कर्म करते हुए भी रहें कर्मों से अछूते

कर्म करते हुए भी रहें कर्मों से अछूते
कर्म करते हुए भी रहें कर्मों से अछूते

अगर आप किसी विशुद्घ और उमंगपूर्ण काम में लग जाते हैं तो आप देखेंगे कि वह कर्म आपकी ऊर्जा का उपभोग नहीं कर रहा है, बल्कि वह ऊर्जा पैदा करता है…  ऐसा करने से आखिर में आपकी थकान दूर हो जाएगी और आप शक्ति से भर जाएंगे।

 

प्रश्‍न:

सद्‌गुरु, मैं गीता के चौथे अध्याय के अठारहवें श्लोक को लेकर थोड़ा परेशान हूं, जिसमें कहा गया है, “जो व्यक्ति कर्म में कर्महीनता और कर्महीनता में कर्म को पहचान लेता है, वही इस मानव-समाज में बुद्धिमान है। सभी कामों को करते हुए भी ऐसे व्यञ्चित का झुकाव अध्यात्म की ओर होता है।”

 

सद्‌गुरु:

आप कर्महीनता की अवस्था में कई तरह के कर्म कर सकते हैं। योग के मुख्य रूप से चार मार्ग हैं। आप चार तरीकों से परम तक पहुंच सकते हैं – शरीर द्वारा, बुद्धि द्वारा, भावनाओं द्वारा और अपनी ऊर्जा द्वारा। अगर आप किसी विशुद्घ और उमंगपूर्ण काम में लग जाते हैं तो आप देखेंगे कि वह कर्म आपकी ऊर्जा का उपभोग नहीं कर रहा है, बल्कि वह ऊर्जा पैदा करता है।

वह वही करते थे जो उन्हें कम गलत लगता था। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि यही कर्म महान है। वह बस यह कहते थे कि जो भी काम आपको कम गलत लगे, उसे ही करें, क्योंकि हमारे पास बस यही विकल्प मौजूद है।
अगर आप थोड़ा थक गए हैं तो आप उठें और अपने कार्य का आनंद लेने के लिए बस नाचना शुरू कर दें। ऐसा करने से आखिर में आपकी थकान दूर हो जाएगी और आप शक्ति से भर जाएंगे। शारीरिक क्रियाकलापों द्वारा जीवन-रस को पाना ही रास है।

 

अगर आपकी जागरूकता एक खास स्तर पर पहुंच चुकी है, तो दिनभर सक्रिय रहने के बावजूद भी आपमें भरपूर ऊर्जा बची रहेगी। आपमें से जो लोग सम्यमा कार्यक्रम कर चुके हैं, उन्होंने यह जरूर गौर किया होगा कि जब आप ध्यान के साथ लय में आ जाते हैं तो आप हर समय जागरूक महसूस करते हैं। जब आप जागरूक हो जाते हैं तो एक बार फि र कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म घटित होता है। अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ हैं जिसे आप बहुत प्यार करते हैं, अगर आप भीतर से प्रेममय हैं, तो आपको लगेगा कि आप ऊर्जा पैदा कर रहे हैं, उसे खर्च नहीं कर रहे हैं। यदि आपको अपनी ऊर्जाओं को सीधे उत्तेजित करना आता है तब भी आप ऐसा महसूस करेंगे। अगर आप सुस्त हैं तो मैं आपके लिए ऐसा कुछ कर सकता हूं जो आपको लंबे समय तक पूरी तरह से जागरूक रखेगा।

 

इन चारों तरीकों के उपयोग से कोई भी अकर्म में कर्म और कर्म में अकर्म कर सकता है। अगर आप पूरी तरह से कर्म में हैं और सौ प्रतिशत शारीरिक कार्य कर रहे हैं तो ऐसा होगा। कृष्ण ने अर्जुन से यही कहा था – ‘इन सारे रिश्तों की परवाह मत करो। कौन तुम्हारे पितामह हैं, कौन गुरु हैं और कौन तुम्हारा क्या है। इस युद्ध में खुद को सौ प्रतिशत समर्पित कर दो। यदि तुम अकर्म में कर्म और कर्म में अकर्म करते हो, तो अगर तुम यह लड़ाई जीत गए तो राजा बन जाओगे। अगर तुम मारे गए तो भी परम सत्ता तक पहुंच ही जाओगे।

 

तो चाहे यह प्रेम के वशीभूत होकर किया जाए या फल की इच्छा के बिना सहज और विशुद्ध कर्म के भाव से किया जाए या फिर भीतरी ऊर्जा को उकसाकर किया जाए, कोई इंसान एक ही समय में सक्रिय और निष्क्रिय दोनों हो सकता है। अगर आप खुद को शून्य की स्थिति में ले आते हैं, तो आप निष्क्रियता में भी सक्रिय हैं, क्योंकि इस काम का आधार विश्रांति है। आप विश्रांति की अवस्था में जितना ज्यादा होंगे, सक्रिय रहने की आपकी क्षमता उतनी ही ज्यादा होगी। अगर आप बेचैन हैं तो आपके कार्य करने की शक्ति चली जाएगी। दुर्भाग्य से ज्यादातर लोग हमेशा यही सोचते हैं कि बेचैन रहकर ज्यादा सक्रिय हो जाएंगे। वे ऐसा ही करते हैं, लेकिन आगे चलकर यह कर्म जिंदगी के लिए घातक साबित होगा, न कि फलदायक। यह इंसान को बर्बाद कर देता है। अगर ऐसे कर्म किया जाए जो केवल आपको ही फायदा न पहुंचाए तो वह वास्तविक कर्म होता है। आपके कार्य करने की क्षमता लगभग असीमित होती है। एक इंसान दिन के चौबीस घंटे सक्रिय रह सकता है, उन सभी चीजों के बिना भी जिनकी शरीर को आमतौर पर जरूरत होती है।

 

“ऐसे व्यक्ति का झुकाव अध्यात्म की ओर होता है,” इस बात का मतलब है कि वह व्यक्ति कोई भी काम कर रहा हो, वह आध्यात्मिक ही रहता है। उसे आध्यात्मिक होने के लिए केवल ध्यान करने की जरूरत नहीं है। वह खाना बनाते हुए, सफाई करते हुए, चलते-फिरते या फिर अपनी मर्जी का कुछ भी काम करते हुए भी वह आध्यात्मिक हो सकता है। जो व्यक्ति निष्क्रियता में सक्रिय है और सक्रियता में निष्क्रिय, वह जो कुछ भी करता है, सब अध्यात्म ही होता है। ऐसे व्यक्ति की हर एक सांस आध्यात्मिक क्रिया है। उसे आध्यात्मिक बनने के लिए कुछ खास क्रिया करने की जरूरत नहीं होती। अगर आपका प्रेम एक खास सीमा से आगे बढ़ जाता है या आपकी जागरुकता एक खास स्तर तक चली जाती है तब ऐसा होगा। अगर आपकी ऊर्जा की गूंज किसी खास सीमा को पार कर जाती है या फिर अगर आप पूरी तरह से स्थूल या शारीरिक हो जाते हैं, तो ऐसा होगा। कई लोगों के लिए खुद को पूरी तरह से शारीरिक करना सबसे कठिन होता है क्योंकि आप जो भी काम करते हैं, उसमें आपका मन भी शामिल होता है। मान लें कि आप एक घंटे डांस करते हैं तो आप कुछ पल ही ऐसे पाएंगे जिनमें आपका दिमाग काम करना बंद कर देता है और आप सिर्फ  एक शरीर हो जाते हैं। बाकी के समय आप जो कुछ भी कर रहे हैं, उसमें आपका दिमाग आपको तमाम चीजें बता रहा होगा, न केवल आपके बारे में बल्कि दुनिया के तमाम लोगों के बारे में।

 

जागरूक होना संभव है लेकिन जागरूकता को कायम रखना…पूरे दिन में बस कुछ पल ही जागरूकता के होते हैं। जागरूकता हर समय नहीं रह सकती। ऊर्जा एक ऐसी चीज है जिस पर आप काम कर सकते हैं, क्योंकि उसके लिए तमाम तरह की विशेष प्रक्रियाएं होती हैं। भावनाएं ऐसी चीज हैं जिन्हें आप आसानी से बनाए रख सकते हैं। ज्यादातर लोग जागरूकता या अपनी भौतिकता को कायम रखने की तुलना में अपनी भावनाओं को लंबे समय तक कायम रख सकते हैं। हर रोज लोग प्यार में पड़ते और निकलते हैं, फिर भी यही वो काम है जिसे वो अच्छे से कर सकते हैं। आपको अच्छा लगे या न लगे, लेकिन अगर आप रोज सुबह बैठकर क्रिया करते हैं, तो वह खुद ही काम करती है। तो आपमें से अधिकतर लोग इसी तरह से बने हुए हैं कि अपनी ऊर्जा के स्तर को बढ़ाना और अपनी भावनाओं को बनाए रखना आपके लिए सबसे सरल है।

 

प्रश्‍न:

सद्‌गुरु, अगर आप युद्ध में अर्जुन के साथ होते तो क्या आपको उसे कर्म के लिए प्रेरित करने के लिए सात सौ श्लोक और अठारह अध्याय बोलने की जरूरत थी?

 

सद्‌गुरु:

अर्जुन को सिर्फ कर्म के लिए प्रेरित करने के लिए कृष्ण को अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक बोलने की जरूरत नहीं थी। दरअसल, निराशा के उन पलों में अर्जुन सब कुछ जान लेना चाहता था, इसलिए कृष्ण ने उसे हर चीज विस्तार से बताई थी। कृष्ण इससे पहले भी कई बार उसके साथ थे, लेकिन उससे पहले तक अर्जुन कृष्ण से केवल यह जानना चाहते थे कि अपनी पसंद की किसी राजकुमारी को कैसे हासिल किया जाए, एक और युद्ध कैसे जीता जाए या किसी राज्य पर कब्जा कैसे किया जाए। ऐसी मुसीबत या कहें कि मौत को सामने देख कर अर्जुन के अंदर एक आध्यात्मिक जिज्ञासा पैदा हुई। वह कृष्ण से सारी संभावनाएं जानना चाहता था। इसलिए उसने कृष्ण से बहुत से सवाल कर डाले। कृष्ण इतने दयालु थे कि उन्होंने उसके सारे सवालों के जवाब दिए, बजाय इसके कि वह उसे चुपचाप कर्म करने के लिए कहते।

 

उन दिनों जब तक कृष्ण अपना शंख नहीं बजाते थे, तब तक युद्ध शुरू नहीं होता था, इसलिए वो अर्जुन को अठारह अध्यायों का ज्ञान दे पाए। ज्ञान देने के बाद ही उन्होंने अपना शंखनाद किया।

वह वही करते थे जो उन्हें कम गलत लगता था। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि यही कर्म महान है। वह बस यह कहते थे कि जो भी काम आपको कम गलत लगे, उसे ही करें, क्योंकि हमारे पास बस यही विकल्प मौजूद है।
अगर आज के जमाने में युद्ध होता तो मैं आपको कोई भी ज्ञान दिए बगैर तुरंत कर्म करने के लिए कह देता, क्योंकि आपके विरोधी आपके वार करने से पहले ही आप पर हमला कर देते। लेकिन उस वक्त लड़ाई कुछ खास नियमों के तहत लड़ी जाती थी। हालांकि वह युद्ध अमानवीय था, लेकिन फि र भी कुछ हद तक उसमें मानवीयता का अंश था। शाम को युद्ध खत्म होने के बाद वे लोग एक-दूसरे के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते थेे। साथ प्रीतिभोज करते और अगले दिन फि र एक-दूसरे से लडऩे लगते। यह अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक केवल इसलिए नहीं बने कि कृष्ण अपना संदेश देने में सक्षम नहीं थे, बल्कि इसकी वजह यह थी कि अर्जुन को समझाने के बहाने वह सारे पहलुओं को स्पष्ट कर देना चाहते थे।

 

यह बेहद महत्वपूर्ण है कि गीता का उपदेश युद्ध के मैदान में दिया गया था। कृष्ण युद्ध के मैदान में थे, फिर भी वह सबको साथ लेकर चलते थे। खुद वह एक तरफ पांडवों के साथ खड़े थे और अपनी भीषण यादव सेना को उन्होंने दूसरी तरफ  अपने विरुद्ध खड़ा कर दिया था। यह सबको साथ लेकर चलना ही तो था। या तो आप पागल हों या कोई देव हों, केवल तभी आप ऐसा काम कर सकते हैं, क्योंकि इसके अलावा तो आप इस तरह का काम कर ही नहीं सकते। जब आप कोई लड़ाई लडऩा चाहते हैं तो जाहिर है आप हमला करने से पहले जितना भी हो सके, ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी तरफ  करना चाहते हैं। जंग के मैदान में अपनी सेना और इतने सारे प्रिय लोगों को दूसरी ओर खड़ा देखकर भी उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। कौरवों के लिए उनके मन में कोई कड़वाहट नहीं थी और न ही उनमें पांडवों के लिए प्यार कम था। वह वही करते थे जो उन्हें कम गलत लगता था। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि यही कर्म महान है। वह बस यह कहते थे कि जो भी काम आपको कम गलत लगे, उसे ही करें, क्योंकि हमारे पास बस यही विकल्प मौजूद है।

यह अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक केवल इसलिए नहीं बने कि कृष्ण अपना संदेश देने में सक्षम नहीं थे, बल्कि इसकी वजह यह थी कि अर्जुन को समझाने के बहाने वह सारे पहलुओं को स्पष्ट कर देना चाहते थे।


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