दर्शन – समझना नहीं, सिर्फ निहारना है


इस हफ्ते के स्पाॅट में सद्‌गुरु दर्शन से जुड़ी तमाम गलतफहमियों को दूर कर रहे हैं। दर्शन आखिर है क्या? गुरु दर्शन को इतना महत्व क्यों दिया जाता है?

दर्शन का मतलब खुली आंखों से निहारना है। किसे निहारना है? मानव बुद्धि का मूल स्वभाव है कि जो उसके पास है, उससे वह संतुष्ट नहीं होता। अगर यह असंतुष्टता बहुत ही मूलभूत तरीके से प्रकट होती है तो मनुष्य  पैसे, संपत्ति, जीत या शाॅपिंग के बारे में सोचेगा। कुछ लोग बंदूक और तलवार लेकर शाॅपिंग के लिए जाते हैं, तो कुछ हैंड बैग लेकर। ये सब उसी मूलभूत असंतुष्टता की अभिव्यक्तियाँ हैं- जो अपने पास मौजूद चीजों से संतुष्ट नहीं हो सकती। यूं तो संतुष्टि और परिपूणर्ता के लिए कई शिक्षाएं मनुष्यों को दी जाती रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितनी शिक्षाएं एक भी व्यक्ति के लिए कारगर साबित हुई हैं।

अगर आपके पास उत्साही बुद्धिमत्ता है तो यह थोड़ा और पाना चाहती है। इससे इसे कोई नहीं रोक सकता। मान लीजिए आप पैसे की चाहत रखते हैं तो आप सिर्फ और ज्यादा पैसे कमाने की नहीं, बल्कि सारा पैसा कमाने की चाहत रखते हैं और यह कभी पूरी हो नहीं सकती। दरअसल, यह चाहत प्रैक्टिकल नहीं है। आपका जीवन पैसे गिनने में ही बर्बाद हो जायेगा। आप चाहें कितने भी ज़ीरो लगा लें, लेकिन ये जीवन का प्रैक्टिकल समाधान नहीं हैं। पैसों की होड़ छोड़कर ध्यान की तरफ बढ़ना- महज सूक्ष्मता बढ़ाना नहीं है, इसका मतलब है कि आप प्रैक्टिकल और समझदार हो रहे हैं। इससे आपके जीवन की दिशा नहीं बदल रही है – अब आप समझ गए हैं कि ‘और अधिक’ से आप संतुष्ट नहीं होने वाले। आप सबकुछ पाना चाहते हैं।

दर्शन की अवस्था में होने का मतलब है कि इस जीवन को बेहद कोमलता से स्पंदित होने दीजिए।
अगर आप सबकुछ पाना चाहते हैं तो इसे भौतिक रूप से पाने की कोशिश करने में कोई समझदारी नहीं है, क्योंकि भौतिक वस्तुओं को हम हमेशा छोटी और बड़ी के रूप में जानते हैं, पूर्ण के रूप में नहीं। इंसानी बुद्धि की चाह हमेशा से अपने अस्तित्व की असलियत को जानने की रही है। यह चाहत कहीं रूकती नहीं – ये सब कुछ पाना चाहती हैं । अगर आज आप थके हुए या बीमार हैं तो आप कहेंगे कि ‘बस बहुत हो गया’। लेकिन अगली सुबह अगर आपमें थोड़ी और उर्जा है तो आप फिर से सब कुछ पाने के इच्छुक हो जाते हैं। क्योंकि मानव स्वभाव ही ऐसा है।

आप अनजाने में ही असीम खोज रहे हैं। जो असीम है वो हर जगह मौजूद है। आपकी दुर्दशा बस इतनी है कि आप ऐसी चीज चाहते हैं, जो हर जगह मौजूद है, लेकिन आपकी पाचों इन्द्रियां तब तक उसे नहीं जान सकती जब तक उसका कोई संदर्भ न हो- मसलन दिन या रात, स्त्री या पुरुष, अंधेरा या उजाला, ये या वो। अगर बस ‘ये और ये’ है, तो आपकी ज्ञानेंद्रियां उसे पकड़ नहीं पातीं। अगर ठंडा या गरम है तो आप समझ सकते हैं। लेकिन अगर इनमें से कोई सिर्फ एक ही हो तो आप उसे समझ नहीं पाते। आपकी चाहत असीम सच को जानने की है, लेकिन इसे समझ पाने का तरीका आपके पास नहीं है।

दर्शन का मतलब अपनी चाहत को थोड़ा नीचे लाना है। असीम और परम की ओर देखने या उसे खोजने की बजाय उस असीमता की अभिव्यक्ति या उसके मूर्त रूप को देखने की कोशिश कीजिए। उस चीज को देखने की कोशिश कीजिए, जो असीमता में डूबी हुई हो और जिसमें से उसकी सुगंध बिखरती हो। ऐसे में गुरु एक संभावना हो सकता है, क्योंकि वह एक सीमित अस्तित्व है। अन्यथा आप ऐसी कोई चीज नहीं समझ पांएगे, जिसका कोई संदर्भ या अभिव्यक्ति न हो। ज्ञानेंद्रियों को अनुभव में आगे बढ़ने के लिए कुछ खास चीजों की जरूरत होती है। गुरु उसी असीमता की सुगंध में डूबा हुआ होता है। बस आप उसे निहारिए, न कि उसे समझने की कोशिश कीजिए, और न ही उसे पकड़ने या पाने की कोशिश कीजिए। बस सहज रूप से उसे निहारिए।

आखिर दर्शन की अवस्था में होने का मतलब क्या है? आपका शरीर एक खास तरह का स्पंदन है, आपके विचार दूसरे तरह का स्पंदन है, आपकी भावनाएं एक अलग तरह का स्पंदन है। आपके भीतर जो जीवन है, वह किसी और तरह का स्पंदन है। दर्शन की अवस्था में होने का मतलब है कि इस जीवन को बेहद कोमलता से स्पंदित होने दीजिए। जब जीवन की यह कोमलता आपके शरीर, विचारों और भावनाओं से अधिक तीव्र हो जाती हैं,  तब आप सहज रूप से दर्शन की अवस्था में होते हैं। उस समय आप वास्तव में दर्शन कर रहे होते हैं।

तो इसका महत्व क्या हैं? महत्व है कि आप असीमता के उस आयाम का स्वाद चख पाएंगे, जिसे जानने के लिए अभी तक आपके पास कोई तरीका नही है। दूसरे शब्दों में, बिना जीभ के आप स्वाद ले सकते हैं।

प्रेम व प्रसाद,

साउंड्स ऑफ़ ईशा ने कबीर के नैहरवा गाने की प्रस्तुति की, जिसका संगीत कैलाश खेर ने दिया है

नैहरवा

नैहरवा हम का न भावे…
साई कि नगरी …परम अति सुन्दर,
जहाँ कोई जाए ना आवे
चाँद सुरज जहाँ, पवन न पानी,
कौ संदेस पहुँचावै
दरद यह… साई को सुनावै
आगे चालौ पंथ नहीं सूझे,
पीछे दोश लगावै
केहि बिधि ससुरे जाऊँ मोरी सजनी,
बिरहा जोर जरावे
विषै रस नाच नचावे
बिन सतगुरु आपनों नहिं कोई,
जो यह राह बतावे
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
सपने में प्रीतम आवे
तपन यह जिया की बुझावे
नैहरवा…


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