गुरु-शिष्य के रिश्ते क्या सेक्शुअल भी होते हैं?

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आज के दौर में जब कुछ तथाकथिक गुरु विवादों के घेरे में आने लगे हैं, यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि अध्यात्म की आड़ में क्या गुरु-शिष्य संबंधों में कामुकता की इजाजत है? आइये जानते इन संबंधों के बारे में… 

जिज्ञासु :

तांत्रिक परंपरा में ऐसा कहा जाता है कि गुरु और शिष्य के बीच का संबंध जब करीबी और पवित्र हो जाता है, तो उनके बीच एक नजदीकी हो सकती है, जो कामुक यानी सेक्सुअल भी हो सकती है। जैसा कि कृष्ण-गोपी की रास परंपरा से स्पष्ट है, शिष्य और गुरु का एक दूसरे के लिए आकर्षण यौन संबंधों के रूप में भी हो सकता है। तो तंत्र आखिर है क्या और उसका कामवासना (सेक्सुअलिटी) से क्या संबंध है? सद्गुरु क्या इस बारे में हमें कुछ बताएंगे?

सद्‌गुरु:

गुरु-शिष्य संबंध शिष्य को चेतनता के एक अधिक ऊंचे आयाम तक पहुंचाने के लिए है, उसे काम वासना की प्रकृति में फंसाने के लिए नहीं। सबसे बड़ी बात यह कि यह पवित्र संबंध निश्चित रूप से चरम आनंद से संबंधित है, लेकिन काम वासना से नहीं।
दुर्भाग्य से पश्चिमी देशों में तंत्र को इस प्रकार पेश किया जा रहा है मानो इसका अर्थ बिना किसी रोक टोक की काम भावना हो। इसका बहुत गलत मतलब निकाला गया है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तंत्र के बारे में ज्यादातर किताबें उन लोगों ने लिखी हैं, जिनका मकसद बस किताबें बेचना है। वे किसी भी अर्थ में तांत्रिक नहीं हैं। तंत्र का शाब्दिक अर्थ होता है, तकनीक या टेक्नोलॉजी। यह इंसान के भीतर मौजूद तत्व से सम्बंधित टेक्नोलॉजी है।

तंत्र की विधियां हर व्यक्ति के अनुसार बताई जाती हैं, वे सभी के लिए समान नहीं होतीं, यानी ये विधियां सब्जेक्टिव होती हैं ऑब्जेक्टिव नहीं। लेकिन आज-कल समाज में तंत्र शब्द का मतलब यह समझा जा रहा है कि यह परंपरा के विरुद्ध या समाज को मंजूर न होने वाली विधियां हैं। मगर बात बस इतनी है कि तंत्र में कुछ खास पहलुओं का खास तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है। यह योग से बिल्कुल अलग नहीं है। दरअसल यह योग का ही एक हिस्सा है जिसे तंत्र-योग कहा जाता है।

मानव तंत्र कई घटकों से मिलकर बना है, जिसमें है – भौतिक शरीर, जो ग्रहण किए गए भोजन का एक ढेर है। दूसरा घटक है मानसिक शरीर, जिसे आप सॉफ्टवेयर और स्मृति-अंग के रूप में समझ सकते हैं, जिसकी वजह से हर व्यक्ति अलग-अलग तरीकों से काम करता है। तीसरा है ऊर्जा शरीर जिस पर ये दोनों टिके हुए हैं। जो इन सब से परे है, वह अभौतिक है।

शरीर और मन की बांधने वाली और चक्रीय प्रकृति अधिक ऊंची संभावनाओं तक पहुंचने में बाधा पैदा करती है। तंत्र उससे परे जाने का नाम है, ताकि हम शरीर और मन की सीमाओं में न जकड़े रहें। तंत्र का मतलब है, शरीर को एक सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करना, ताकि इस जीव को उच्चतम संभव आयाम तक पहुंचाया जा सके।

लोग हमेशा कृष्ण-गोपी संबंध की आड़ लेने की कोशिश करते हैं। कहानी यह है कि कृष्ण ने एक साथ सोलह हजार स्त्रियों को चरम आनंद का अनुभव कराया। ऐसा यौन संबंध के द्वारा तो नहीं किया जा सकता।
गुरु-शिष्य संबंध शिष्य को चेतनता के एक अधिक ऊंचे आयाम तक पहुंचाने के लिए है, उसे काम वासना की प्रकृति में फंसाने के लिए नहीं। सबसे बड़ी बात यह कि यह पवित्र संबंध निश्चित रूप से चरम आनंद से संबंधित है, लेकिन काम वासना से नहीं। मैं आपकी टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने की बात कर रहा हूं। इससे आपको चरम आनंद की स्थिति में पहुंचने के लिए हांफने की जरूरत नहीं होगी। अगर आप बस अपनी आंखें बंद करके बैठ जाएं, तो आपके शरीर की हर कोशिका चरम आनंद में पूरी तरह तर-बतर हो सकती है। जो लोग अस्तित्व के चरम आनंद की स्थिति को प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, वही उन्माद और आनंद को कामवासना से जोड़ते हैं क्योंकि उनका सबसे गहरा अनुभव शायद वही रहा है।

लोग हमेशा कृष्ण-गोपी संबंध की आड़ लेने की कोशिश करते हैं। कहानी यह है कि कृष्ण ने एक साथ सोलह हजार स्त्रियों को चरम आनंद का अनुभव कराया। ऐसा यौन संबंध के द्वारा तो नहीं किया जा सकता। शिष्य गुरु के साथ बहुत अंतरंग संबंध बना सकता है। अंतरंगता को आम तौर पर दो शरीरों की निकटता और उनके आपसी स्पर्श के रूप में समझा जाता है। जो व्यक्ति आध्यात्मिक पथ पर है, उसके लिए शरीर के स्तर पर एक होना काफी नहीं है – क्योंकि वह उससे ज्यादा आनंद पाना चाहता है। भौतिक शरीर तो बाहर से इकट्ठा किया गया एक ढेर है, इसलिए तांत्रिक और योगिक प्रणालियों में, शरीर को कभी आपका एक अंतरंग हिस्सा नहीं माना जाता है। जब ऊर्जाएं आपस में घुलती-मिलती हैं और एक गुरु की ऊर्जा शिष्य पर छा जाती है, सिर्फ तभी चरम आनंद का अनुभव होता है। यह एक मिलन होता है, लेकिन यौन क्रिया की तरह नहीं। अगर आप सिर्फ ध्यान या आध्यात्मिक अभ्यास करना चाहते हैं, तो दरअसल आपको गुरु की जरूरत ही नहीं है। गुरु तो अज्ञात आनंद से आपको अभिभूत करने के लिए होता है। तो तंत्र, मुक्ति की टेक्नोलॉजी है, गुलामी की नहीं।

कामुकता हमारे शरीर में मौजूद एक बुनियादी प्रवृत्ति है ताकि जीव अपनी प्रजाति कायम रख सकें। यह एक बुनियादी जरूरत है। इसके साथ ही, हमें उन सीमाओं को भी जानना चाहिए जिनसे परे यह हमें नहीं ले जा सकता। सीमाओं को पहचानने और उससे परे जाकर दूसरे आयाम को छूने की चाह ही योग और तंत्र को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

आप अध्यात्म के नाम पर खुद के साथ ऐसी बेहूदी चीजें क्यों कर रहे हैं? अपनी बायोलॉजी को बायोलॉजी की तरह ही लें, उसको दूसरा नाम देने की जरूरत नहीं है।
लोगों की यह सोच कि ‘मेरी सेक्सुअल जरूरतें हैं, इसलिए मैं तांत्रिक रास्ता अपनाऊंगा’,बिलकुल बेवकूफी भरा है। ऐसा नहीं है कि तंत्र में आगे बढऩे के लिए लोग सिर्फ सेक्स का उपयोग करते हैं। वे आगे बढऩे के लिए हर पहलू का उपयोग करते हैं। दुर्भाग्य से कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस रास्ते की ओर गलत मकसद से आकर्षित होते हैं। वे इस रास्ते पर इसलिए आते हैं, क्योंकि वे अपनी सेक्स की भूख को आध्यात्मिक जामा पहनाना चाहते हैं। आप अध्यात्म के नाम पर खुद के साथ ऐसी बेहूदी चीजें क्यों कर रहे हैं? अपनी बायोलॉजी को बायोलॉजी की तरह ही लें, उसको दूसरा नाम देने की जरूरत नहीं है।

यौन जरूरतों को, चाहे आप अपने दायरे के भीतर करें या बाहर करें, उसी रूप में पूरा किया जा सकता है। उसे पूरा करने के लिए आध्यात्मिक क्रिया का इस्तेमाल करना निंदनीय और गैर जिम्मेदाराना है। इससे कई स्तरों पर नुकसान हो सकता है। क्योंकि तांत्रिक प्रक्रिया का इस्तेमाल सिर्फ एक व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास के लिए नहीं किया जाता, उससे एक ऊर्जा का स्थान बनता है जो दूसरी संभावनाओं में भी मदद कर सकता है, जिससे बहुत सारे लोगों का कल्याण हो सकता है।


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