खेल-मग्न भारत : कैसे बनाएं खेल को आध्यात्मिक प्रक्रिया?


सद्‌गुरुस्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘गीता पढ़ने की बजाय फुटबॉल खेलने से आप स्वर्ग के ज्यादा नजदीक पहुँच सकते हैं।’ ऐसा क्या है खेलों में कि वो एक आध्यात्मिक प्रक्रिया भी बन सकते हैं? इस स्पॉट में सद्गुरु बता रहे हैं कि कैसे खेलों से आध्यात्मिक विकास, और समाज में खुशहाली का भाव आ सकता है…

पिछले बारह सालों से ईशा ग्रामोत्सव का आयेाजन हो रहा है। इस आयोजन में खेल से जुड़ी कई हस्तियों, जैसे वीरेंद्र सहवाग, सचिन तेंदुलकर, सिंधु सहित कई लोगों ने खेल का महत्व और उनके जीवन में खेल के प्रभाव के बारे में बताया है। इस बार के ग्रामोत्सव में केंद्रीय राज्य मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौर व पुद्दुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी ने भाग लिया। इस दौरान उन्होंने खेल से जुड़े अपने जीवन के अनुभवों को हमारे साथ साझा किया। खेल की यही विशेषता है।

हमें उत्सव मनाने या आयोजन के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती थी। हमारी परंपरा में साल का हर दिन अपने आप में एक उत्सव होता था। हमने अपने काम और जीवन की तमाम घटनाओं को एक उत्सव बना दिया था।
यह अनुभव लगभग हर उस खिलाड़ी का है, जो अपने खेल से प्यार करता है। किसी भी खेल को खेलने की खुशी का आनंद हर व्यक्ति को लेना चाहिए। कई साल पहले जब हमने अपने पहले 14 दिवसीय योग कार्यक्रम का खाका तैयार किया था तो हमने इसकी रूपरेखा खेल की तरह बनाई थी। पहला दिन हमने खेल के नियम तय करने में गुजार दिए। यह नियमों का समूह ही है जो किसी खेल को खेल बनाता है। कुछ नियमों का समूह ही तय करता है कि कोई खेल टेनिस है या फुटबॉल अथवा क्रिकेट या कोई और खेल। जैसा कि आप जानते हैं कि किसी भी खेल के नियम हमारे द्वारा तय किए जाते हैं, लेकिन अगर हमें उस खेल को अच्छी तरह खेलना हो तो फिर हमें उसके नियमों का ऐसे पालन करना पड़ता है, जैसे वे कोई अध्यादेश हों।

खेलों का सबसे महत्वपूर्ण भाग है नियम

अगर आपने खेल का नियम तोड़ दिया तो आपने खेल बिगाड़ दिया। यह एक ऐसी चीज है, जिसे हर इंसान को समझना चाहिए, फिर चाहे हम सड़क पर गाड़ी चला रहे हों या फिर अपना बिजनेस चला रहे हों अथवा कुछ भी कर रहे हों। अगर आप नियम तोड़ेंगे तो आप इस देश को नुकसान पहुँचाएँगे, इस देश को तोड़ेंगे। जो देश बेहतरीन काम कर रहे हैं, कम से कम अपने लिए बेहतर काम कर रहे हैं, उन सबने अपने लिए बाकायदा नियम व कानून बनाए, और वहां हर इंसान को उन कानूनों व नियमों के मुताबिक चलना होता है।

अगर हम अपने समाज को बस थोड़ा सा खिलंदड या और आनंदमय बना लें तो जीवन की कई कठिनाइयां, देश की कई विकट स्थितियां सहज हो सकती हैं।
जबकि भारत में हम नियमों को लेकर अभी भी संदेह से भरे रहते हैं। अफसोस की बात है कि अभी कई लोगों के दिमाग में अकसर यह सवाल घूमता है कि उन्हें नियमों का पालन करना चाहिए या नहीं। आपको पता ही है कि अगर नियम नहीं तो खेल भी नहीं। आप आधे अधूरे मन से अपने दफ्तर जा सकते हैं, अधूरे मन से जिंदगी जी सकते हैं, अधूरे मन से शादी भी कर सकते हैं, लेकिन आप आधे मन से कोई खेल नहीं खेल सकते। आपको खुद को पूरी तरह से खेल में झोंकना होगा वर्ना खेल होगा ही नहीं।

स्वामी विवेकानंद का खेल से जुड़ा संदेश

आप जानते हैं, स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘गीता पढ़ने की बजाय फुटबॉल खेलने से आप स्वर्ग के ज्यादा नजदीक पहुँच सकते हैं।’ जब आप प्रार्थना करते हैं तो आप साथ में बहुत सारी चीजें सोच सकते हैं। लेकिन जब आप फुटबॉल को किक मारते हैं तो आप सिर्फ किक ही मार रहे होते हैं, और कुछ नहीं कर रहे होते। अगर आप कुछ और करेंगे तो वह बॉल वहां नहीं जा पाएंगी, जहां आप इसे पहुँचाना चाहते हैं। खेल आपके भीतर यह समझ लाता है कि किसी भी चीज में बिना पूरी सहभागिता के सफलता नहीं पाई जा सकती। आपको खेल को इस तरह से खेलना होता है, मानो आपकी जिंदगी उसी पर टिकी हो।

अब समय आ गया है कि हम उन सब चीजों को वापस लाएं, खासकर ग्रामीण समाज में इसकी काफी जरूरत है। वर्ना भारत में खेती अपने आप में दिल तोड़ने़ वाला काम है। इन्हीं कारणों से अपने यहां काफी मात्रा में हर साल किसान आत्महत्या करते हैं।
कहते हैं कि पिछले फुटबॉल वर्ल्ड कप का फाइनल मैच लगभग सवा तीन अरब लोगों ने देखा। यह आबादी दुनिया की लगभग आधी आबादी हुई और यह तादाद दुनिया की तमाम वयस्क आबादी के बराबर है। ये सवा तीन अरब लोग उन ग्यारह लोगों को खेलते देख रहे थे, जो बॉल को एक दिशा में पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे, जबकि दूसरे ग्यारह खिलाड़ी उसी बॉल को दूसरी दिशा में पहुँचाना चाह रहे थे। बेशक आप यहां एक दार्शनिक सवाल पूछ सकते हैं, ‘आखिर इसमें रखा क्या है?’ बुनियादी रूप से हम खेल को बॉल की वजह से, या खिलाड़ी के कौशल की वजह से नहीं देखते, बल्कि हम खेल को इसलिए देखते हैं कि कोई बॉल को इस तरह से मार रहा है, मानो उसका जीवन उसी पर निर्भर हो। किसी भी चीज में डूबने या उतरने की यह ऐसी प्रबलता या गहराई है, जो पूरी दुनिया को इसे तल्लीनता से बैठकर देखने के लिए मजबूर करती है।

तीव्रता से खेल आध्यात्मिक प्रक्रिया बन जाते हैं

इंसान में मौजूद प्रबलता या तीव्रता ही होती है, जो उसे उसकी सीमाओं से परे ले जाती है। संपूर्ण आध्यात्मिक प्रक्रिया का मतलब ही यह है कि आप किसी तरह से अपनी सीमाओं से परे जाकर उस आयाम का अनुभव करें, जिसके बारे में अभी तक आप जानते ही नहीं थे। खेल में ऐसे कई मौके होते हैं, जहां इंसान अपने सीमा से परे चला जाता है। यह बात सिर्फ वल्र्ड कप, ओलिंपिक या दूसरे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक ही सीमित नहीं है। यह चीज यहां ग्रामोत्सव में भी हो सकती है।

इंसान में मौजूद प्रबलता या तीव्रता ही होती है, जो उसे उसकी सीमाओं से परे ले जाती है। संपूर्ण आध्यात्मिक प्रक्रिया का मतलब ही यह है कि आप किसी तरह से अपनी सीमाओं से परे जाकर उस आयाम का अनुभव करें, जिसके बारे में अभी तक आप जानते ही नहीं थे।
जो लोग पूरी तीव्रता के साथ खेलते हैं, वे अपनी मौजूदा सीमाओं यानी जो वे हैं, उससे परे निकल जाते हैं। खेल आपको यही देता है। जीतने की इच्छा के बिना कोई खेल नहीं होता। लेकिन अगर आपकी इच्छा है कि केवल आप ही जीतें तो फिर खेल का मतलब ही नहीं रह जाता। यह जीवन के हर क्षेत्र का एक ऐसा बुनियादी सिद्धांत है, जिसके बारे में सभी को जानना चाहिए। आप केवल तभी सफल हो सकते हैं, जब आप जीतना चाहते हैं। लेकिन अगर आप हारते भी हैं तो आपको खराब नहीं लगना चाहिए।

भारत : बिना वजह के खेल-मग्न रहते थे हम

ईशा ग्रामोत्सव के बारह सालों का यह सफर अपने आप में बेहद सफल रहा है। जो लोग कुछ अर्से से खेल रहे हैं, अगर आप जीवन व लोगों के प्रति उनका व्यवहार देखें तो आप पाएंगे कि वे जाति, समुदाय, लिंग भेद जैसी चीजों से ऊपर उठ गए हैं। यह अपने आप में विकास है। अपने जीवन में खेलभावना लाइए। इसके लिए आपको खेल के कोई महंगे सामानों की जरूरत नहीं पड़ेगी, बस एक बाॅल ले लीजिए। अपने बच्चे की तरफ, अपने पति की तरफ या अपनी पत्नी की तरफ बस बॉल फेकिए। अगर आपके पास बाॅल नहीं है तो आलू ले लीजिए। यह मत सोचिए कि यह मूर्खता है। अपने अंदर खिलाड़ीपन लाइए, क्योंकि बिना खेलभाव के जीवन में कोई उत्सव नहीं है।

मैं चाहता हूं कि पूरा देश ऐसा बने कि जहां बिना किसी वजह के लोग नाच सकें, गा सकें, हंस सके और खुशियां मना सकें। जीवन अपने आप में आयोजन का एक पर्याप्त कारण है।
हो सकता है कि आप खेल में चैंपियन न हों, लेकिन आप एक खेल से जुड़े हैं, यही चीज मायने रखती है। यह बेहद जरूरी है कि हम एक खेल-पसंद या खिलाड़ी देश बन जाएं। भारत से अगर इसका हंसी खेल का भाव छिना है तो इसका एक कारण अतीत में इसकी गुलामी रही है। यह देश पिछली आठ से दस पीढ़ियों तक भयानक गरीबी में रहा है, अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में हमने अपने खिलंदड़पन को छोड़ दिया। यह एक ऐसी धरती रही है, जहां लोग बिना किसी वजह के नाचते-गाते थे। यह एक ऐसी धरती रही है, जहां की खेति का समाज रहा है और खेति के हर मौके के लिए खास गीत और नृत्य होता था।

खेल, नृत्य और आनंद की संस्कृति वापस लानी होगी

हमें उत्सव मनाने या आयोजन के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती थी। हमारी परंपरा में साल का हर दिन अपने आप में एक उत्सव होता था। हमने अपने काम और जीवन की तमाम घटनाओं को एक उत्सव बना दिया था। यह देश अपने आप में बेहद खिलंदड़ और खुशहाल था। अब धीरे-धीरे इसकी आर्थिक समृद्धी फिर से बढ़ रही है, अब वह समय आ गया है कि इसमें खेल का भाव वापस लाया जाए। मैं कहना चाहूंगा कि आने वाले पांच से दस सालों में हम आर्थिक तौर पर पहले से बेहतर होंगे। लेकिन हम एक ऐसी जगह आ गए रहे हैं जहां अगर आपको किसी आदमी को नाचते देखना है तो आपको उसे शराब के नशे में डुबोना होगा।

यही वह चीज है, जिसे ईशा बदलने की कोशिश कर रहा है। हम आपको ऐसी जगह पर ले जाना चाहते हैं, जहां आप बिना किसी कारण नाच सकें। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे लोग क्या सोंचेगे।

अगर आज एयरकंडीशंड सुपर मार्केट के शेल्फ भरे पड़े हैं तो हमें इसके लिए किसानों का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो आधा पेट खाकर आत्महत्या के कगार पर पहुँच चुके हैं। अब समय आ गया है कि हम उनकी जिंदगी बदल दें।
मैं चाहता हूं कि पूरा देश ऐसा बने कि जहां बिना किसी वजह के लोग नाच सकें, गा सकें, हंस सके और खुशियां मना सकें। जीवन अपने आप में आयोजन का एक पर्याप्त कारण है। ईशा ग्रामोत्सव के पीछे यही भाव है। यही वजह है कि हमने इसमें ग्रामीण जीवन के सभी पहलुओं को शामिल किया है। तमिलनाडु में कला की तमाम विधाएं व स्वरूप और उत्सव के तमाम रूप हुआ करते थे। हम लोग उनमें से कम से कम कुछ को गांवों में जीवंत रखने की कोशिश कर रहे हैं। अगर आदमी अपनी संस्कृति खो देगा तो वह अपना दिल खो बैठेगा। एक हृदयहीन समाज ज्यादा दूर तक नहीं जा सकता। किसी भी समाज को एक अच्छी जगह बनाने के लिए एक बड़े दिल की जरूरत होती है।

ग्रामीण आबादी को खेल-मग्न होने की जरूरत है

अगर हम अपने समाज के संगीत, नृत्य व अन्य कौशलों को भूल जाएंगे तो हम अपनी संस्कृति का दिल खो बैठेंगे। अब समय आ गया है कि हम उन सब चीजों को वापस लाएं, खासकर ग्रामीण समाज में इसकी काफी जरूरत है। वर्ना भारत में खेती अपने आप में दिल तोड़ने़ वाला काम है। इन्हीं कारणों से अपने यहां काफी मात्रा में हर साल किसान आत्महत्या करते हैं। केवल संगीत, नृत्य, उत्सव और जमीन के साथ संपूर्ण जुड़ाव के भाव से ही खेती को अच्छे से किया जा सकता है।

आप सभी को अपने घरों व जीवन में खेल का थोड़ा सा भाव लाने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। ग्रामोत्सव का लक्ष्य ही ग्रामीण जीवन में खेल से जुड़े आनंद का भाव लाना है।
अन्यथा हर व्यक्ति शहर की ओर पलायन करना चाहेगा। अगर हर व्यक्ति शहर की तरफ आ गया तो सुपर मार्केट में खरीदने के लिए कुछ नहीं होगा। अगर आज एयरकंडीशंड सुपर मार्केट के शेल्फ भरे पड़े हैं तो हमें इसके लिए किसानों का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो आधा पेट खाकर आत्महत्या के कगार पर पहुँच चुके हैं। अब समय आ गया है कि हम उनकी जिंदगी बदल दें। भले ही उनकी आर्थिक स्थिति रातों रात या एकदम से ना भी बदल पाएं तो निश्चित तौर पर हमें उन्हें हंसना, गाना, नाचना, खेलना और बाॅल फेकना सिखाना चाहिए, ताकि वे खुश रह सकें।

खेल की भावना आने से देश रूपांतरित होने लगेगा

अपने बच्चों और देश के विकास के लिए यह बेहद जरूरी है कि हम खिलंदड़ और खुशदिल बनें। अगर हम अपने समाज को बस थोड़ा सा खिलंदड या और आनंदमय बना लें तो जीवन की कई कठिनाइयां, देश की कई विकट स्थितियां सहज हो सकती हैं। अगर जीवन में जरा भी आनंद या खुशी नहीं होगी तो जीवन की आसान सी प्रक्रिया भी बोझ और निराशा बन सकती है।

यह एक ऐसी धरती रही है, जहां लोग बिना किसी वजह के नाचते-गाते थे। यह एक ऐसी धरती रही है, जहां की खेति का समाज रहा है और खेति के हर मौके के लिए खास गीत और नृत्य होता था।
आप सभी को अपने घरों व जीवन में खेल का थोड़ा सा भाव लाने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। ग्रामोत्सव का लक्ष्य ही ग्रामीण जीवन में खेल से जुड़े आनंद का भाव लाना है। कई वजहों से बतौर एक देश हम उन्हें एक सम्मानित जीवन जीने के लिए बुनियादी व आवश्यक चीजें नहीं उपलब्ध करा पा रहे।

ऐसे में हम कम से कम उनके जीवन में नृत्य, गीत, संगीत, खेल व संस्कृति तो ला ही सकते हैं। फिलहाल लोगों को लग सकता है कि 4,500 गावों तक पहुँचना बड़ी बात है। लेकिन अकेले तमिलनाडु में ही 53,000 गांव हैं। अब हम आंध्र प्रदेश की सरकार के जबरदस्त सहयोग से वहां के कुछ खास जिलों में भी जा रहे हैं। साथ ही, मुझे विश्वास है कि हम पुद्दुचेरी में भी यह लौ जगा देंगे। मैं आप सभी से गुजारिश करना चाहूंगा कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए आप जैसे और जिस तरीके से भी हो, ग्रामोत्सव में भागीदारी बनाइए। आइए हम फिर से एक खेल-मग्न देश बनें।

प्रेम व प्रसाद,

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