क्या भीतरी खुशहाली से समाज में खुशहाली आ सकती?

क्या भीतरी खुशहाली से समाज में खुशहाली आ सकती है

सद्‌गुरुभारतीय मूल के एक बेहद सम्मानित नेता हैं प्रवीण गोर्धान जिन्हें दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने देश का नया वित्त मंत्री नियुक्त किया। प्रवीण ने सद्‌गुरु से बाहरी और भीतरी खुशहाली जैसे विषयों पर चर्चा की। पढ़ते हैं  ये चर्चा

प्रवीण गोर्धान: भीतरी खुशहाली और बाहरी खुशहाली के बीच आखिर वो क्या रिश्ता है, जिसे आप बनाने की कोशिश करते हैं? क्या भीतरी खुशहाली लोगों को उस तरह का सामाजिक न्याय दिला सकती है, जिसकी परिकल्पना आप दुनिया भर के अरबों लोगों के लिए करते हैं?

हमें जो मिलता है, उससे कुछ सुंदर बनाना हमारे ऊपर है

सद्‌गुरु : हालिया इतिहास में दुनिया के इस हिस्से की एक बड़ी आबादी ने जिस तरह का संघर्ष, तकलीफ, दर्द और भयंकर पीड़ा झेली है, उससे मैं बहुत अच्छी तरह परिचित हूं।

हमें यह समझना होगा कि दुनिया हम पर जो भी थोपती या लादती है, बदकिस्मती से वह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता। लेकिन हमारे ऊपर जो भी थोपा जाता है, उससे हम क्या बनाते है, यह सौ फीसदी हमारे हाथ में होता है।
एक बेहतर कल के भरोसे ये लोग त्याग, पीड़ा, घाव, मृत्यु और जबरदस्त नुकसान से हो कर गुजरे हैं। ये वही लोग हैं, जिन्होंने अपने आज के सुख व आराम की चिंता नहीं की, बल्कि भविष्य में सबके कल्याण की चिंता की। जिन कठिनाइयों से होकर ये गुजरे हैं, इन पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के साथ ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यह महत्वपूर्ण है कि हम उनके बलिदान व उनकी पीड़ाओं का सम्मान करें, लेकिन इसी के साथ बिना किसी क्रोध और नाराजगी के हम वह करने की कोशिश करें, जो वे पाना चाहते थे।

जब इंसान के ऊपर दर्द थोप दिया जाता है तो लोगों को लगता है कि यह स्वाभाविक है, कि उसके अंदर क्रोध और नाराजगी पैदा हो। क्रोध, निराशा, द्वेष, ये सब ऐसे जहर हैं, जिन्हें पीते हम हैं और अपेक्षा करते हैं कि इनसे मरेगा कोई और। जीवन इस तरह से नहीं चलता। अगर जहर हम पीते हैं तो मरना भी हमें ही होगा। बीसवीं सदी में हमने कई देशों के कई स्वतंत्रता आंदोलन देखे हैं। लेकिन मानवता के इतिहास में दक्षिण अफ्रीकी लोगों और भारतीयों का स्वतंत्रता आंदोलन अपने आप में एक अनोखी घटना थी। आपको इस बात का गर्व होना चाहिए कि कई मायनों में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का जन्म दक्षिण अफ्रीका में हुआ। हमें यह समझना होगा कि दुनिया हम पर जो भी थोपती या लादती है, बदकिस्मती से वह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता। लेकिन हमारे ऊपर जो भी थोपा जाता है, उससे हम क्या बनाते है, यह सौ फीसदी हमारे हाथ में होता है।

कुछ लोग हमेशा शिकायत करते रहते हैं

अगर हम खुद को ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं बनाते तो हम हमेशा एक आदर्श स्थिति की तलाश में रहेंगे और किसी भी समाज में आदर्श स्थिति कभी नहीं होती।

हमें यह समझना होगा कि दुनिया हम पर जो भी थोपती या लादती है, बदकिस्मती से वह हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता। लेकिन हमारे ऊपर जो भी थोपा जाता है, उससे हम क्या बनाते है, यह सौ फीसदी हमारे हाथ में होता है।
बात बस इतनी है कि जिन लोगों के पास अपना एक दृष्टिकोण था, जिनके पास उसे साकार करने की ताकत थी, जिन लोगों में आवश्यक समर्पण व प्रतिबद्धता थी, उन लोगों ने हर परिस्थिति को बड़े पैमाने पर लोगों के कल्याण की तरफ मोड़ दिया। लेकिन कभी भी किसी भी देश, किसी भी समाज और किसी भी समय में परिस्थितियां आदर्श नहीं रही हैं। हां, कुछ लोगों ने दूसरों के अपेक्षा कठिन स्थितियों का सामना जरूर किया है। हर समाज में ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जो हमेशा उन चीजों के लिए जो ठीक या सही नहीं है, शिकायत करते रहते हैं।

प्रवीण गोर्धान: यह चीज तो दक्षिण अफ्रीका में भी है।

सद्‌गुरु : यह सिर्फ दक्षिण अफ्रीका की ही बात नहीं है, दुनिया में बतौर एक पीढ़ी हम अब तक के सबसे ज्यादा शिकायती लोग हैं। दरअसल, सोशल मीडिया में हमारी हर शिकायत पूरी दुनिया में सुनी जाती है।

प्रवीण गोर्धान: और वो भी बहुत जल्दी।

पहले अपने मन को, फिर समाज और देश को संभालना होगा

सद्‌गुरु : हां, बिलकुल। इसलिए भीतरी खुशहाली की बात होती है। फिर सवाल उठता है कि यह कितना महत्वपूर्ण है?

लेकिन मानव हृदय और मानव मन अभी भी काली अंधियारी कंदरा की तरह हैं। अब समय आ गया है कि इन कंदराओं में रोशनी लाया जाए।
जब बाहरी परिस्थितियां कठिन होती हैं तो लोग हमेशा यह सवाल करते हैं – क्योंकि हमें यह संदेह हो जाता है, कि मेरा शांतिमय होना, मेरी खुशहाली व कल्याण – बाहरी परिस्थितियों को कैसे बदल सकता है? हमें इसे समझना होगा कि हम जो भी रचते हैं, वह इसी बात की अभिव्यक्ति होती है कि हम कौन हैं। अगर हम रूपांतरित होने की कोशिश नहीं करेंगे, तो हम हमेशा वही चीज बनाएंगे, जो हम नहीं चाहते।

हो सकता है कि हम कुछ छोटे लक्ष्यों को तय करना चाहें, जैसे कुछ खास चीजों को हासिल कर लेना, लेकिन इससे हमें वह नहीं मिलेगा, जो हम वाकई चाहते हैं, क्योंकि हमने खुद को वैसा नहीं बनाया, जैसा हम चाहते हैं। अगर हम अपना मन ही नहीं संभाल पाएंगे तो समाज को क्या संभालेंगे? देश को कैसे संभालेंगे?दुनिया को कैसे संभालेंगे? अगर जिस तरह का इंसान मैं चाहता था, वैसा मैं खुद को अपने भीतर से तैयार नहीं कर पाया, तो मैं ऐसा देश या विश्व कैसे तैयार कर पाऊंगा, जैसा मैं चाहता हूं। तो भीतरी खुशहाली कोई गोपनीय या गूढ़ विषय नहीं है, जो उसके लिए हो जो अपना सब कुछ छोडक़र हिमालय की कंदरा में जाकर बैठ जाए। आपमें से जो लोग सोच रहे हैं, ‘ओह, मैं योग करूंगा, मैं ध्यान करूंगा, … पहले मुझे हिमालय की कंदराओं में जाने दीजिए, तो मैं आपको बता दूं कि वहां कोई गुफा खाली नहीं है।’

भीतरी खुशहाली सभी तक पहुंचनी चाहिए

लेकिन मानव हृदय और मानव मन अभी भी काली अंधियारी कंदरा की तरह हैं।

अगर आपके हृदय की कंदरा, मन की कंदरा आपके उज्ज्वल और चमकदार अस्तित्व से प्रकाशित हो जाए तो यह विश्व यकीनन रोशन हो उठेगा।
अब समय आ गया है कि इन कंदराओं में रोशनी लाया जाए। अगर आपके हृदय की कंदरा, मन की कंदरा आपके उज्ज्वल और चमकदार अस्तित्व से प्रकाशित हो जाए तो यह विश्व यकीनन रोशन हो उठेगा। हम जो हैं, उससे अलग एक समाज की रचना नहीं कर सकते हैं। जैसे हम हैं वैसा ही हमारा समाज होगा।

ऐसा करने में सक्षम होना कि भीतरी खुशहाली सिर्फ कुछ लोगों का ही विशेषाधिकार बनकर न रहे, जैसा कि बाहरी खुशहाली व आर्थिक समृद्धि कुछ समय पहले तक चंद लोगों का ही विशेषाधिकार हुआ करता था। इसके लिए तमाम महान लोगों ने संघर्ष भी किया, कई महान लोगों ने बलिदान दिए, कई महान लोग अपनी महानता तक पहुंचने से पहले ही मिटा दिए गए। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि आज भीतरी खुशहाली हर इंसान के लिए एक संभावना बन जाए।


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