कैलाश की खुशियां और गम


सद्‌गुरु कैलाश से वापस आकर काठमांडू में अपने जहाज की प्रतीक्षा में बैठे हुए हमसे साझा कर रहे हैं अपनी कैलाश-यात्रा की रोचक बातें। आइए आप भी आनंद लीजिए-

हालांकि कैलाश अपने आप में इतना तृप्त कर देने वाला अनुभव है कि इसके आगे इन उबड़-खाबड़ रास्तों और सफर की सारी पीड़ाएं भुला दी जाती हैं
इस साल सिमीकोट से हिल्सा तक के 70 किलोमीटर के सफर पर मौसम की कृपा बनी रही। इस बार पिछले साल की तरह नहीं हुआ, जब भारी बारिश ने इस पूरे रास्ते को कीचड़ और फिसलन से भर दिया था और रातें बेहद ठंडी हो गई थीं। यह अपने आप में काफी कठिन रास्ता है, लेकिन दल के लोग एक जबरदस्त जोश और ऊर्जा के साथ डटे रहे। एक तरह से इसके इनाम में रूप में उन्हें आखिरी दिन की बेहद मुश्किल और खड़ी चढ़ाई से मुक्ति मिल गई। शुक्र रहा कि इस इलाके में सड़के बिछा दी गईं। इस पुराने पथरीले इलाके में हमारे पैर पीड़ा से कराहते है, जबकि हमारा दिल आनंद से तृप्त हो जाता है। इस घाटी में जहां लगातार तेज बहती नदियों का शोर गूंज रहा था, वहां अब इंजनों का शोर भी उसके साथ मिल कर गूंजेगा। यह पीड़ा और आनंद की मिली-जुली कहानी है। इसमें ये दोनों भाव इतने बराबर तरीके से मिले हुए हैं कि वो इसे आकर्षक बना देते हैं – हमें जीवन और मृत्यु की अनुभूतियों के बीच छोड़ देते हैं। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि यह जगह दिल के लिए स्वर्ग और पैरों के लिए नर्क है। हिल्सा तक की ड्राइव इस धरती पर सबसे जोखिम भरी ड्राइव है और मैं इस रास्ते पर चीनी जीप चला रहा था, जो लगता था कि सिर्फ तेल और धूल से जुड़ कर बनी है।

जब मैं गाड़ियों के निशान और चट्टानी रास्ते पर गाड़ी चला रहा था, उस समय गाड़ी का स्टियरिंग व्हील मेरी पकड़ से छूटने की पूरी कोशिश कर रहा था। संकरे रास्तों पर अपनी गाड़ी को बनाए रखने के लिए मुझे स्टियरिंग व्हील के साथ कुश्ती करनी पड़ रही थी ताकि हजारो फीट गहरी घाटी में गिरने से बचा जा सके। सोचिए कि पहले गियर में गाड़ी को धीमा करने के लिए, रोकने की बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ धीमा करने के लिए मुझे इसके ब्रेक पैडल पर लगभग खड़ा हो जाना पड़ता था। हमारी गाड़ी इस भयानक सड़क पर बुरी तरह हिचकोले खाती हुई चल रही थी, जबकि हम इसमें बैठे उछल रहे थे। मेरी गाड़ी की पिछली सीट पर तीन यात्री बैठे थे। उनमें से एक रास्ते की खूबसूरती और मेरे ड्राइविंग कौशल का लुत्फ ले रहा था, जबकि दूसरा मौन प्रार्थना में बिल्कुल निश्चल बैठा था और तीसरा मजे से नींद का आनंद ले रहा था, जो उसका विश्वास बयां कर रहा था।

संकरे रास्तों पर अपनी गाड़ी को बनाए रखने के लिए मुझे स्टियरिंग व्हील के साथ कुश्ती करनी पड़ रही थी ताकि हजारो फीट गहरी घाटी में गिरने से बचा जा सके।

 

चीनी कैलेंडर के मुताबकि, यह साल घोड़े का साल है। हालांकि ऐसा कहने के पीछे गधों के अपमान की मेरी कोई मंशा नहीं है। माना जाता है कि गौतम बुद्ध का जन्म भी इसी साल में ही हुआ था। इसके चलते इस साल तीर्थयात्रियों की भारी तादाद मे आने की संभावनाओं को देखते हुए प्रशासन ने हर चीज व जगह पर सख्ती की हुई थी। इसने इस पूरे इंतजाम को एक डरावने सपने में बदल डाला था। हमारे दल को कई जगहों पर वीजा और सड़क यात्रा के परमिट से जुड़ी समस्याओं के चलते अटकना पड़ा। हालांकि ये सारी चीजें महीनों पहले तय हो जाती हैं, लेकिन ऐन मौके पर उठने वाले सवालों ने सभी को खासा परेशान और निराश कर दिया। हिल्सा तक आए जत्थे में से केवल हम भारतीय नागरिकों को ही इस प्रवेश द्वार से जाने की इजाजत मिली, जबकि बाकी आठ दूसरे देशों के 18 विदेशी नागरिकों को दूसरे प्रवेश मार्ग से हेलिकाॅप्टर से जाने की इजाजत दी गई। इस पूरी कवायद में छह दिन लग गए। ये लोग बमुश्किल मानसरोवर पहुंच पाए। हालांकि कैलाश अपने आप में इतना तृप्त कर देने वाला अनुभव है कि इसके आगे इन उबड़-खाबड़ रास्तों और सफर की सारी पीड़ाएं भुला दी जाती हैं और अगर कुछ याद रहता है तो सिर्फ कैलाश की भव्य छवि और उसका शक्तिशाली स्पंदन। मैं फिलहाल काठमांडू के एक आरामदायक होटल के कमरे में हूं। बस कुछ ही घंटों में मैं फ्लाइट से कोयंबटूर लौटने की तैयारी में हूं। कामना है कि सभी लोग कैलाश की भव्यता को जानें।

प्रेम व प्रसाद,

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