क्रिकेट: सिर्फ आप, आपका बल्ला और बॉल

क्रिकेट: सिर्फ आप, आपका बल्ला और बॉल
क्रिकेट: सिर्फ आप, आपका बल्ला और बॉल

जाने-माने क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने सद्‌गुरु से जानना चाहा कि खेलते वक्त दिमाग में उठने वाले विचारों पर काबू कैसे पाएं। आइए जानें सद्‌गुरु का जवाब:

सहवाग:

सद्‌गुरु, जब मैं खेलता हूं तो मेरे मन में कुछ नकारात्मक विचार आते हैं। जब गेंदबाज दौड़ रहा होता है और जैसे ही बॉल फेंकने वाला होता है, अचानक मेरे मन में विचार आता है – गेंद को जोर से मारो। अगर यह विचार मन में आ गया तो उस वक्त उसे काबू कर पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उस वक्त मैं बॉल खेलने वाला होता हूं। ऐसे विचारों को काबू करने के लिए मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन कर नहीं पाया। इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए ?

सद्‌गुरु:

बॉल को मारो, यह कोई बुरा विचार तो नहीं है!

सहवाग:

हां, यह कोई बुरा विचार तो नहीं है, लेकिन फिर भी… मैं हर गेंद को तो नहीं मार सकता।

सद्‌गुरु:

आपकी बात ठीक है, लेकिन आपके रेकॉर्ड को देखने से तो पता चलता है कि आप बॉल अच्छी तरह से खेलते हैं, आपने भरपूर शॉट लगाए हैं। तो आपका यह विचार अच्छा है, बुरा नहीं है। लेकिन हां, यह जरूर है कि इस विचार को आपकी मजबूरी नहीं बनना चाहिए, यानी ऐसा न हो कि आप इस तरह से सोचने के लिए विवश हों।
देखिए, यह एक ऐसी बात है जो हम सभी को समझनी चाहिए – चाहे कोई क्रिकेट खेल रहा हो, या कोई कारोबार चला रहा हो, या कोई और काम कर रहा हो। एक चीज होती है जिसे हम वास्तविकता कहते हैं। एक और चीज होती है, जिसे वास्तविकता का आभास कहते हैं, जिसे हम अपने भीतर बैठा लेते हैं।
मान लीजिए, आपने अपने जीवन में कभी क्रिकेट नहीं खेला है। पहली बार आप पिच पर खड़े हैं।

खेल से जुड़ी एक याददाश्त है। साथ ही आपकी कल्पना भी है कि जीतने के बाद आप कप को किस तरह थामेंगे। और एक वास्तविकता होती है उस गेंद की जो आपकी ओर आ रही है। यह केवल वास्तविकता ही है, जिसे आप संभाल सकते हैं।
सालों से क्रिकेट खेल रहे हैं, तो अब आपके दिमाग में ऐसा विचार आता है कि गेंद को मारो। इसके पीछे एक वजह यह भी है कि आपको एक अच्छा स्कोर हासिल करना होता है। फिर लोगों की उम्मीदें तो हैं ही – भारत को जीतना ही चाहिए, और भी न जाने क्या-क्या उम्मीदें हैं। इस देश के एक अरब से ज्यादा लोगों की उम्मीदें तो आप जानते ही हैं। इन वजहों से आप सही मायनों में खेल को बस एक खेल की तरह नहीं खेल पाते। लेकिन मैं तो जीवन में हर चीज को खेल ही कहूंगा।
आप खेल में जीत इसलिए हासिल नहीं करते, क्योंकि आप जीतना चाहते हैं। आप बॉल को इसलिए नहीं मारेंगे, क्योंकि आप उसे मारना चाहते हैं। ये सब अगर हो पाता है तो सिर्फ इसलिए, क्योंकि आपने कुछ सही कदम उठाए, कुछ सही काम किया। तो अगर आप कुछ सही करना चाहते हैं, तो सबसे पहली चीज यह है कि आप हालात को समझ पाने में सक्षम हों। आपको लग रहा है कि गेंदबाज 160 किमी प्रति घंटा की रफ़्तार से बॉल फेंकेगा। लेकिन मान लीजिए उसने 60 किमी प्रति घंटा की रफ़्तार से बॉल फेंक दी। ऐसे में शायद बॉल को मारना थोड़ा आसान हो, लेकिन हो सकता है कि आप चूक जाएं, क्योंकि आप किसी और रफ़्तार से बॉल की उम्मीद कर रहे थे। आप ऐसी उम्मीद कर रहे हैं क्योंकि आपकी याददाश्त वास्तविकता पर अपनी छाप डाल रही है। वह एक ऐसी वास्तविकता बना रही है, जो कृत्रिम है, असत्य है।
तो अगर कोई अक्लमंद गेंदबाज है तो वह इन बातों को भांप जाता है और उसी के मुताबिक बॉल फेंकने में बदलाव करता है। यह जरूरी नहीं, कि हमेशा उसी गेंदबाज को सबसे ज्यादा विकेट मिलें जो सबसे तेज गेंद फेंकता है, या जो गेंद को स्पिन करा सकता है। सबसे ज्यादा विकेट उस गेंदबाज को मिलते हैं, जो बैट्समैन की उम्मीदों को भांप जाता है, और फिर उसका उल्टा करके बैट्समैन को चकमा देता है। तो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि जीवन के किस पहलू की बात हो रही है, चाहे खेल हो या कुछ और, महत्वपूर्ण बात यह है कि हम उस हालात को अच्छी तरह से समझें, जो हमारे सामने है और फिर उसी के हिसाब से सही कदम उठाएं।
जब आप क्रीज पर होते हैं, तो बस आप, आपका बल्ला और बॉल ही आपके लिए सब कुछ होना चाहिए। आपके दिमाग में क्रिकेट भी नहीं होना चाहिए, आपको भारत के बारे में भी नहीं सोचना चाहिए। यह आपके परिवार या एक अरब से ज्यादा लोगों की बात भी नहीं है। कोई मुझसे कह रहा था कि इस बार हमें पाकिस्तान को पीटना होगा। उस वक्त आप भी टीम में थे। मैंने उससे कहा, “पाकिस्तान को पीटने की कोशिश मत करो। बस बॉल को पीटो।” अगर आप पाकिस्तान को पीटना चाहते हैं, तो पाकिस्तान बॉल के अंदर नहीं है, वह कहीं और है। उसे पीटने की कोशिश करेंगे, तो होगा यह कि आप पवैलियन पहुंच जाएंगे।
मैं जो बताना चाह रहा हूं, वह यह है कि इंसान के दिमाग में – अनुभूति, याद्दाश्त, और कल्पना – ये तीनों चीजें एक साथ चलती रहती हैं। लोग इन चीजों को अलग-अलग नहीं रख पाते। खेल से जुड़ी एक याददाश्त है। साथ ही आपकी कल्पना भी है कि जीतने के बाद आप कप को किस तरह थामेंगे। और एक वास्तविकता होती है उस गेंद की जो आपकी ओर आ रही है। यह केवल वास्तविकता ही है, जिसे आप संभाल सकते हैं। याददाश्त और कल्पना के साथ तो आप ख्याली पुलाव ही पका सकते हैं। पहली चीज वो है जो बीत चुकी है, और दूसरी चीज वो है जो अभी होनी बाकी है। जबकि वास्तविकता यह है कि बॉल आपकी ओर आ रही है, आपके हाथ में बैट है और आपको उसे मारना है, यह देखते हुए कि वह बॉल किस योग्य है, उसके साथ कैसा सलूक होना चाहिए। यह देखते हुए आपको नहीं मारना है, कि भारत किसके योग्य है, या पाकिस्तान के साथ क्या सलूक होना चाहिए। बॉल जिस योग्य है, बॉल जैसी आ रही है, आपको उसके साथ वैसा सलूक करना है।
तो मन में इस तरह की स्पष्टता रखने के लिए कुछ तरीके होते हैं। इनसे आप अपने मन पर काबू रख सकते हैं। मान लीजिए, मैं यहां बैठा हूं। मैं कौन हूं, मेरे माता-पिता कौन थे, मेरा लालन पालन कैसे हुआ, मैं बड़ा कैसे हुआ, और इससे संबंधित तमाम बातें – अगर अभी मेरे दिमाग में घूमने लगें, तो मैं उस चीज पर ध्यान नहीं दे पाऊंगा, उसे समझ नहीं पाऊंगा, जो यहां मौजूद है।
कोई मुझसे कह रहा था कि इस बार हमें पाकिस्तान को पीटना होगा। उस वक्त आप भी टीम में थे। मैंने उससे कहा, “पाकिस्तान को पीटने की कोशिश मत करो। बस बॉल को पीटो।”
बस मेरी यादें ही मेरे दिमाग में रहेंगी। यादें, हकीकत नहीं होती क्योंकि इसका संबंध उन चीजों से होता है जो बीत चुकीं, जिनका अब अस्तित्व नहीं है। जिस चीज का अस्तित्व नहीं है, अगर वह उन चीजों के आड़े आएगी जिनका अस्तित्व है तो आप उन चीजों को खो देंगे जिनका अस्तित्व है। यह बात हर किसी के जीवन में लागू होती है, लेकिन एक खिलाड़ी के जीवन में इसका असर तुरंत दिखाई दे जाता है। बाकी लोगों के जीवन में इसका असर बाद में पता चलेगा, और वे देखेंगे कि ये तरीका काम नहीं करता। लेकिन आपके जीवन में यह अभी के अभी पता चलता है। या तो आप क्रीज पर होंगे या मैदान के बाहर बैठे दूसरों के लिए तालियां बजा रहे होंगे। यह बिल्कुल साफ है।
देखिए, आपको एक बेहद परिष्कृत यंत्र दिया गया है, जिसे दिमाग कहते हैं। इंसान का दिमाग कोई मामूली चीज नहीं है। यह एक बड़ा शानदार यंत्र है। अगर आप एक फोन खरीदते हैं, एक सामान्य सा फोन, जिसे आजकल स्मार्ट कहा जाता है, हालांकि यह उतना स्मार्ट नहीं है जितने कि आप। आपको उसका मैन्युअल पढऩा पड़ता है, जो करीब बीस पेज का होता है, यह जानने के लिए, कि फोन का कैसे इस्तेमाल करें। इसमें आपको यह नहीं बताया गया है कि यह काम कैसे करता है। वे बस आपको यही बता रहे हैं, कि इसे इस्तेमाल कैसे करना है। इसी के लिए आपको इतना पढऩा पड़ता है। सोचिए, अगर आप यह जानना चाहें, कि यह काम कैसे करता है, तो आपको कितना पढऩा पड़ेगा। क्या कभी आपने दिमाग इस्तेमाल करने के लिए कोई मैन्युअल पढ़ा है ?

सहवाग:

नहीं।

सद्‌गुरु:

बस यही है असली बात। हम यह नहीं देख रहे हैं कि दिमाग काम कैसे करता है। हम बस इसे इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।

सहवाग:

क्या इसे इस्तेमाल करने का कोई तरीका या तकनीक है?

सद्‌गुरु:

बिल्कुल, इसका तरीका है, और बहुत ही प्रमाणित तरीका है।


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