कैसे मुक्‍त हों हम विचारों की आपाधापी से?

कैसे मुक्त हो अपने विचारों की आपाधापी से
कैसे मुक्त हो अपने विचारों की आपाधापी से

सद्‌गुरुहमारा जीवित होना या फिर अस्तित्व में होना, और हमारी सोचने की क्षमता ये दो अलग-अलग चीज़ें हैं। आइये अरस्तू और हेराक्लीटस की कहानी के द्वारा यह जानते हैं कि किस तरह हम अपनी विचारों में खो जाते हैं, और यह भूल जाते हैं कि हमारी मौजूदगी ही हमारे विचारों की बुनियाद है।

हमारा होना पहले या फिर हमारे विचार पहले हैं?

किसी दार्शनिक का यह कथन है – ‘मैं सोच सकता हूं, इसीलिए मैं हूं।’ क्या यह वाकई सच है? आपका अस्तित्व है, सिर्फ इसलिए आप कोई विचार उत्पन्न कर पाते हैं। आप अपने विचार-प्रक्रिया के इतने गुलाम हो गए हैं कि आपका ध्यान अपने अस्तित्व से हटकर पूरी तरह सोच की ओर चला गया है। वह भी इस हद तक कि अब आप यह मानने लगे हैं कि आपका अस्तित्व ही आपकी सोच की वजह से है। मैं आपको बता दूं कि आपके मूर्खतापूर्ण विचारों के बिना भी आपका अस्तित्व हो सकता है। देखा जाए तो आप सोच ही क्या सकते हैं? बस वही बकवास जिसे आपने अपने दिमाग में इकट्ठा कर रखा है और उसे ही बार-बार सोचते रहते हैं। आपके दिमाग में जो भी पहले से भरा हुआ है, उसके अलावा क्या आप कुछ और सोच सकते हैं? आप बस पुराने आंकड़ों को रिसाइकिल कर रहे हैं। अब यह रिसाइकलिंग ही इतनी अहम हो गई है कि लोग यह तक कहने की हिम्मत कर लेते हैं, ‘मैं सोचता हूं, इसलिए मैं हूं।’ और यही दुनिया की जीवनशैली हो गई है।

दरअसल आप हैं, आपका अस्तित्व है इसलिए आप सोच सकते हैं। अगर आप चाहें, तो आप पूरी तरह अपने अस्तित्व को बनाए रख सकते हैं और वह भी बिना सोचे। आपके जीवन के सबसे खूबसूरत पल – आनंद के पल, खुशी के पल, परमानंद के पल, नितांत शांति के पल – ऐसे पल थे, जब आप किसी चीज के बारे में सोच नहीं रहे थे। आप बस जी रहे थे।

आप एक जीवित प्राणी होना चाहते हैं या विचारों में डूबा प्राणी? फिलहाल नब्बे फीसदी समय आप जीवन के बारे में सोचते हुए बिताते हैं, जीवन को जीते हुए नहीं। आप इस धरती पर जीवन का अनुभव करने आए हैं या जीवन के बारे में सोचने के लिए? आपकी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया जीवन की प्रक्रिया के मुकाबले एक तुच्छ चीज है, मगर फिलहाल वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। हमें एक बार फिर से जीवन की प्रक्रिया को महत्व देने की जरूरत है।

अरस्तु और हेराक्लीटस

अरस्तू को आधुनिक तर्क का जनक माना जाता है, उनका तर्क बहुत स्पष्ट और अजेय होता था। उनकी बौद्धिक प्रतिभा पर कोई सवाल नहीं है, मगर उन्होंने तर्क को जीवन के सभी पहलुओं तक ले जाने की कोशिश की। कई रूपों में वह अपाहिज या असमर्थ थे।

उनके बारे में एक कहानी है। मुझे पता नहीं कि उसमें कितनी सच्चाई है, मगर वह सच सी लगती है। एक दिन, अरस्तू समुद्र तट पर टहल रहे थे। बहुत खूबसूरत सूर्यास्त हो रहा था, मगर उनके पास रोजाना होने वाली ऐसी छोटी-मोटी चीजों के लिए कोई समय नहीं था। वो गंभीरता से अस्तित्व की किसी बड़ी समस्या के बारे में सोच रहे थे। अरस्तू के लिए अस्तित्व एक समस्या थी, और उन्हें लगता था कि वह उस समस्या को सुलझा देंगे। गंभीरता से सोचते हुए, वह समुद्र तट पर आगे-पीछे टहल रहे थे। उसी तट पर एक और आदमी था जो बहुत गहनता से और लगन से कोई काम कर रहा था – इतनी लगन से कि अरस्तू भी उसे अनदेखा नहीं कर पाए।

आपको पता है, जो लोग अपनी बेकार की चीजों के बारे में बहुत ज्यादा सोचते हैं, वे अपने आस-पास के जीवन को अनदेखा कर देते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं, जो दुनिया में किसी को देखकर मुस्कुराते नहीं, या किसी की ओर देखते तक नहीं। उनके पास किसी फूल, सूर्यास्त, किसी बच्चे या मुस्कुराते चेहरे की ओर देखने की निगाह नहीं होती – या उन्हें किसी उदास चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की इच्छा नहीं होती, उनके पास दुनिया में ऐसे कोई छोटे काम या छोटी जिम्मेदारियां नहीं होतीं। वे अपने आस-पास के सारे जीवन को अनदेखा कर देते हैं क्योंकि वे अस्तित्व की समस्याओं को सुलझाने में व्यस्त होते हैं।

मगर अरस्तू इस आदमी को अनदेखा नहीं कर पाए। उन्होंने ध्यान से देखा कि वह क्या कर रहा था, वह आदमी बार-बार समुद्र के पास जा रहा था और वापस आ रहा था।

अरस्तू रुके और उससे पूछा, ‘अरे, तुम क्या कर रहे हो?’

वह आदमी बोला, ‘मुझे परेशान न करो, मैं बहुत जरूरी काम कर रहा हूं,’ और वह फिर से वही करने लगा।

अरस्तू और भी उत्सुक हो गए और उससे पूछा, ‘तुम कर क्या रहे हो?’

वह आदमी बोला, ‘मुझे परेशान मत करो, यह बहुत जरूरी चीज है।’

अरस्तू बोले, ‘यह जरूरी चीज क्या है?’

उस आदमी ने एक छोटा सा छेद दिखाया, जो उसने रेत में बनाया था, और बोला, ‘मैं इस छेद में समुद्र भर रहा हूं।’ उसके हाथ में एक चम्मच था।

अरस्तु को भी हँसी आ गयी

अरस्तू यह देखकर हंसने लगे। अरस्तू उस तरह के इंसान हैं, जो एक बार भी हंसे बिना पूरा साल बिता सकते हैं क्योंकि वह बुद्धिमान हैं। हंसने के लिए दिल चाहिए होता है। बुद्धि हंस नहीं सकती, वह सिर्फ चीड़-फाड़ कर सकती है।

मगर इस बात पर अरस्तू भी हंसने लगे और कहा, ‘क्या बेतुकी बात कर रहे हो! तुम निश्चित रूप से पागल हो। क्या तुम जानते हो कि यह समुद्र कितना विशाल है? तुम इस समुद्र को इस छोटे से छेद में कैसे भर सकते हो? और वह भी एक चम्मच से? कम से कम तुम्हारे पास एक बाल्टी होती, तो फिर भी कोई संभावना होती। कृपया यह कोशिश छोड़ दो, यह पागलपन है, मैं तुम्हें बता रहा हूं।’

उस आदमी ने अरस्तू की ओर देखा, चम्मच नीचे फेंक दिया और बोला, ‘मेरा काम हो गया।’

अरस्तू बोले, ‘तुम क्या कहना चाहते हो? समुद्र का खाली होना तो भूल जाओ, यह छेद तक नहीं भरा है। तुम कैसे कह सकते हो कि तुम्हारा काम हो गया?’

वह दूसरा आदमी था, हेराक्लीटस। हेराक्लीटस खड़े होकर बोले, ‘मैं एक चम्मच से इस छेद में समुद्र को भरने की कोशिश कर रहा हूं। आप मुझे बता रहे हैं कि यह मूर्खता है, यह पागलपन है, इसलिए मैं यह काम छोड़ दूं। आप क्या करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या आप जानते हैं कि यह अस्तित्व कितना विशाल है? इसमें ऐसे एक अरबों-खरबों समुद्र समा सकते हैं और आप उसे छोटे से छिद्र में, अपने सिर में भरने की कोशिश कर रहे हैं, और वह भी किससे? विचारों के चम्मच से। कृपया यह काम छोड़ दीजिए। यह नितांत मूर्खता है।’

विचारों से जीवन के सभी आयाम नहीं जाने जा सकते

अगर आप जीवन के विभिन्न आयामों का अनुभव करना चाहते हैं, तो आप अपने तुच्छ विचारों से उन्हें कभी नहीं जान पाएंगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितना अच्छा सोच सकते हैं, मानव विचार फिर भी तुच्छ होते हैं। चाहे आपके अंदर आइंस्टीन का दिमाग काम कर रहा हो, वह फिर भी तुच्छ है क्योंकि विचार कभी जीवन से बड़े नहीं हो सकते। विचार सिर्फ तार्किक हो सकते हैं, जो दो पक्षों के बीच काम करते हैं। अगर आप जीवन को उसकी विशालता में जानना चाहते हैं, तो आपको अपने विचारों से कुछ ज्यादा, अपने तर्क से कुछ ज्यादा, अपनी बुद्धि से कुछ ज्यादा की जरूरत होगी।

आपके पास विकल्प है कि या तो आप सृष्टि के साथ रहना सीख जाइए या अपने दिमाग में अपनी बेकार की कल्पनाएं रचते रहिए। आप कौन सा विकल्प आजमाना चाहते हैं? अभी ज्यादातर लोग विचारों में रहते हैं, विचार ऐसी चीज है जो अस्तित्व में नहीं, आपके मन में घटित होते हैं। इसलिए वे असुरक्षित होते हैं क्योंकि वह किसी भी पल ढह सकते हैं।

पृथ्वी समय से घूम रही है। कोई छोटी सी भी गड़बड़ नहीं होती। सारे तारामंडल बहुत बढ़िया तरीके से काम कर रहे हैं, पूरा ब्रह्मांड अच्छी तरह काम कर रहा है। मगर आपके दिमाग में एक छोटे से बुरे विचार का कीड़ा रेंगता है, और आपका दिन खराब हो जाता है।

खुद ही क्यों पैदा कर रहे हैं हम दुःख?

आपको अपनी मर्जी से कुछ भी सोचने की आजादी है। आप सिर्फ सुखद चीजों के बारे में ही क्यों नहीं सोचते? समस्या बस यही है – यह कुछ ऐसा है जैसे आपके पास एक कंप्यूटर तो है, लेकिन उसका की-पैड ढूंढने की आपने कभी परवाह नहीं की। अगर आपके पास कीपैड होता, तो आप उस पर सही शब्द टाइप कर सकते थे। लेकिन आपके पास की-पैड नहीं है और आप अपने कंप्यूटर को किसी असभ्य मनुष्य की तरह धुन रहे हैं, इसलिए उससे सारे गलत शब्द टाइप हो रहे हैं। अपने कंप्यूटर के साथ यह चीज आजमाएं, नतीजे में आपको बेहूदगी नजर आएगी।

आप जीवन का अपना नजरिया, जीवन की दृष्टि खो बैठे हैं क्योंकि आप जो हैं, उससे ज्यादा खुद को समझते हैं। अगर ब्रह्मांड के मुकाबले खुद को देखें, तो आप धूल के एक कण से भी छोटे हैं, मगर आपके ख्याल से आपके विचारों – जो आपके अंदर एक कण से भी छोटे हैं – को अस्तित्व की प्रकृति तय करनी चाहिए। मैं जो सोचता हूं और आप जो सोचते हैं, वह कोई अहमियत नहीं रखता। अस्तित्व की भव्यता सबसे महत्वपूर्ण है, वही एकमात्र हकीकत है।

आपने ‘बुद्ध’ शब्द के बारे में सुना होगा। जो अपनी बुद्धि से ऊपर उठ गया है, या जो अपने जीवन के पक्षपाती और तार्किक आयाम से ऊपर उठ गया है, वह बुद्ध है। इंसानों ने कष्ट सहने के लाखों तरीके बना लिए हैं। इन सब कष्टों का कारखाना आपके दिमाग में ही है। जब आप अपने मन से ऊपर उठ जाते हैं, तो यह कष्ट का अंत होता है। जब कष्ट का कोई भय नहीं होता, तो पूर्ण आजादी होती है। जब ऐसा होता है, तभी इंसान अपने जीवन का अनुभव अपनी सीमाओं से ऊपर उठ कर कर सकता है। इसलिए बुद्ध बनने का मतलब है कि आप अपनी ही बुद्धि के एक साक्षी बन गए हैं। योग और ध्यान का मूल तत्व सिर्फ यही है: एक बार जब आपके और आपके मन के बीच एक स्पष्ट अंतर आ जाता है, तो आप अस्तित्व के एक बिल्कुल अलग आयाम का अनुभव करते हैं।

अगला कदम

आप यह सरल अभ्यास आजमा सकते हैं। अपने नल – या किसी भी ऐसी मशीन को – इस तरीके से लगाएं कि प्रति मिनट केवल पांच से दस बूंदें गिरे। हर बूंद को ध्यान से देखें – वह कैसे बनती है, कैसे गिरती है, कैसे जमीन पर बिखर जाती है। इसे हर दिन पंद्रह से बीस मिनट तक करें। आप अचानक अपने आस-पास और अपने अंदर बहुत सी चीजों के प्रति चेतन हो जाएंगे जिन पर फिलहाल आपका ध्यान बिल्कुल भी नहीं है।

Image Credit: Stages of Life

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  • Sanjay Jothe

    बहुत ही सुन्दर और प्रेरक आलेख … धन्यवाद