कर्म: एकमात्र बंधन

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सद्‌गुरुअक्सर जीवन की बुरी परिस्थितियों की वजह हम अपने बुरे कर्मो को मानते है। सद्‌गुरु बता रहे कि कैसे हम ऐसी परिस्थितियों का इस्तेमाल मुक्ति की और बढ़ने के लिए कर सकते हैं…

जिज्ञासु: सद्‌गुरु, अगर मैंने किसी पूर्व जीवन में, अचेतनतावश बहुत सारे बुरे कर्म इकट्ठे कर रखे हों, तो क्या उसकी वजह से मुझे इस जीवन में कष्ट सहना पड़ेगा? क्या मुझे उसके बदले में अच्छा कर्म करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए?

अच्छे कर्म का मतलब अच्छा कार्य नहीं होता, बल्कि इसका मतलब उन कार्यों से है, जो एक अच्छे संकल्प के साथ किए जाते हैं।

सद्‌गुरु 

अगर आप केवल एक आरामदायक जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं, तो अच्छे कर्म सहायक होते हैं। अच्छे कर्म का मतलब अच्छा कार्य नहीं होता, बल्कि इसका मतलब उन कार्यों से है, जो एक अच्छे संकल्प के साथ किए जाते हैं। यही वजह है कि हर जगह प्रेम के बारे में इतनी सारी बातें की गई हैं। प्रेम में आप अच्छे कर्म करेंगे। जब आप अच्छे कर्म करेंगे, तो आपका जीवन आरामदायक बन जाएगा, अच्छे कर्म बस इसीलिए उपयोगी हैं। जब आपका प्रेम हर भेद-भाव को तोड़ कर बस एक प्रवाह बन जाता है, तो फिर यह मुक्ति की एक प्रक्रिया बन जाती है। अगर सारे भेदभाव न टूट सकें, तब भी, प्रेम में अच्छे कार्य खुद-ब-खुद होते हैं।

आप अकसर लोगों के कामों को देखकर उनके अच्छे या बुरे का फैसला कर लेते हैं। लेकिन मैं आपको एक बात बता दूं कि ये तथाकथित ‘अच्छे’ लोग कभी भी पूरी लग्न के साथ कोई काम नहीं कर सकते। वे विश्वासघाती होते हैं। वे खुद कभी कोई काम नहीं करते, क्योंकि वे बहुत बड़े धूर्त होते हैं। वे जानते हैं, जैसे ही वे काम करना शुरू करेंगे, किसी न किसी तरह से उनके बारे में पता चल ही जाएगा। ये ‘अच्छे’ लोग वास्तव में धोखेबाज होते हैं। लेकिन इससे किसी को कर्म की प्रक्रिया से मुक्ति नहीं मिलती। अगर आप अपनी अच्छाई या विवेक के चलते खुद को या अपने कर्मों को संयमित करके रखते हैं, तो यह अलग बात है। लेकिन अगर आप परिणामों से डरकर खुद को रोक कर रखते हैं तो फिर कर्म बहुत अलग होते है।

इस संसार में, ये ‘अच्छे’ लोग ही वास्तव में अपराधी हैं। चूंकि ये कभी कुछ नहीं करते, इसलिए कभी पकड़े भी नहीं जाते। यही वे लोग हैं, जो सबसे बुरे तरह का कर्म करते हैं, भले ही ये लोग कार्य के रूप में कर्म न करके विचारों में करें। ये लोग हरेक छोटी-छोटी चीज के लिए अपने भीतर पूरी दुनिया की हत्या करने के लिए तैयार रहते हैं। ये लोग अपने भीतर घृणा व ईष्र्या से भरे होते हैं, लेकिन ये बाहर में कुछ भी गलत नहीं करते, क्योंकि या तो ये कमजोर होते हैं या उनके पास जवाब देने की हिम्मत नहीं होती या फिर ये निपट धूर्त होते हैं। यही एकमात्र चीज है, जो उन्हें रोके रहती है।

मान लीजिए, एक व्यक्ति है, जिसके पास बड़ा-सा सुंदर घर, एक आदर्श पत्नी और खूबसूरत जीवन है, फिर भी उसके जीवन में कुछ न कुछ ऐसा घटित होगा, जो उसे जीवन की सच्चाई की याद दिलाएगा। जीवन के अपने ही तरीके हैं। एक बार एक व्यापारी हवाई जहाज से यात्रा कर रहा था। उसकी सीट एक उच्च वर्ग के परिवार की महिला के बगल में थी। उसने देखा कि उस महिला ने एक बहुत बड़ी अचंभित करने वाली हीरे की अंगूठी पहनी हुई थी। ऐसी अंगूठी उसने पहले कभी नहीं देखी थी। अंगूठी को देखकर वह ठगा सा रह गया, विस्मित होकर बोला, ’वाह! आपके पास इतनी सुंदर अंगूठी है।’ महिला ने जवाब दिया, ‘हां, यह श्रोइडर हीरा है। यह सुंदर है, लेकिन यह एक भयंकर श्राप के साथ मिला है।’ ‘कौन सा श्राप?’ व्यापारी ने पूछा। ‘श्रीमान श्रोईडर,’ महिला ने जवाब दिया।

जब एक व्यक्ति पूरी चेतनता के साथ आध्यात्मिक मार्ग पर चलता है, केवल तभी वह उन सभी बंधनों को तुरंत तोड़ कर आगे बढ़ सकता है।
इसलिए जीवन में कुछ न कुछ आएगा ही। अगर सब कुछ ठीक है तो अचानक कोई एक समस्या खड़ी हो जाएगी, आपको चिंतित करने लगेगी, आपको चुभने लगेगी। अगर ऐसा न हो तो आप जीवन को भूल जाएंगे और भगवान बनने का प्रयास करने लगेंगे। इस तरह आप अपनी सीमाओं को भूल जाएंगे, इसलिए कुछ न कुछ आएगा। यही आपका कर्म है। कर्म, बंधन की एक प्रक्रिया के द्वारा आपको मुक्ति की याद दिलाने के लिए, आपके लिए ही प्रकट हो रहा होता है। अगर आप जागरूक नहीं हैं, तो उसके साथ उलझ जाएंगे। अगर जागरूक हैं, तो फिर यह आपकी मुक्ति का एक मार्ग बन जाता है।

अपनी सीमाओं को जानने वाले व्यक्ति के जीवन में अगर कोई मुश्किल परिस्थिति आती है, तो वह उससे कतई प्रभावित नहीं होता। वह परिस्थिति उसे छू भी नहीं पाती। मान लो कि किसी साधारण परिवार ने अपना बच्चा गंवा दिया। अगर उनका बच्चा मर जाता है, तो उस वक्त उन्हें थोड़ा सा झटका लगता है; लेकिन अगले ही क्षण वे उसे भूल जाते हैं। एक दूसरे तरह के लोग हैं, जिनका बच्चा दस साल पहले मरा, लेकिन आज भी वे उस पीड़ा को भोग रहे हैं। केवल अपने विचारों से वे खुद को पीड़ित करते हैं। यही कर्म है।

यह मायने नहीं रखता कि जीवन में क्या घटित हो रहा है। इस के बावजूद हम कर्म की धार की तीक्ष्णता को मंद कर सकते हैं। जब तक आप अध्यात्म के मार्ग पर नहीं हैं, हो सकता है कि आप सब कुछ तुरंत न मिटा सकें। एक व्यक्ति जो आध्यात्मिक मार्ग पर नहीं है, अगर उसके पास विवेक है, तो वह भी कर्म की धार की तीक्ष्णता को मंद कर सकता है और उसे बहुत हद तक प्रभावहीन बना सकता है। केवल कुछ ही कर्म-बंधन ऐसे हैं, जो वास्तव में प्रभाव दिखाएं, दूसरे बंधनों को कम किया जा सकता है। जब एक व्यक्ति पूरी चेतनता के साथ आध्यात्मिक मार्ग पर चलता है, केवल तभी वह उन सभी बंधनों को तुरंत तोड़ कर आगे बढ़ सकता है।


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