ज्ञान भी आध्यात्मिक विकास में बाधक हो सकता है

आध्यात्मिक विकास - ज्ञान भी विकास में बाधक हो सकता है

सद्‌गुरुसद्‌गुरु से एक साधक ने पूछा कि वो एक किताबी योगी है, और उसे डर है कि जो ज्ञान उसने किताबों से अर्जित किया है, उसका अनुभव करे बिना वो मर जाएगा, तो उसे क्या करना चाहिए। जानते हैं सद्‌गुरु का उत्तर

प्रश्न : एक बौद्ध लामा ने मुझसे कहा था कि हम लोगों को पहले ही ज्ञान प्राप्त हो चुका है, लेकिन कुछ अपवित्रता और इच्छाओं के चलते यह भूल गए हैं कि हम भी बुद्ध की तरह हैं। मैं एक किताबी योगी रहा हूं और पूरी तरह से भ्रमित हूं। मुझे वाकई इस बात का डर है कि अगर अगले पल मेरी मौत होती है तो मैंने जो ज्ञान या विचार अर्जित किया हुआ है, उसकी गहन अनुभूति हुए बिना ही मैं मर जाऊंगा। सद्‌गुरु, मुझसे गलती कहां हो रही है, और मैं आगे कैसे बढ़ूं?

आप कौन हैं, और कौन नहीं हैं?

सद्‌गुरु : संभवत: लामा के कहने का मतलब था कि जिस भी चीज की जरूरत है, वह सब आपके भीतर है, बस आपको थोड़ी गंदगी हटानी होगी। इस मामले में वह अपनी जगह बिल्कुल ठीक थे। लेकिन जब आपको पता नहीं हो कि क्या गंदगी है और क्या नहीं, तो यह अपने आप में एक समस्या है। यह शरीर, मन, कपड़े जो आप पहनते हैं, काम जो आप करते हैं, वो चीजें जिन्हें आप दूसरे लोगों से ग्रहण करते हैं, इन सबके अलावा आपके मन के कई रूप हैं – आप यह नहीं जानते कि इन सब में आप कौन हैं और आप कौन नहीं हैं।

सच्चा ज्ञान : खुद को उससे अलग करना है, जो आप नहीं हैं

लामा ने जो कहा, आपको उसमें से एक बात समझनी चाहिए कि यह प्राणी जीवन का एक पूर्ण अंश है।

यह अंतर समझने के लिए आपको उस किताब को पढऩा होगा, जो आप खुद हैं। जब आप अस्तित्व की इस किताब को पढक़र समझेंगे तभी आप जान पाएंगे कि आप क्या हैं और क्या नहीं हैं।
यह जीवन का एक टुकड़ा भर नहीं है, बल्कि पूरा जीवन है। फिर यह अधूरा और अपर्याप्त क्यों लगता है? उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि जीवन की पूरी गहराई और उसके सारे आयाम आपके अनुभवों में नहीं आए हैं। इसलिए आपको ‘आप जो हैं’ और ‘आप जो नहीं हैं’ – सिर्फ इसमें अंतर करना है। यह अंतर करना आपको किसी किताब को पढक़र नहीं आएगा। यह अंतर समझने के लिए आपको उस किताब को पढऩा होगा, जो आप खुद हैं। जब आप अस्तित्व की इस किताब को पढक़र समझेंगे तभी आप जान पाएंगे कि आप क्या हैं और क्या नहीं हैं। यही ज्ञान सच्चा होगा। अगर आप हजारों किताबों में इसके बारे में पढ़ें, अगर आप आत्मज्ञान के बारे में ढेर सारी चीजें पढ़ लें तो आप पंडित, प्रोफेसर या लामा हो सकते हैं। लेकिन आप खुद को जान नहीं पाएंगे।

इकठ्ठा करने की आदत बहुत पुरानी है

यह विचार कि ज्ञान को इकठ्ठा किया जा सकता है, तब तक सही है जब तक ज्ञान किसी और के बारे में हो, लेकिन जब बात खुद की हो, तो आप ज्ञान को संचित नहीं कर सकते। इकठ्ठा करने की यह प्रवृत्ति काफी पहले से चली आ रही है। शुरुआत में मानव समाज शिकारी हुआ करता था। उन्होंने जानवरों का शिकार किया, उनका मांस खाया, लेकिन उतना ही काफी नहीं था, उन्होंने उन जानवरों की हड्डियां इकठ्ठी कीं, उन्हेंं अपने गले में लटकाया या उनका कुछ और इस्तेमाल किया। उन्हें कुछ न कुछ एकत्र करना था। इकठ्ठी करने की वह सहज सी प्रवृत्ति बढ़ते-बढ़ते यहां तक आ गई कि लोगों ने धन का पहाड़ बना लिया, फिर भी वे इकठ्ठा करते जा रहे हैं। लोग अब लाखों व करोड़ों की बात नहीं कर रहे, वे अब अरबों की बात कर रहे हैं। हर रोज इस तरह के आंकड़े अखबारों के पहले पन्ने पर दिखते हैं।

इकठ्ठा करने का सिलसिला समाप्त नहीं होने वाला

आपका इकठ्ठा करने का यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। आप हजारों किताब क्या, हजारों सौर मंडल इकठ्ठा कर लीजिए, आपका इकठ्ठा करने का यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। आप जितना इकठ्ठा करते हैं, उतना ही आप समझ नहीं पाते कि आप कौन हैं और आपके साथ यही हो रहा है। तो कल सुबह, लेकिन कल के लिए भी क्यों छोड़ा जाए, मै चाहता हूं कि आप अभी बैठ जाएं और जो आप नहीं है, उस हर चीज को एक तरफ उठाकर रख दें। उस शरीर से लेकर हर चीज, जो आपने यहीं इकट्ठी की है। तो आप अपनी सजगता में हर उस चीज को अपने से दूर करने की कोशिश कीजिए, जो आप नहीं हैं। बस आप यह काम कीजिए। आप देखेंगे कि ज्ञान इकठ्ठा करने भर से आपको वह नहीं मिला है, जो आप जानना चाहते थे।

ज्ञान इकठ्ठा करना धन जमा करने से ज्यादा खतरनाक है

जिन लोगों ने ज्ञान इकठ्ठा किया है, उन्हेंं लगता है कि वे धन दौलत जमा करने वालों से बेहतर हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। ऐसा सिर्फ उनका मानना है। वास्तव में वे उनसे बेहतर नहीं है।

मैं लोगों को कहता हूं कि अगर आप आध्यात्मिक रास्ते पर आगे बढऩा चाहते हैं तो आप आध्यात्मिकता के बारे में कुछ भी न पढ़ें। अगर पढऩा आपके लिए जरूरी है ही तो कुछ साहित्य, भूगोल या कुछ और पढि़ए।
दरअसल, वे उनसे भी बुरी हालत में हैं। जिस इंसान ने धन दौलत इकठ्ठी कर रखी है, वह कम से कम यह तो जानता है कि यह खो सकती है। लेकिन जिसने ज्ञान इकठ्ठा किया है, उसे तो इस बात का भी अहसास नहीं है कि यह खो सकता है। आपको उसे श्मशान भूमि तक ले जाना होगा। कम से कम पैसे जमा करने वाला यह जानता है कि यह उससे लिया या छीना जा सकता है। पैसे के साथ एक अच्छी बात है कि हमेशा कोई न कोई इसे लेने की कोशिश में लगा रहता है। जबकि ज्ञान आपसे कोई भी नहीं ले सकता, बशर्ते आप अपना दिमाग और शरीर न खो दें।

तो ज्ञान इकठ्ठा करना, पैसा और दौलत जमा करने से ज्यादा खतरनाक है। वास्तव में यह इंसान की प्रगति में ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। मैं लोगों को कहता हूं कि अगर आप आध्यात्मिक रास्ते पर आगे बढऩा चाहते हैं तो आप आध्यात्मिकता के बारे में कुछ भी न पढ़ें। अगर पढऩा आपके लिए जरूरी है ही तो कुछ साहित्य, भूगोल या कुछ और पढि़ए। आप आध्यात्मिक चीजें मत पढि़ए।


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