अनन्त को पाने की तड़प

अनन्त को पाने की तड़प

अनन्त को पाने की तड़प
 अनन्त को पाने की तड़प ने

दी मुझे वो दृष्टि

जो बचपन से ही देख पाती थी

उसके भी परे जो होता सामने मेरे

परे की वह दृष्टि

नहीं थी दूर या निकट के लिए

वह चाहती थी जाना हर सीमा से परे

जो सीमित है, देख पाता था बंधन उसमें

पर उसके साथ कभी तुष्ट नहीं हो पाया मैं

 

परम तत्व बरसा मुझ पर वाह खूब

अपनी आभा और आनंद से भरपूर,

जिसने किया मुझे मानवता से कुछ यूं धन्य

जैसे हुआ न था कोइ मानव अन्य

जिसने मिटा दी-उस विभाजक रेखा को

करती है जो अलग, मानवता और दैविकता को

 

पर हैं इस सीमित के भी

मजे अलग, तमाशे अलग

देखो है यह संसार सीमित,

सीमित यह तन, मन भी सीमित

है ये पूरी रचना ही सीमित।

 

सकल रचना व उसकी शक्तियां सारी

है अंकों का एक खेल भारी

जो खेली जाती है

शून्य की सीमाओं में।

 

असीमित शून्य ने ही तो दिया

अंकों की इस माया को जन्म

बेशक मेरा क्षेत्र है अनंत

पर खेल लेता हूं मैं

उतनी ही कुशलता से

अंकों का यह खेल भी। 

प्रेम व प्रसाद,

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