ईशा ग्रामोत्सव : गांवों में उत्‍साह और उमंग की लहर

हाल ही में तमिलनाडु में आयोजित किये गये ईशा ग्रामोत्सवं ने तमिलनाडु के गाँवों में नया उत्साह भरा है। शारीरिक रूप से सभी को चुस्त बनाने के साथ ही इन खेलों ने हर जाती और सम्प्रदाय के लोगों को जोड़ने का भी काम किया है।

ईशा के बैनर तले चलने वाली तमात गतिविधियों में ‘ग्रामोत्सव’ अपने अनूठेपन और मनोहरता के चलते अलग ही नजर आता है। ग्रामीण भारत में नवजीवन व नई ऊर्जा का संचार करने के लिए आज से 21 साल पहले ‘ग्रामोत्सव’ की शुरुआत की गई थी। हालांकि तकरीबन 16 साल पहले इस आयोजन का औपचारिक स्वरूप सामने आया। दरअसल, तब दक्षिण भारत में जातिप्रथा को लेकर काफी पूर्वाग्रह था। तब एक समूह के लोग दूसरे समूह के साथ खाना नहीं खाते थे, दरअसल  उनको लगता था कि दूसरे समूह के लोग जाति के स्तर पर उनसे नीचे हैं। इस चीज ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।

इन सबसे बड़ी बात है कि जिन महिलाओं को अपने जीवन मे आज तक खेलने का मौका नहीं मिला, वे बाहर आकर एक बड़े दर्शक समूह के सामने अपने खेल का प्रदर्शन कर रही हैं, खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही हैं।
दरअसल, ईशा योग का एक कार्यक्रम था, जिसमें सबको साथ मिलकर कर खाना खाना था, वहां यह चीज एक बड़ा मुद्दा बन गया। यह देखकर कि यह मसला भड़ककर कहीं तूल न पकड़ ले, मैंने आपस में भोजन बांटने की बजाय एक साथ मिलकर सहज व आसान से खेलों को खेलने की शुरुआत की। सभी जातियों का एक साथ मिलकर खाना एक बड़ा मुद्दा था, लेकिन एक साथ मिलकर खेलने में किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। उसकी वजह थी कि किसी पूर्वाग्रही दिमाग ने अभी तक साथ खेलने के बारे में सोचा ही नहीं था। इसलिए यह मुद्दा नहीं बना।

इन सरल खेलों ने ग्रामीण समाज में पैठे जातिप्रथा से जुड़े विचारों को बदलने में काफी मदद की। यह चीज मैंने अमेरिका-अफ्रीकी राज्यों में महसूस की थी कि कैसे उन समुदायों के खेल से जुड़े नायकों या हीरोज के चलते उनकी सोच बदली। लगभग कुछ वैसा ही बदलाव मैंने ग्रामीण तमिलनाडु में भी देखा।

इस मौके पर हमारे भारत रत्न सचिन तेंदुलकर भी आए। उनकी सरल विनम्रता ने इस आयोजन की गरिमा व गुणवत्ता दोनों बढ़ा दी। हम खेलों के जरिए ग्रामीण भारत में आए इस जनजीवन और रूपांतरण के अभियान को और आगे उंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं। इस गतिविधि के जरिए जात-पात और लिंग आधारित भेदभाव के बंधन टूटे हैं। कई युवाओं के भीतर नशे की लत छूटी है। इन सबसे बड़ी बात है कि जिन महिलाओं को अपने जीवन मे आज तक खेलने का मौका नहीं मिला, वे बाहर आकर एक बड़े दर्शक समूह के सामने अपने खेल का प्रदर्शन कर रही हैं, खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही हैं।

इन सरल खेलों ने ग्रामीण समाज में पैठे जातिप्रथा से जुड़े विचारों को बदलने में काफी मदद की। यह चीज मैंने अमेरिका-अफ्रीकी राज्यों में महसूस की थी कि कैसे उन समुदायों के खेल से जुड़े नायकों या हीरोज के चलते उनकी सोच बदली।
महिलाओं को अलग-अलग समूहों में इस तरह खेलते देख खुशी से मेरी आंखें भर जाती हैं। दरअसल, मैं जानता हूं कि उनके जीवन में किस तरह के बंधन हैं।  एक गतिविधि के तौर पर ग्रामोत्सव जिस तरह से आगे बढ़ा और उसका विस्तृत फलक सामने आया है, वह अपने आप में अद्भुत है। इस साल यह आयोजन ख़ास तौर पर अविस्मरणीय व अद्भुत रहा। सचिन तेंदुलकर के आने से यह पूरा माहौल बेहद खास हो गया। सचिन के साथ जो खेल का भाव जुड़ा हुआ है, उसने ग्रामोत्सव में होने वाली प्रतिभागिता के उत्साह और भावना को जबरदस्त रूप से बढ़ा दिया। इस बार इस आयोजन में तकरीबन 600 टीमों, 7,500 खिलाड़ियों ने पूरे आयोजन को एक अतुलनीय अभियान में बदल दिया। इसमें तकरीबन 70,000 दर्शक व प्रशंसक जुटे थे। यह ऐसा आयोजन था, जिसकी कोयंबटूर में किसी और आयोजन से कोई तुलना नहीं हो सकती।

प्रेम व प्रसाद,

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