कैसे हुई थी चन्द्रवंश की शुरुआत? – भाग 2

कैसे हुई चंद्रवंश की शुरुआत?
कैसे हुई चंद्रवंश की शुरुआत?

पिछले ब्लॉग में आपने पढ़ा, कि बुध और इला जो कि आधे पुरुष थे और आधे स्त्री, के मिलन से चंद्र्वंशियों का आगमन हुआ। आइये जानते हैं, उनके पुत्र राजा नहुष के बारे में, और वहीँ चल रहे देवता और असुरों के युद्ध के बारे में…

नहुष – चन्द्रवंश सम्राट से बने अजगर

सद्‌गुरुबुध और इला के बच्चों में एक नहुष थे, जो एक महान सम्राट बने। एक बार उन्हें देवलोक में इंद्र के महल में जाने का न्यौता मिला। इंद्र को कहीं जाना था, इसलिए वह नहुष से बोले, ‘कुछ समय के लिए मेरे देवलोक का ख्याल रखिए। यहां रहिए, आनंद लीजिए और यहां का राज चलाइए।’ जैसे ही इंद्र वहां से गए, नहुष इस बात पर बहुत अहंकार में आ गए कि इंद्र की गैरमौजूदगी में उन्हें देवलोक का शासन चलाने की जिम्मेदारी दी गई है। वह इंद्र के सिंहासन पर बैठ गए। वह अप्सराओं से अपना दिल बहलाने लगे।

मगर उनका दिल इससे नहीं भरा। उनकी नजर इंद्र की पत्नी शची पर पड़ गई। उन्होंने शची पर दबाव डालना शुरू कर दिया, ‘अब इस सिंहासन पर मैं बैठा हूं। मैं ही इंद्र हूं। तुम मेरी हो।’ शची ने कई तरह से नहुष को टालने की कोशिश की, मगर फिर भी उन्होंने शची के साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश की। शची बोली, ‘हां, अब आप इंद्र हैं। मगर मेरी सिर्फ एक शर्त है कि सप्तऋषि आपको पालकी में उठाकर मेरे पास लाएंगे। फिर मुझे आपको अपनाने में कोई आपत्ति नहीं है।’ नहुष ने सप्तऋषियों को आदेश दिया कि वे उन्हें उठाकर शची के महल तक ले जाएं। सप्तऋषियों ने ऐसा ही किया।

वह मद में चूर थे और उन्हें बहुत जल्दबाजी थी। उन्हें लगा कि सप्तऋषि जल्दी-जल्दी नहीं चल रहे हैं। इसलिए, उन्होंने दाहिनी ओर से पालकी को लेकर चल रहे अगस्त्य मुनि के सिर पर लात मारी और कहा, ‘जल्दी चलो।’ अगस्त्य ने उनकी ओर देखा और बोले, ‘अहंकार ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है। तुम बहुत तुच्छ हो गए हो, तुम सिर्फ देवलोक के ही अयोग्य नहीं हो – तुम एक इंसान होने के लायक भी नहीं हो। इसलिए तुम अजगर बन जाओ।’ अजगर एक निम्न जीव है। नहुष अजगर बनकर देवलोक से नीचे गिर पड़े। अजगर पर हम बाद में आएंगे।

नहुष के कई बच्चे थे, जिनमें यती और ययाति सबसे महत्वपूर्ण हैं। यती को उनके गुणों और अद्भुत बुद्धि के कारण जाना जाता है। उन्होंने दुनिया को देखकर कहा, ‘मुझे इस दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है।’ और वह संन्यासी बनकर हिमालय पर चले गए। ययाति राजा बने।

 

देवों और असुरों की लड़ाई

जैसा कि पहले बताया गया है, वृहस्पति देवताओं के पुजारी या गुरु थे और उनके लिए विधि-विधान करते थे। शुक्राचार्य असुरों के गुरु थे। गंगा के मैदानों में देवों और असुरों की लड़ाई हमेशा चलती रहती थी। देवता ऊंचे स्थानों से नीचे आने की कोशिश में थे और असुर रेगिस्तान से भारत के ज्यादा उपजाऊ इलाके में आने की कोशिश कर रहे थे। इन लगातार चलने वाली लड़ाइयों में असुरों के लिए एक अच्छी बात थी, उनके पास शुक्राचार्य थे। शुक्राचार्य बहुत काबिल गुरु थे। उनके पास संजीवनी की शक्ति भी थी। संजीवनी मंत्र से वह लड़ाई में मरने वालों को जीवित कर सकते थे।

हर दिन के अंत में, जो भी असुर लड़ाई में मारे जाते थे, उन्हें फिर से जीवित कर दिया जाता था और वे अगली सुबह फिर से लड़ाई के लिए तैयार होते थे। इस तरह की सेना से आप कैसे लड़ सकते हैं, जिन्हें मारने पर वे मरें नहीं? शुक्राचार्य उन्हें बार-बार जीवित कर देते थे। देवता मायूस होते जा रहे थे। फिर वृहस्पति का पुत्र कच शुक्राचार्य के पास आया और उन्हें प्रणाम करके बोला, ‘मै अंगिरा का पौत्र और वृहस्पति का पुत्र हूं। मैं कुलीन वंश का हूं। कृपया मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कीजिए।’

असुरों ने शुक्राचार्य को चेताया, ‘यह युवक शत्रु पक्ष का है। निश्चित रूप से यह संजीवनी का राज जानने आया है। हम अभी इसे मार डालते हैं।’ शुक्राचार्य ने कहा, ‘नहीं, इस युवक ने हमें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। उसमें मेरा शिष्य होने के लिए सभी जरूरी योग्यताएं हैं। मैं उसे इंकार नहीं कर सकता।’ धर्म यह कहता था कि अगर कोई सीखने के योग्य है, तो उसे इंकार नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कच को शिष्य बना लिया और वह एक योग्य शिष्य साबित हुआ। उसने अपने गुरु की सेवा की, उनके सारे आदेश माने और हर चीज का हिस्सा बन गया। शुक्राचार्य की देवयानी नाम की एक बेटी थी। देवयानी ने इस युवक को देखा तो वह धीरे-धीरे उससे प्रेम करने लगी। लेकिन कच को इस युवती में कोई दिलचस्पी नहीं थी। देवयानी ने बहुत जतन किए मगर वह एक पल के लिए भी उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर पाई। उसका अपने मकसद से ध्यान भंग नहीं हो सकता था। असुर जानते थे कि वह संजीवनी के लिए वहां आया है।

एक दिन, कच जंगल में अपने गुरु की गायें चरा रहा था। तभी असुरों ने उस पर धावा बोला और उसे मार कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। इसके बाद उन्होंने उसे जंगली जानवरों के आगे फेंक दिया। जब शाम को गायों के साथ युवक नहीं लौटा, तो देवयानी बहुत दुखी हुई। वह अपने पिता के पास जाकर रोने लगी, ‘कच वापस नहीं आया है। किसी ने उसके साथ कुछ बुरा किया है। वह कहीं भी हो, आपको उसे जीवित करना ही होगा।’ अपनी बेटी के आगे हार मानकर, शुक्राचार्य ने संजीवनी से कच को वापस जीवित कर दिया।

जब उससे पूछा गया कि वह कहां था, तो कच ने बताया कि किस तरह असुरों ने उस पर हमला करके उसे मार डाला था। शुक्राचार्य बोले, ‘तुम सावधान रहो। असुर तुम्हें पसंद नहीं करते क्योंकि तुम दुश्मन खेमे के आदमी हो। फिर भी मैंने तुम्हें अपना शिष्य बनाया है।’ कुछ दिन बाद, कच सुबह की पूजा के लिए फूल तोड़ने गया। असुरों ने उसे पकड़ लिया और उसे मार कर उसका हाड़-मांस पीस कर समुद्र के खारे पानी के साथ मिला दिया। उन्होंने उसके अंगों को पीसकर उसका थोड़ा सा हिस्सा शुक्राचार्य के सोमरस में मिला दिया। शुक्राचार्य ने अनजाने में उसे पी लिया।

जब शाम को फिर से कच वापस नहीं आया, तो देवयानी विलाप करने लगी। मगर शुक्राचार्य बोले, ‘ऐसा लगता है कि उसकी किस्मत में मृत्यु ही लिखी है। वह बार-बार मर रहा है। उसे वापस लाने का कोई मतलब नहीं है। तुम्हारी जैसी बुद्धिमती और कुलीन कन्या, जीवन के बारे में इतना जानने वाली, युवती को जीवन और मृत्यु को लेकर नहीं रोना चाहिए। हर जीव की यही नियति है। उसे मर जाने दो। बार-बार किसी को जीवित करना अच्छी बात नहीं है।’ मगर देवयानी बहुत दुखी थी। ‘अगर कच वापस नहीं आया, तो मैं झील में कूदकर अपनी जान दे दूंगी।’ शुक्राचार्य ऐसा नहीं चाहते थे, इसलिए वह बोले, ‘चलो, एक आखिरी बार मैं उसे जीवित कर देता हूं।’

 


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