क्या हमारी दिनचर्या हमारी साधना बन सकती है?

योग के एक मार्ग को कर्म योग कहा जाता है। इसमें हम अपने कामों को पूरी भागीदारी के साथ करते हैं, और यह अपने आप में एक साधना है, लेकिन क्या सिर्फ कर्म योग साधना किसी को रूपांतरित कर सकती है?

प्रश्‍न:

सद्‌गुरु मैं एक कलाकार हूं। क्या मेरी ट्रेनिंग, मेरा अभ्यास, मेरा शो या मेरी रिहर्सल साधना माने जा सकते हैं? अगर हां तो क्या इतनी साधना काफी है?

सद्‌गुरु:

पूरी सहभागिता और जुड़ाव के साथ आप जो भी करते हैं, वह आपके ऊपर कुछ न कुछ असर तो डालता ही है। लेकिन अपने भीतर केंद्रित होकर साधना करने और बाहरी साधना करने में अंतर है।

इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप क्या करते हैं, लेकिन जरूरी यह है कि पहले आप अपने भीतर खुद को स्थापित करें और फिर जो चाहें करें।
बात सिर्फ कलाकार की ही नहीं है, एक मैनेजर भी अपने काम को साधना के रूप में कर सकता है, एक माली भी अपना काम साधना के तौर पर कर सकता है। कोई कुछ भी कर रहा हो, अगर वह पूरे जुड़ाव के साथ कर रहा है तो यह उसके विकास में मददगार होगा। लेकिन साधना के रूप में बाहरी कामकाज करने और साधना की आंतरिक प्रक्रिया को करने के बीच एक अंतर है।

बाहरी गतिविधियों को साधना के रूप में करना बहुत उपयोगी है क्योंकि आप उन्हें पूरे दिन कर सकते हैं। आपको अपने दैनिक काम करने तो हैं ही, तो उसे क्यों न विकास की प्रक्रिया बना दिया जाए। लेकिन अंदरूनी साधना करने का मकसद अपने भीतर एक स्पेस (जगह) बनाना है। आपकी बाहरी साधना केवल नतीजों पर आधारित होती है, इससे आप बच नहीं सकते। मान लीजिए शो के बीच में ही आप अपना कोई डायलॉग भूल गए, तो आप यह नहीं कह सकते कि यह तो मेरी साधना है – मैं भूल गया, कोई बात नहीं; मैं तो अब भी इसका आनंद ले रहा हूं और विकास कर रहा हूं। आप ऐसा कर ही नहीं सकते। अगर ऐसा हुआ तो आपको उसी दिन निकाल दिया जाएगा। इस तरह आपकी बाहरी साधना एक खास स्तर के अभिनय, परिणाम, प्रशंसा, आर्थिक लाभ और ऐसी ही तमाम चीजों पर आधारित है, लेकिन यह फिर भी उपयोगी है। अगर आप पूरी सहभागिता और जुड़ाव के साथ इसे कर रहे हैं तो यह आपके भलाई के लिए काम कर सकती है। अगर आप पूरी तरह से संलग्न हैं, यानी जुड़े हुए हैं तो सांस लेना, चलना, आपका अभिनय सब कुछ साधना बन जाएगा।

जब आप ध्यान कर रहे हैं, तो आपको किसी की तालियों की आवश्यकता नहीं है। यह किसी भी बाहरी स्थिति पर निर्भर नहीं है और यह बड़ी बात है कि आपके जीवन का कम से कम एक पहलू तो इस तरह का है जिसे किसी की सराहना या सहमति मिले या न मिले, आप पूरी सहभागिता और जुड़ाव के साथ इसे करते हैं।

तो अगर आप इसे अच्छी तरह से कर सकें तो अपने जीवन की गतिविधियों को साधना का रूप देना आपके लिए आसान हो जाएगा। लेकिन अगर आपके भीतर स्पेस नहीं है तो जीवन की गतिविधियां इस तरह जकड़ लेंगी कि आपको लगेगा कि जो काम आपने पूरे उत्साह के साथ शुरू किया था, वही आपके लिए सिरदर्द बन गया है। इसकी वजह बस आपके आंतरिक विस्तार का न होना है।

कृष्ण ने कहा है – “योगस्थ कुरु कर्माणि”। इसका मतलब है, पहले अपने भीतर खुद को स्थापित करो, फिर कर्म करो। ऐसे में कोई भी कर्म समस्या नहीं बनेगा।

आपको अपने दैनिक काम करने तो हैं ही, तो उसे क्यों न विकास की प्रक्रिया बना दिया जाए। लेकिन अंदरूनी साधना करने का मकसद अपने भीतर एक स्पेस (जगह) बनाना है।
आप युद्ध लड़ सकते हैं, आप किसी मंदिर में पुजारी बन सकते हैं, आप खाना पका सकते हैं, झाड़ू लगा सकते हैं। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप क्या करते हैं, लेकिन जरूरी यह है कि पहले आप अपने भीतर खुद को स्थापित करें और फिर जो चाहें करें। इसके विपरीत आप बाहरी गतिविधियों के द्वारा अपनी पहचान बना रहे हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसी चीज आपके रास्ते में आ गई जिसे करने से आपकी जो भी पहचान है, उसे खतरा हो तो फिर आप धराशायी हो जाएंगे। तो योग सिखा कर योगी बनने की कोशिश मत कीजिए। आप योगी बन जाइए और फिर अगर लोगों को रूचि हो तो आप सिखाएं, नहीं तो आंख बंद करें और यूं ही बैठ जाएं।

 


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