क्या हमें उसी में संतोष कर लेना चाहिए जो हमें मिला है?

क्या हमें उसी में संतोष कर लेना चाहिए जो हमें मिला है

सद्‌गुरुहमने लोगों को कहते सुना है, कि जो मिला है उसी में संतोष करो। क्या जो मिले उसी में संतोष करना ठीक है? सद्‌गुरु इसी प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं…

संतोष कायरता का दूसरा नाम है

प्रश्न : हर तरफ खुशहाली की इच्छा रखना और संतुष्ट रहने की क्षमता के बीच क्या कोई संबंध है? अकसर लोग कहते हैं कि आपके पास जो है या आप जैसे हैं, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए।

सद्‌गुरु : ये वे लोग हैं, जो जीवन से हार चुके हैं। संतुष्टि का मतलब नियंत्रण है। संतोष सिर्फ कायरता का दूसरा नाम है।

अगर आप परम आनंद की अवस्था में हों तो क्या आप संतोष के बारे में सोचेंगे? तब आपके लिए इसके कोई मायने नहीं होंगे।
जब लोग जीवन से डर जाते हैं, तो वे संतोष की बात करते हैं। युवावस्था में कोई संतोष की बात नहीं करता। जब लोग बूढ़े हो जाते हैं, तो वे संतोष की बात करते हैं, क्योंकि इस अवस्था में उन्हें हर चीज से भय लगने लगता है। अगर आप परम आनंद की अवस्था में हों तो क्या आप संतोष के बारे में सोचेंगे? तब आपके लिए इसके कोई मायने नहीं होंगे। संतोष का मतलब है कि आप कहीं न कहीं मौजूदा स्थिति को ही बनाए रखना चाहते हैं। भाग्यवश आप सफल हो गए हैं और आप इसे ऐसे ही बनाए रखना चाहते हैं, आप नीचे नहीं जाना चाहते। अगर आप ऐसा करते हैं तो यह एक बेहद खतरनाक समझौता है।

जो मिला है, उसी में खुश रहो – का क्या अर्थ है?

प्रश्न : फिर इस मशहूर जुमले के क्या मायने हैं कि आपको जो मिला है, उसी में खुश रहो?

सद्‌गुरु : देखिए, आपको जो मिला है, उसका आपकी खुशी से कोई लेना-देना नहीं है। आप अपने चारों ओर क्या इकठ्ठा करते हैं, यह आपकी जरूरतों और आपके क्रियाकलापों पर निर्भर करता है।

अगर मेरा शरीर और मेरा मन मुझसे दिशा-निर्देश लेता है तो मैं आनंद में ही रहूंगा, मैं किसी और तरीके से हो ही नहीं सकता – लेकिन चूंकि आज मेरी कार टूट गई, तो क्या इसका मतलब यह है कि मेरा मन और शरीर भी टूट जाएं?
अभी आप अपनी खुशी को इन्हीं सब चीजों के साथ जोड़ रहे हैं, जो कि बेहद खतरनाक बात है। मैं हमेशा से कहता रहा हूं कि आप स्वभाविक रूप से आनंदमय हैं। अगर आपका मन आपसे दिशा-निर्देश ले तो अभी आप खुद को आनंद में रखेंगे या या कष्ट में? आनंद में ही न? क्या ऐसा आपके बैंक बैलेंस की वजह से हुआ? क्या आपके आलीशान घर की वजह से ऐसा हुआ? क्या ऐसा आपकी लंबी कार की वजह से हुआ? नहीं, मैं अपने स्वभाव की वजह से आनंद में हूं। मैं कौन-सी कार चलाता हूं, वह मेरी जरूरत के मुताबिक होगी। मैं कैसे घर में रहता हूं, यह मेरी जरूरत के हिसाब से होगा। मैं कैसा काम करता हूं, इसका संबंध इस बात से है कि दुनिया की जरूरतें क्या हैं। जो भी हो, लेकिन मेरा आनंद में रहना बुनियादी बात है। अगर मेरा शरीर और मेरा मन मुझसे दिशा-निर्देश लेता है तो मैं आनंद में ही रहूंगा, मैं किसी और तरीके से हो ही नहीं सकता – लेकिन चूंकि आज मेरी कार टूट गई, तो क्या इसका मतलब यह है कि मेरा मन और शरीर भी टूट जाएं? अभी यही हो रहा है कि कई लोगों के आनंद का स्तर स्टॉक मार्केट में होने वाले उतार-चढ़ाव से सीधे जुड़ा हुआ है।

आनंद का सम्बन्ध सिर्फ भीतरी स्थिति से है

प्रश्नकर्ता : मैं अभौतिक पहलुओं की बात कर रहा था, जैसे रिश्तों, दोस्ती और ऐसी ही दूसरी चीजों से संतुष्ट रहने के बारे में।

सद्‌गुरु : जब आपके जीवन में कोई आनंद नहीं होता, तभी आप संतुष्टि की तलाश करते हैं। अगर आप आनंद में हैं, तो क्या आप संतुष्टि तक ही सीमित रहेंगे? दो रोटी खाने के बजाय अगर आप दस रोटी खाते हैं तो आप काफी संतुष्ट महसूस करेंगे।

तो आपके आनंद में या परेशानी में होने का आपके क्रियाकलाप से कोई संबंध नहीं है। इनका संबंध तो इस बात से है कि आप भीतर से कैसे हैं। आपका शरीर, मन, ऊर्जा किस स्तर तक आपसे दिशा-निर्देश ले रहे हैं, उसी से तय होता है कि उन पर आपका कितना नियंत्रण है, है न?
आपको नींद का अहसास भी होगा। अगर आप खुद को नींद, संतुष्टि, जैसी चीजों की तरफ ले जाना चाहते हैं तो ये सब अच्छी चीजें हैं। मैं आपसे एक आसान-सा सवाल पूछता हूं। क्या आप यह समझते हैं कि आपका जीवन बहुत छोटा है? अगर आप भरपूर आनंद में हैं तो यह जीवन बेहद छोटा लगेगा। अगर आप कष्ट और निराशा में हैं तो यह भयानक रूप से लंबा जीवन लगेगा, है न? यह बहुत ही सापेक्ष अनुभव है। अगर आप परम आनंद में हैं तो आपके कुछ समझने से पहले ही जिंदगी सनसनाती हुई गुजर जाएगी।

तो फिर आप दिन के चौबीसों घंटे मस्ती करते क्यों नहीं गुजारते? ऐसा इसलिए है क्योंकि आप कुछ खास चीजों को ही मस्ती की चीजें मानकर बैठे हैं। अगर आप किसी भी चीज को मस्ती भरे काम के रूप में पहचान न दें तो महज सांस लेना भी आपके लिए मस्ती की बात होगी। हां, ऐसा ही है। अगर आपको यह बात नहीं पची तो जरा दो मिनट के लिए अपनी सांस को रोककर रखें और फिर उसे छोड़ें। तब आपको पता चल जाएगा कि सांस लेना कितने बड़े आनंद की बात है। जीवित रहना अपने आप में मस्ती है। किसी खास काम को मस्ती के रूप में पहचान मत दीजिए। आप आनंद में होंगे तो हर चीज मस्ती की चीज लगेगी। अगर आप कष्ट में हैं तो आप जो भी करेंगे, वही बोझ लगेगा, मुसीबत लगेगा। तो आपके आनंद में या परेशानी में होने का आपके क्रियाकलाप से कोई संबंध नहीं है। इनका संबंध तो इस बात से है कि आप भीतर से कैसे हैं। आपका शरीर, मन, ऊर्जा किस स्तर तक आपसे दिशा-निर्देश ले रहे हैं, उसी से तय होता है कि उन पर आपका कितना नियंत्रण है, है न?

 


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