोग होंगे, जो उसकी पूजा करने लगेंगे, या वे होंगे जो अपने काम में उलझे हैं। लोकतंत्र का अर्थ है कि देश हमारे हाथों में है। हमें ही इसे संवारना है। कोई इंसान हमें दिशा देगा, कोई नीतियां बनाएगा, कोई फैसले लेगा, लेकिन देश सारे लोग ही मिलकर चलाएंगे। अगर हमें यह बात समझ नहीं आई तो हम हमेशा शिकायतें ही करते रहेंगे। हमारा देश मजबूत नहीं होगा। अगर हमें मजबूत देश चाहिए तो हमें खड़ा होना होगा और देश की बागडोर अपने हाथ में लेनी होगी। देश की बागडोर हाथ में लेने का अर्थ यह नहीं है कि कल सुबह ही आप सत्ता हड़पने पहुंच जाएं। बल्कि इसका मतलब यह है कि हम जहां हैं, हमारी जो भूमिका है, हम उसे अच्छी तरह से निभाते रहें।

भ्रष्टाचार लोगों में पहले से मौजूद है

लोग कहते हैं कि राजनेता भ्रष्ट होते हैं। मैं आपसे पूछता हूं कि अगर चौराहे पर कोई पुलिसवाला न हो तो कितने लोग रेड लाइट पर रुकेंगे? मुश्किल से दस फीसदी। बाकी का क्या होगा?

एक घर के भीतर लडक़ी और लडक़े में फर्क किया जाता है। यह भी भ्रष्टाचार ही है। भ्रष्टाचार किसी से रिश्वत लेना ही नहीं है, यह हर स्तर पर है।
अगर उनमें से एक को आप मंत्री बना दें, तो बताइए वे क्या करेंगे? वे तो कानून तोड़ेंगे ही। कोयंबटूर में आमतौर पर मैं रात को ही पहुंचता हूं। एयरपोर्ट से आश्रम जाते वक्त रास्ते में मैं रेड लाइट पर रुक जाता हूं। पीछे से कोई न कोई जरूर होगा, जो हॉर्न बजाएगा और मुझसे रेड लाइट तोडक़र आगे बढऩे की उम्मीद करेगा, लेकिन जब तक ग्रीन लाइट नहीं होती, मैं वहां से हिलता तक नहीं। फिर वह मेरे बगल में आएगा और बोलेगा, ‘आपको प्रॉब्लेम क्या है?’ वह सोचता है कि मैं मूर्ख हूं जो रात के वक्त भी रेड लाइट पर रुकता हूं। ऐसे लोग आपसे कहना चाहते हैं कि जब पुलिसवाला नहीं है तो यहां क्यों रुके हो? आगे बढ़ो।

ऐसे लोगों को अगर आप सत्ता में ले आए तो क्या होगा? बस ये है कि जो लोग सत्ता में होते हैं, उन पर सबकी नजरें होती हैं। वे जो करते हैं, सबको नजर आ जाता है, लेकिन भ्रष्टाचार हर जगह फैला है। एक घर के भीतर लडक़ी और लडक़े में फर्क किया जाता है। यह भी भ्रष्टाचार ही है। भ्रष्टाचार किसी से रिश्वत लेना ही नहीं है, यह हर स्तर पर है। जीवन में कहीं निष्पक्षता नहीं है, हमने भ्रष्टाचार को हर जगह घुसा दिया है। अगर इसे हटाना है तो आध्यात्मिक प्रक्रिया की जरूरत होगी।


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