खुद से प्रेम करना: क्‍या कोई मानसिक बिमारी है?

खुद से प्रेम करना: क्‍या कोई मानसिक बिमारी है?
खुद से प्रेम करना: क्‍या कोई मानसिक बिमारी है?

कुछ विचारकों और लेखकों का यह मानना है कि इंसान को खुद से प्रेम करना चाहिए। क्या खुशहाली के लिए इंसान को  खुद से प्रेम करना जरुरी है? इंसान के भीतर शर्म और अपराधबोध ऐसे भाव हैं, जो अक्सर घर या ऑफिस में रहते, किसी न किसी कारण से पैदा हो जाते हैं। क्या है इन भावों की बुनियाद?

 प्रश्‍न:

ऐसा क्यों है कि इतने सारे लोग खुद से प्रेम नहीं कर पाते? क्या आप शर्म और अपराधबोध के बारे में कुछ बताएंगे?

सद्‌गुरु:

‘खुद को पसंद करना?’ किसी और को आपको पसंद करना चाहिए। ‘मैं खुद से प्यार करता हूं’ – यह क्या बकवास है? ऐसे विचार और सिद्धांत दुनिया भर में प्रचलित हैं, खासकर अमेरिका के पश्चिमी तट पर। हाल में जब मैं कैलिफोर्निया गया, तो मुझे स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक लेक्चर में शामिल होने का मौका मिला। वहां वक्ता का मत था, ‘आपको अपने प्रति करुणा रखनी चाहिए।’ मैंने कहा, ‘पसंद करने, प्रेम करने और करुणा रखने के लिए, आपको दो जीवों की जरूरत है। अगर आप अपने भीतर दो जीव पाल लेते हैं, तो या तो आप पागल हैं या प्रेतग्रस्त।

लोगों में शर्म और अपराधबोध भरने का मतलब है कि आपको उनके विकास, रूपांतरण और अपने भीतरी आयाम को छूने की काबिलियत में कोई दिलचस्पी नहीं है। आपकी दिलचस्पी बस उन्हें बांध कर रखने में है।
या तो आपको मनोचिकित्सक की जरूरत है या किसी ओझा की।’
एक व्यक्ति का मतलब है ‘जो आगे और बंट न सके।’ अगर आपने खुद को ऐसा बना लिया है कि आपके कोई दोस्त नहीं हैं और आप अकेले रह नहीं सकते, तो आप अपने अंदर दो लोग बना लेते हैं। ऐसा खेल न खेलें। शुरू में इसमें मजा आ सकता है, लेकिन अगर यह जम गया तो आप बीमार हो जाएंगे। मानसिक संतुलन और असंतुलन के बीच बहुत बारीक लकीर है। अगर आप लगातार उसे धकेलते रहे, तो आप दूसरी ओर जा गिरेंगे और जान नहीं पाएंगे कि आप कहां हैं।
एक बार ऐसा हुआ – शंकरन पिल्लै ने बंगलौर के निमहैंस इंस्टीट्यूट के मनोचिकित्सा वार्ड में फोन किया और कहा, ‘क्या कमरा नं 21 में मि. पिल्लै हैं?’ रिसेप्शनिस्ट ने जवाब दिया, ‘रुकिए सर, मैं अभी चेक करके बताती हूं।’ उसने चेक किया और बोली, ‘नहीं, वह यहां नहीं हैं।’ ‘हे भगवान, फिर यह सच है कि मैं भाग आया!’
एक बार जब आप अपने आप को बांटने का यह खेल खेलेंगे, तो आपको पता नहीं चलेगा कि आप कहां हैं। आप एक व्यक्ति हैं – जो आप हैं, वह कभी बंटा हुआ नहीं होना चाहिए। आपको एक व्यक्ति के रूप में समूचा होना चाहिए। केवल एक की ही मरम्मत हो सकती है, केवल एक ही विकास कर सकता है। केवल एक ही रूपांतरित हो सकता है, केवल एक ही आध्यात्मिक आयाम में जा सकता है। अगर दो होंगे, तो वे दो अलग-अलग दिशाओं में जाएंगे। अगर चार हैं, तो वे चार अलग-अलग दिशाओं में जाएंगे।
खुद से प्रेम करने की कोशिश न करें। आपमें पसंद करने लायक क्या है? ‘तो फिर क्या मुझे खुद को नापसंद करना चाहिए?’ आप इन सब तरीकों से सोच क्यों रहे हैं? खुद को पसंद या नापसंद करने का सवाल कहां है? जब आप खुद को सिर्फ जीवन के एक अंश के रूप में देखते हैं, तो अपने भीतर इस मूल और बुनियादी जीवन को न तो पसंद करने की जरूरत है न नापसंद करने की। अगर आप देखेंगे कि ‘यह सिर्फ मैं ही हूं’ तो आप इसे अच्छी तरह रखेंगे। अगर इसमें दो होंगे, तो दो लोगों को अच्छे से रखना मुश्किल होगा।
‘खुद से प्रेम करो। अपने आप में यकीन रखो। खुद के प्रति करुणा रखो,’ इन सब विचारों से आप बीमारी को न्यौता दे रहे हैं। और अगर आप बहुत दृढ़तापूर्वक मांगेंगे, तो आपको यह मिल भी सकता है। इन चीजों की मांग न करें। यह समझना बहुत जरूरी है कि आप एक व्यक्ति हैं – आप खुद को बांट नहीं सकते। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप एक मनोवैज्ञानिक खेल खेल रहे हैं जिससे आप पागलपन की ओर बढ़ रहे हैं। अगर आप ऐसे लोगों के साथ रहते हैं, तो इसमें कुछ भी असामान्य नहीं लगेगा लेकिन अगर जीवन के हालात आपके खिलाफ हो गये, तो आप पागल हो जाएंगे। अगर हालात आपका साथ देते हैं, तो आप ऐसे खेल खेलकर किसी तरह बच सकते हैं। मगर आपके जीवन में कोई महत्वपूर्ण चीज नहीं होगी क्योंकि जब तक कि आप एक व्यक्ति नहीं हैं, आप रूपांतरित नहीं हो सकते, आप परे नहीं जा सकते।

शर्म और अपराध-बोध

शर्म और अपराध-बोध के आपके विचार एक सामाजिक घटना हैं। एक समाज में लोग जिस चीज को लेकर अपराध-बोध महसूस करते हैं, दूसरे समाज में वे ऐसा नहीं महसूस करते। शर्म और अपराध-बोध कुदरती नहीं हैं। बात सिर्फ इतनी है कि कुछ धर्मों ने आपको हर चीज़ के बारे में अपराधी महसूस करा दिया है। अगर आप उन सभी चीजों की सूची बनाएं, जिन्हें वे पाप कहते हैं और जिनके लिए आपको अपराधी महसूस करना चाहिए, तो आप जीवित रहने पर भी अपराध-बोध महसूस करेंगे क्योंकि आपका जन्म ही एक पाप है। आप पूरी जिंदगी अपराध-बोध महसूस करते हैं। अगर कुछ ख़ास धार्मिक शिक्षाएं नहीं होतीं, तो अपराध-बोध और शर्म की भावना ही नहीं होती। अगर अपराध-बोध और शर्म की कोई गुंजाइश नहीं होती, तो आप अपनी हरकतों को सुधार लेते। अपराध-बोध और शर्म आपके जीवन में बहुत सारी अस्पष्टता ले आते हैं। आप लगातार कुछ मूर्खतापूर्ण चीजें करते हैं, उसे लेकर अपराधबोध महसूस करते हैं, अपना अपराध-बोध धो डालते हैं और फिर से वही चीजें करते हैं।
जिन लोगों को शर्म और अपराधबोध का खूब सारा पाठ पढ़ाया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो बहुत सारी हरकतें करते रहते, हैं क्योंकि अपराध-बोध को ठीक करने का रास्ता हमेशा, हर सप्ताह होता है। चेतनता एक चीज है – ‘सही गलत का ज्ञान’ या अंत:करण दूसरी चीज है।

 एक बार जब आप अपने आप को बांटने का यह खेल खेलेंगे, तो आपको पता नहीं चलेगा कि आप कहां हैं। आप एक व्यक्ति हैं – जो आप हैं, वह कभी बंटा हुआ नहीं होना चाहिए। आपको एक व्यक्ति के रूप में समूचा होना चाहिए।
चेतनता जीवन और अस्तित्व का आधार है। आध्यात्मिक प्रक्रिया चेतनता पर आधारित होती है, अंत:करण पर नहीं। अंत:करण एक सामाजिक तौर पर स्थापित किया गया तंत्र है, जिसका आम तौर पर एक धार्मिक आधार होता है। यह आपको जीवन में इस या उस या हर चीज के लिए अपराधी महसूस कराता है। जब आप अपराधी महसूस करेंगे तो आप किसी न किसी रूप में अधीन हो जाएंगे।
आपको अंत:करण की जरूरत नहीं है – आपको चेतनता की जरूरत है क्योंकि चेतनता सब को अपने अंदर शामिल करती है। हर किसी को खुद में ही शामिल करना आपके कार्यों को सुधारता है। आप इसलिए किसी काम से परहेज नहीं करते कि आपको वह गलत लगता है। आप जानते हैं कि आप अपने साथ ऐसा नहीं करना चाहेंगे, इसलिए आप किसी और के साथ भी ऐसा नहीं करना चाहेंगे। आप जानते हैं कि वह आपके लिए कारगर नहीं होगा, इसलिए आप किसी और के लिए भी ऐसा नहीं करना चाहेंगे। बस इतनी ही बात है। चेतनता हर चीज को अपने में शामिल करने के कारण आपको सुधारती है। अंत:करण आपको अपराधबोध, डर, सजा और शर्म से सुधारने की कोशिश करता है। यह ऐसी चीज है जो किसी इंसान को मुजरिम की तरह महसूस कराता है। जब कोई इंसान मुजरिम या अपराधी महसूस करे, तो उससे आप विकसित होने की उम्मीद नहीं कर सकते। लोगों में शर्म और अपराधबोध भरने का मतलब है कि आपको उनके विकास, रूपांतरण और अपने भीतरी आयाम को छूने की काबिलियत में कोई दिलचस्पी नहीं है। आपकी दिलचस्पी बस उन्हें बांध कर रखने में है। अपराधबोध और शर्म सामाजिक विवेक से आते हैं, सर्वव्यापी चेतनता या जागरूकता से नहीं।


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