कैसे करें सत्य की खोज?

सत्य को जानने के लिए साधना करते हुए हमारे मन में प्रश्न उठते रहते हैं। क्या हर बात पर शक करना, सत्य से दूर ले जा सकता है? शक और संशय कैसे जुड़े हैं साधना से


साधक:  जब साधना गहन होती है और जीवन का लक्ष्य स्पष्ट रूप से परे जाना होता है, उस समय भी मेरे मन में ढेर सारे प्रश्न उठते हैं। उन विचारों को महज मन का एक खेल समझकर खारिज कर देना कारगर नहीं हो रहा है। क्या मैं अपने मन से कुछ ज्यादा ही जुड़ी हुई हूं? क्या संशयवादी होना मुझे सत्य से दूर ले जाएगा?

सद्‌गुरुसद्‌गुरु: संशयवाद या संदेह करना कोई बुरी चीज नहीं है क्योंकि आपको समझना चाहिए कि संशयवाद का मतलब क्या है। संशयवाद का मतलब है कि आपको जानकारी नहीं है, इसलिए आप हर चीज को लेकर संशय में हैं। अगर संशयवाद हर चीज को लेकर स्थायी शक में बदल जाता है, तो यह एक बीमारी है। शक का मतलब है कि आपने पहले से निष्कर्ष निकाल लिए हैं। आपके संशयवादी होने का मतलब है कि आप अब भी खोज कर रहे हैं। आप अब भी चीजों को खोल कर उन्हें देखना चाहते हैं लेकिन अगर आप संदेहवादी होंगे, तो आप कुछ भी नहीं खोलेंगे क्योंकि आप पहले से हर चीज के बारे में एक पूर्व निश्चित धारणा बना लेते हैं। तो संदेह करना आपकी आध्यात्मिक प्रगति को धीमा नहीं करेगा। बल्कि यह आपकी आध्यात्मिक प्रगति को तेज करेगा। वास्तविक रूप से संदेह करने वाले ही आध्यात्मिक हो जाते हैं, क्योंकि वे किसी चीज की तलाश में होते हैं। बाकी लोग हर चीज के बारे में मूर्खतापूर्ण निष्कर्ष निकालते हैं। शंकालु या अविश्वासी लोग नकारात्मक नतीजे निकालते हैं, आस्थावान या विश्वासी सकारात्मक नतीजे निकालते हैं मगर दोनों एक ही श्रेणी के हैं। प्लस हो या माइनस, इससे फर्क नहीं पड़ता। ये सब एक ही खेल में हैं – संख्याओं के खेल में।

सत्य की खोज : न कुछ जोड़ें न घटाएं

संशयवादी या संदेहवादी न जोड़ना चाहता है, न घटाना चाहता है। वह हर चीज को उस रूप में देखना चाहता है, जैसा वह वाकई है। यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। आध्यात्मिक प्रक्रिया का अर्थ है, ‘मैं जीवन को उस रूप में देखना चाहता हूं, जैसा वह वास्तव में है। मुझे उसमें कुछ भी जोड़ना नहीं है, मुझे उससे कुछ भी घटाना नहीं है।’ एक संदेहवादी की मूल मानसिकता यही है। मेरे ख्याल से यह एक आदर्श मानसिकता है…मुझे लगता है कि एक आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिए आदर्श मानसिकता यही है। कि आपको किसी चीज को बढ़ाने-चढ़ाने की जरूरत नहीं है, आपको हर चीज को… किसी चीज को दबाने की जरूरत नहीं है। आप हर चीज को उस रूप में देखना चाहते हैं, जैसी वह वाकई है। मगर हर चीज के बारे में आपकी अपनी शंकाएं होती हैं। अगर आपको शंका नहीं होगी, तो आप खोज-बीन नहीं करेंगे। खोजबीन शब्द, जिज्ञासा के लिए एक हल्का शब्द है। जिज्ञासु भी एक तरह का खोजी होता है। बस एक सच्चा खोजी भी सत्य का जिज्ञासु होता है। अगर आप कहते हैं कि किसी की खोज-बीन चल रही है या आप किसी की खोज-बीन कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप मामले से जुड़े सत्य को जानना चाहते हैं। यह खोज है और यही जिज्ञासा है। इसलिए आध्यात्मिक जिज्ञासा एक खोज है, किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि अस्तित्व की। हम पूरे अस्तित्व की खोज कर रहे हैं। यही आध्यात्मिक जिज्ञासा है।

सत्य की खोज : ख़ुशी और संदेह दोनों जरुरी हैं

अगर आप संदेहवादी नहीं हैं, तो आप कभी खोज नहीं कर सकते। आप तुरंत कूद कर काल्पनिक नतीजों पर पहुंच जाएंगे। दुनिया भर में बहुत सारी ऐसी काल्पनिक चीजें हो रही हैं। यह सब कल्पनाएं खत्म हो जाएंगी। अगर मौत आपके सामने आएगी, तो सारी कल्पनाएं धराशायी हो जाएंगी। मुझे पता है कि लोग इस काल्पनिक दुनिया को मौत से आगे भी ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर अभी मौत जिसके सामने हो, उसके लिए काल्पनिक दुनिया का कोई मतलब नहीं होता। यह सिर्फ उन लोगों के लिए है, जो खुद को अमर मानते हैं। अगर आप अपने अस्तित्व की नश्वर प्रकृति को समझते हैं, तो आपके जीवन से सारी काल्पनिक चीजें गायब हो जाएंगी और आप जीवन के खोजी या सत्य के जिज्ञासु बन जाएंगे क्योंकि ये दोनों अलग-अलग नहीं हैं। बस संशयवादी होने के क्रम में आपको खुद को निराशा की ओर नहीं ले जाना चाहिए, आपको खुद को अवसाद की ओर नहीं ले जाना चाहिए, आपको खुद को अपने जीवन के कोने में नहीं धकेल देना चाहिए। अगर आप एक खुशमिजाज संशयवादी हैं, तो आप एक महान आध्यात्मिक जिज्ञासु हैं। अगर आप एक निराश संदेहवादी हैं, तो आप किसी मनोचिकित्सक के लिए एक अच्छे मरीज हो सकते हैं। इसलिए आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है, देवसेना। अगर आप खुशी-खुशी संशयवादी हो सकते हैं, तो आप एक आध्यात्मिक जिज्ञासु हैं और सत्य की खोज के लिए यह एक आदर्श मानसिकता है।


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