जन्म-जन्मान्तर बीत गए…


7 जुलाई 2014

थाई एयरवेज

जन्म-जन्मान्तर बीत गए...
गुरु की इच्छा और मेरी चाहत

से हुआ स्‍फुरित अडिग व अटल संकल्‍प

एक संकल्‍प

जिसने तोड़ दिया दुनिया की सारी बाधाएं व पाश

जिन्हें रचा-पोसा था अज्ञानियों व तथाकथित ज्ञानियों ने।

 

उद्देश्य-पूर्ति की परिपूर्णता का ज्ञान

लगता है जैसे खिला हृदय में पूर्णिमा का चांद

टपकती है जिससे निरे-अस्तित्व की शीतल-शोभा।

 

अगाध जीवन की कोमलता मुझे भर देती है सिहरन से

विचार व स्मृतियाँ भर देते हैं मेरी आँखों में आंसू

इतने सारे हो – तुम, तुम्हारे संघर्ष, तुम्हारी खुशी, तुम्हारा प्रेम,

तुम्हारी प्रतिबद्धता, तुम्हारा समर्पण, सबसे बढ़कर ‘जानने’ की तुम्हारी तड़प

ओह,इतनी कोमलता – मुझे मार ही न डाले

 

किन्तु जियूंगा मैं – इन सबके लिये

जन्म-जन्मान्तर बीत गए …

प्रेम व प्रसाद,

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