काल भैरव कर्म: मृतक के शरीर के लिए या आत्‍मा के लिए ?

हमारी संस्कृति में मरने के बाद मृत व्यक्ति के लिए कुछ कर्म-काण्ड करने की परंपरा है। ऐसे ही कर्म-कांडों का एक रूप कालभैरव कर्म ईशा की ओर से भेंट किया जाता है। आइये जानते हैं कि अगर हम मृत शरीर को दान कर दें तब भी क्या कालभैरव कर्म मृतक के लिए फायदेमंद होगा…

प्रश्‍न:

सद्‌गुरु, अगर कोई व्यक्ति मरने के बाद अपना शरीर किसी मेडकिल कॉलेज को दान करना चाहे, तो फिर उसके लिए काल भैरव कर्म करने का कोई अर्थ रह जाएगा?

सद्‌गुरु:

आज के दौर में कुछ चीजों के बारे में अपनी बात रखने से परिणाम ठीक नहीं होते हैं। एक व्यक्ति की मृत्यु से कई आयाम जुड़े हैं। ये सारे आयाम इसलिए अस्तित्व में हैं, क्योंकि हमारा इस इंसानी शरीर के साथ पहचान का एक गहरा भाव जुड़ जाता है। मुझे नहीं लगता कि मेरा इस पर कोई टिप्पणी करना ठीक होगा।

मुझे उम्मीद है कि अब आप समझ गए होंगे कि मृतक और मृत शरीर में फर्क है। मेडिकल कॉलेज वालों की रुचि सिर्फ मृत शरीर में होती है, मृतक में नहीं। मृतक के बारे में वे कुछ नहीं कर सकते हैं। काल भैरव कर्म में मृतक से जुड़ा है, मृत शरीर से नहीं।
पर इतना जरुर है कि इंसानों का जीवन चलता रहना चाहिए। तो लोगों को जिंदा रखने के लिए जो भी महत्वपूर्ण है, उसे (मेडिकल साइंस के द्वारा) किया जा रहा है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। कौन जाने कि आप किसके किस शारीरिक अंग के साथ यहां बैठे हैं!

इस भौतिक शरीर के लिए कालभैरव कर्म की कोई जरूरत नहीं होती। यह शरीर जला कर फिर से मिट्टी में मिला दिया जाना चाहिए। अगर शरीर के एक या दो अंग मौत के कुछ समय बाद भी काम लायक हैं, और दूसरी तरफ कोई ऐसा शरीर है, जो ठीक तरह से काम नहीं कर रहा, तो उन अंगों को वहां लगाया जा सकता है। कालभैरव कर्म उस आयाम से संबंधित होता है, जिसने शरीर छोड़ दिया है। इसके लिए हमें व्यक्ति के शरीर से संपर्क या स्पर्श में रहने वाली किसी एक चीज की जरूरत होती है, क्योंकि शरीर की अपनी स्मृति होती है। ऐसे में इस कर्म में हम मृत व्यक्ति की फोटो और उसके किसी एक कपड़े का इस्तेमाल करते हैं, ताकि दोनों आयामों के बीच पहचान का एक संबंध बन सके।

मरने के बाद आप शरीर के लिए कुछ नहीं कर सकते। उसके लिए करने का कोई मतलब भी नहीं रह जाता। अगर यह कर्म शरीर के लिए होता तो हम उसे तभी करते, जब इंसान जिंदा होता। कालभैरव कर्म स्मृतियों के उस बुलबुले के लिए है, जो मरने के बाद किसी दूसरे शरीर की तलाश में अब तक इधर-उधर भटक रहा है।

इसके पीछे का मकसद उस प्राणी में विवेक पैदा करना है, क्योंकि जब वह शरीर में था, तो उसे कुछ सुनना गंवारा नहीं था। दरअसल मरने के बाद इंसान के पास भेद करने वाला मन नहीं रहता। इसलिए हम उस व्यक्ति के साथ ज्यादा कुछ कर सकते हैं, जो अपनी भेद–भाव करने वाली बुद्धि खो चुका हो। अगर किसी की पक्षपात करने वाली बुद्धि चली गयी, तो इसका मतलब है कि उसके पास अब भेदभाव करने या भले-बुरे को अलग करने वाली छलनी नहीं रही।

अगर एक तरीके से देखा जाए तो ध्यान करने की पूरी प्रक्रिया अपने आप में मृत्यु का एक स्वांग या अनुकरण ही है। मृत्यु का मतलब है कि अब यह शरीर कोई समस्या नहीं रहा, और न ही अब कोई पक्षपाती या भेद-भाव करने वाला दिमाग बचा है।
ऐसे में अब वह खुला मन हो चुका है, आप उसमें जो कुछ भरना या डालना चाहें डाल सकते हैं। पक्षपात करने वाली बुद्धि एक छलनी की तरह उन सारी चीजों को छानकर बाहर कर देती है, जिन्हें आप पसंद नहीं करते। और आपको करीब-करीब सारी सृष्टि ही नापसंद है! जाहिर है, ऐसे में शिव को भी यह छलनी बाहर कर देगी।

अगर एक तरीके से देखा जाए तो ध्यान करने की पूरी प्रक्रिया अपने आप में मृत्यु का एक स्वांग या अनुकरण ही है। मृत्यु का मतलब है कि अब यह शरीर कोई समस्या नहीं रहा, और न ही अब कोई पक्षपाती या भेद-भाव करने वाला मन बचा है। आपके भेद-भाव से भरे विचार पिछले अनुभवों और प्रभावों का एक नतीजा है। हो सकता है कि एक का विवेक किसी दूसरे से बेहतर हो, लेकिन आप आख़िरकार चीजों को बांटने की कोशिश ही कर रहे हैं, जो कुदरती तौर पर बंट ही नहीं सकती। यह भेदभाव करने वाला विवेक दरअसल, परम अनुभूति से तात्कालिक अनुभूति तक आने का एक रास्ता है।

मुझे उम्मीद है कि अब आप समझ गए होंगे कि मृतक और मृत शरीर में फर्क है। मेडिकल कॉलेज वालों की रुचि सिर्फ मृत शरीर में होती है, मृतक में नहीं। मृतक के बारे में वे कुछ नहीं कर सकते हैं। काल भैरव कर्म में मृतक से जुड़ा है, मृत शरीर से नहीं।

प्रेम व प्रसाद,

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