ध्यानलिंग के सोलह साल

ध्यानलिंग के सोलह साल


ध्यानलिंग  प्रतिष्ठित  होने के सोलह साल पूरे होने के अवसर पर सद्‌गुरु इस बार के स्पॉट में आदियोगी के सात शिष्यों की कहानी के जरिए बता रहे हैं कि बड़ी संभावनाओं के लिए खुद को तैयार करने, खुद को खाली करने की जरूरत क्यों है …

ध्यानलिंग को प्रतिष्ठित किए 16 साल हो गए। योगिक पद्धति में 16 एक महत्वपूर्ण संख्या है। जब आदियोगी ने अपने ज्ञान को फैलाना चाहा तो उन्होंने देखा कि इंसान के पास अपना परम लक्ष्य पाने के एक सौ बारह तरीके हैं।

आने वाले 16 सालों में हम ध्यानलिंग को और ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए कुछ खास तरह की चीजें करने की तैयारी कर रहे हैं।
लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनके सात शिष्यों को इन 112 तरीकों को सीखने में समय लगेगा तो उन्होंने उन सभी तरीकों को 16-16 के समूह में सात हिस्सों में बांट दिया।

जब इन सातों शिष्यों ने उन सोलह तरीकों को सीख लिया तो आदियोगी ने उनसे कहा, ‘अब वक्त आ गया है कि तुम लोग इस ज्ञान को बाकी दुनिया में बांटने जाओ।’ यह सुनकर वे पूर्णतया भावों से भर गए। वे लोग आदियोगी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। जब वे लोग वहां से जाने लगे तो अचानक आदियोगी ने उनसे कहा, ‘मेरी गुरुदक्षिणा का क्या होगा?’ परंपरा है कि ज्ञान पाने के बाद शिष्य को गुरु के पास से जाने से पहले उन्हें कुछ भेंट या दक्षिणा देनी होती है। ऐसा नहीं है कि गुरु को किसी दक्षिणा या भेंट की जरूरत होती है, लेकिन वह चाहता है कि जाते समय शिष्य अपनी कोई अनमोल चीज समर्पित कर, समर्पण के भाव में जाए। इसके पीछे वजह यह है कि समपर्ण के दौरान इंसान अपनी सर्वश्रेष्ठ अवस्था में होता है। आदियोगी की बात सुनकर उनके सातों शिष्य हैरानी में पड़ गए कि उन्हें क्या भेंट किया जाए। दरअसल, उन शिष्यों के पास उनके शरीर पर पहने बाघचर्म के अलावा और कुछ भी नहीं था।
फिर अगस्त्य मुनि ने कहा, ‘मेरे भीतर 16 रत्न हैं, जो सबसे अनमोल हैं। इन 16 रत्नों को, जिन्हें मैंने आपसे ही ग्रहण किया है, अब मैं आपको समर्पित करता हूं।’ इतना कहकर आदियोगी से सीखे हुए उन 16 तरीकों को उन्होंने गुरु के चरणों में समर्पित कर दिया और खुद पूरी तरह से रिक्त हो गए। उनके इस समर्पण से बाकी छह शिष्यों को भी संकेत मिल गया और उन्होंने भी आदियोगी से सीखी सारी विद्याएं उन्हीं को भेंट कर दीं। अब वे सब पूरी तरह से खाली हो गए थे। आपको इस समर्पण के भाव को समझना चाहिए। उन सारे ऋषियों के जीवन का परम लक्ष्य उस ज्ञान को हासिल करना था। उस ज्ञान को पाने के लिए उन्होंने 84 साल की कठोर साधना की थी और फिर जब उन्हें यह ज्ञान मिला तो एक ही पल में उन्होंने अपने जीवन की उस सबसे बेशकीमती चीज को अपने गुरु के कदमों में रख दिया, और पूरी तरह से खाली हो गए। उनके पास कुछ भी न रहा।
आदियोगी की शिक्षा का यह सबसे महान पहलू था। चूंकि वे शिष्य पूरी तरह से रिक्त हो चुके थे, इसलिए वे उनकी यानी आदियोगी की तरह हो गए।

दरअसल, शिव का मतलब ही है- ‘जो नहीं है’।

आदियोगी की शिक्षा का यह सबसे महान पहलू था। चूंकि वे शिष्य पूरी तरह से रिक्त हो चुके थे, इसलिए वे उनकी यानी आदियोगी की तरह हो गए।
इस तरह से उनके शिष्य भी उनकी तरह शिव यानी ‘जो नहीं है’ हो गए। अगर ऐसा न हुआ होता तो ये शिष्य अपनी सीखी 16 विद्याओं को ताज की तरह अपने सिर पर ले कर निकलते और दुनियाभर में उसका दिखावा व प्रचार करते। चूंकि समर्पण के बाद वे सभी भीतर से खाली हो गए, इसलिए आदियोगी द्वारा बताई सभी 112 विद्याएं उन सभी के भीतर स्वतः जाग्रत हो गईं। जो चीज वे पहले नहीं सीख सकते थे और जिसे ग्रहण करने की उनमें क्षमता नहीं थी उसी चीज को वे महज इसलिए सीख पाए, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की सबसे अनमोल चीज वापस उन्हीं को समर्पित कर दी थी।
तो 16 की संख्या हमारे लिए खास महत्व की है। आने वाले 16 सालों में हम ध्यानलिंग को और ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए कुछ खास तरह की चीजें करने की तैयारी कर रहे हैं। अभी बहुत थोड़े से लोगों ने ही इसका फायदा उठाया है। जबकि यह ज्ञान का एक जबरदस्त भंडार है, दुनिया में कहीं ऐसी कोई कोशिश नहीं हुई है। इसका रूप या कहें इसका ऊर्जा रूप अपने आप में बेहद अनूठा है। अब समय आ गया है कि लोग इसके प्रति और ज्यादा संवेदनशील हो जाएं। लोग यहां पर्यटकों की तरह आते हैं और 15 मिनट बैठने के बाद पूछते हैं कि कोई प्रसाद वगैरह नहीं मिलता क्या? मैं किसी दुर्भावना या असम्मान की भावना से यह नहीं कह रहा। फिर कोई यह भी पूछ बैठेगा – ये 15 मिनट कब खत्म होंगे? जबकि वहीं दूसरे लोगों के लिए ये 15 मिनट एक पल के समान भी होते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप एक पर्यटक की तरह आते हैं, लेकिन अगर आप एक पर्यटक की तरह से इस दुनिया से विदा होते हैं तो वह सबसे दयनीय बात है।
फिर अगस्त्य मुनि ने कहा, ‘मेरे भीतर 16 रत्न हैं, जो सबसे अनमोल हैं। इन 16 रत्नों को, जिन्हें मैंने आपसे ही ग्रहण किया है, अब मैं आपको समर्पित करता हूं।’
इस दुनिया से जाने से पहले, इस दुनिया को बनाने वाला आपका हो जाना चाहिए, पूरी तरह नहीं तो कम से कम आंशिक रूप से ही सही। अगर वह आपका नहीं हो सका तो उसके बिना आप सिर्फ एक माटी के ढेर की तरह हैं, जिसे हर हाल में आपसे वापस ले लिया जाएगा।
अगर आपके भीतर कुछ सुलग रहा है, अगर आपके भीतर कुछ आग है जो आपके शरीर की कुदरती गर्मी से अलग तरह की है, तो आने वाले सालों में हम आपके लिए ऐसी संभावनाएं पेश कर सकते हैं, कि ध्यानलिंग आपके लिए और अधिक तरीके से काम कर सके, भले ही आप आश्रम में स्थाई रूप से रहते हों या फिर यहां छोटी सी अवधि के लिए आ कर ठहरें हों। मेरी एकमात्र कोशिश है कि आपको आपके भौतिकता से परे कुछ और अनुभव करा सकूं। सिर्फ अनुभवों की तलाश करने या उसकी चाह करने से ऐसा नहीं होगा, बल्कि इसके लिए आपको खुद को ग्रहणशील बनाना होगा। यह ध्यान रखिए कि आपकी साधना ही आपकी जीवन रेखा है। मैं आपके साथ हूं।

प्रेम व प्रसाद,

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