क्रिकेट: जुनून को नहीं, अनुभव को खेलने दें

सद्गुरुजब हम कोई नया काम करना शुरू करते हैं अक्सर बहुत ज्यादा जोश और ऊर्जा के साथ उसे करने में लग जाते हैं। लेकिन अनुभव हो जाने के बाद हमारे काम करने के तरीकों में बदलाव आने लगता है। ऐसे में अगर एक बार फिर से वही जुनून हमारे अंदर उमड़ने लगे, तो क्या किया जा सकता है?

वीरेन्द्र सहवाग:

सद्‌गुरु, क्या कोई ऐसा मंत्र या शब्द है जिसे बार-बार दोहराते रहने से मेरी एकाग्रता बढ़ जाए? मतलब मैं खुद को यह कहने की बजाय कि बॉल को जोर से मारो, बॉल को पूरी एकाग्रता से देखने लगूं। कभी-कभी बल्लेबाजी करते वक्त मैं गाना गाने की भी कोशिश करता हूं।

सद्‌गुरु:

मुझे इस बात की खुशी है कि किसी ने आपका गाना नहीं सुना।

सहवाग:

बस मेरा साथी बल्लेबाज ही मेरा गाना सुन पाता है। इस तरीके से कुछ समय के लिए मैं उस विचार को नियंत्रित कर पाता हूं। उसके बाद मैं जम जाता हूं और फिर मैं बॉल पर अपनी सही प्रतिक्रिया दे पाता हूं।

सद्‌गुरु:

बॉल का जवाब दीजिए, प्रतिक्रिया नहीं।

सहवाग:

एक ही बात है। गेंदबाज जैसी भी गेंद डाल रहा है, मुझे उसके प्रति प्रतिक्रिया देनी ही है।

सद्‌गुरु:

जवाब देने और प्रतिक्रिया देने में अंतर है। प्रतिक्रिया आप अपने मन की आक्रामक स्थिति के कारण देते हैं, जबकि जवाब सतर्क होकर पूरी सजगता के साथ दिया जाता है। आपको जो भी थोड़ा सा वक्त मिल रहा है, उसी में आप पूरी सजगता के साथ बॉल का जवाब दें। बस यूं ही बॉल को मारने के बजाय उसे समझने के लिए थोड़ा समय लेना सजगता को दर्शाता है।

आप कह रहे थे कि आप कुछ गुनगुनाना चाहते हैं, कोई मंत्र या ऐसी ही कोई बात दोहराते रहना चाहते हैं। मुझे लगता है कि ऐसा करके आप एक भटकाव को दूसरे भटकाव से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। एक भटकाव तो यह है कि आपके भीतर का युवा आपसे बार-बार कहता है कि बॉल को जोर से मारो।

तो अगर आनंद आपके भीतर से ही आना है तो ऐसा क्यों नहीं हो सकता है कि वह हर समय आता रहे। अगर दिल्ली के नलों से आनंद आ रहा होता तब तो मैं मान लेता कि यह कभी भी आना बंद हो सकता है
आप इस भटकाव को एक दूसरे भटकाव यानी गाना गाकर नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। किसी समस्या को ठीक करने का यह तो कोई तरीका नहीं हुआ। अभी आपकी समस्या ध्यान भटकने की है। आप अपनी समस्या को बढ़ा रहे हैं और सोच रहे हैं कि आपको उससे निजात मिल गई। आप अपनी ट्रेनिंग और अपनी स्वाभाविक प्रतिभा की वजह से बॉल को मार पाने में सफल हो रहे हैं। ये चीजें आपकी मदद कर रही हैं, लेकिन मेरा मानना है कि जैसे-जैसे कोई खिलाड़ी परिपक्व होता है, खेल में भी और उम्र में भी, तो सबसे अधिक महत्वपूर्ण ये हो जाता है कि आप हर दम एक आक्रामक खेल खेलने की बजाय सजगता के साथ खेलें।

जब आप युवा होते हैं तो आक्रामक खेल खेलना ठीक हो सकता है। अगर आपमें आक्रामक स्वभाव प्रबल है तो यह आपको दूसरों से बेहतर साबित करने में भी मदद करता है। हर किसी में तुरंत उत्तर देने (रिफ्लेक्स) का स्तर एक सा नहीं होता।

जब मैं युवा था, हालांकि मैं अब भी युवा हूं (सहवाग हंसते हैं), तो उस वक्त की बात है – अगर कहीं कोई गुस्सैल कोबरा मिल जाता तो मैं उसे यूं ही पकड़ लेता था और उसकी ओर देखे बिना उसे लेकर चल पड़ता था। किसी डंडे की जरूरत नहीं होती थी, बस सावधानी से पकड़ लेता था उसे। आज भी मैं कोबरा पकड़ता हूं, लेकिन अब मैं सावधानी से उसके पीछे से जाता हूं, क्योंकि अब मेरी उत्तर देने की क्षमता (रिफ्लेक्स) उतनी तीव्र नहीं रह गई है। उस वक्त अगर मैं वह सब कर पाया तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मेरा रिफ्लेक्स बहुत तीव्र और असाधारण था। अब मुझे यह सब अपनी बुद्धि और विवेक से करना पड़ता है। मैं अब भी वह काम कर सकता हूं, बल्कि पहले से ज्यादा सुरक्षित तरीके से।

उस वक्त तो मैं यह सब काम कर गया। मान लीजिए, मुझसे कोई गलती हो जाती, फिर तो पूरा खेल ही बदल जाता। आज जब मैं यह सब करता हूं तो मुझे पता है कि मुझसे गलती नहीं होगी, क्योंकि मैं यह काम पूरी सावधानी से और एक खास तरीके से करता हूं। ठीक है कि आपके सामने कोबरा नहीं, एक बॉल होती है, लेकिन वह भी आपको मार सकती है, मार नहीं सकती तो आपको चोटिल तो कर ही सकती है।

सहवाग:

बॉल मुझे चोटिल कर सकती है, मार नहीं सकती।

सद्‌गुरु:

हां। बॉल आपको चोटिल कर सकती है। अब जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ रही है, आपको इसे ज्यादा सावधानी से संभालना चाहिए। कहीं न कहीं हमारे भीतर का युवा हमसे कहता है कि सावधानी का मतलब कायरता है। जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमें लगने लगता है कि सावधानी अच्छी चीज है। आपको पता है, एक समय में मैं हैंग ग्लाइडर उड़ाया करता था। हैंग ग्लाइडर्स के मामले में एक कहावत है- कुछ पायलट दिलेर होते हैं, कुछ पायलट बूढ़े होते हैं। ऐसा कोई पायलट नहीं होता जो बूढ़ा भी हो और दिलेर भी। जो दिलेर होते हैं, वे युवावस्था में ही मर जाते हैं और अगर पायलट बूढ़े हो गए तो इसका मतलब है कि उन्होंने पूरी सावधानी से उड़ान भरी होगी।

यह बात जीवन के हर पहलू पर लागू होती है। जीवन में हमने कोई भी काम जो पूरे जोश और धधक के साथ किया है, उम्र बढऩे के बाद एक खास समय आने पर उसी काम को हमें पूरी सावधानी, अनुभव और विवेक के साथ करना पड़ता है। वैज्ञानिक तथ्य है कि 35 साल की उम्र के बाद आपकी बुद्धि में भी धीरे-धीरे गिरावट आनी शुरू हो जाती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि युवाओं के मुकाबले आप बेवकूफ बन गए, क्योंकि आपके पास अनुभव होता है, जो उनके पास नहीं होता।

उनके पास उत्साहपूर्ण बुद्धि हो सकती है, लेकिन अनुभव नहीं होता। तो अब आपका खेल भी इसी दिशा में जाना चाहिए। हर किसी की जिंदगी को इसी रास्ते जाना चाहिए।

आप कैसे हैं, यह इस बात से कभी तय नहीं होना चाहिए कि दूसरा कैसा है। एक बार अगर आपने ऐसा होने दिया तो आप हमेशा के लिए दूसरे के दास बनकर रह जाएंगे, क्योंकि फिर इस बात का फैसला कि आप खुश हैं या दुखी, वह शख्स करने लगेगा, खुद आप नहीं।
और रास्ता क्या है? रास्ता यह है कि कोई भी काम बस यूं ही दिलेरी की साथ करने की बजाय पूरी सजगता और अपने अनुभवों का इस्तेमाल कर के करना है। अब उस विचार की बात करते हैं कि जब भी बॉल आपके पास आती है तो आपको लगता है कि उसे मारना चाहिए। आप अपनी इस सहज प्रवृति को नियंत्रित करने की कोशिश मत कीजिए। इसे परिपक्व कीजिए। अभी आप खुद को इस प्रवृत्ति से भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। यह कोई विचार नहीं है, यह कुछ ऐसा है कि आप बड़ा होने से इनकार कर रहे हैं। कहीं न कहीं बात यह है कि आप यह स्वीकार करना नहीं चाहते कि अब आप 18 साल के वह युवा नहीं रहे, जो हर उस चीज को जोर से मार सकता था जो उसके रास्ते में आती थी।

एक दौर होता है जब आप हर उस चीज को मार सकते हैं, जो आपके रास्ते में आती है लेकिन बाद में ऐसा नहीं होता। यह जीवन की वास्तविकता है। आप ऐसे सोचिए कि 18 साल की उम्र में आपके पास जो नहीं था, वह आज आपके पास है यानी आज आपके पास अनुभव है। यह कोई छोटी चीज नहीं है, बहुत बड़ी चीज है यह। मुझे लगता है कि अब आपके अनुभव को खेलना चाहिए, क्योंकि आपके उस अनुभव का कोई मुकाबला नहीं है। आपका रेकॉर्ड खुद बोलता है। इस धरती पर बहुत कम खिलाड़ी ऐसे हैं, जो आपके कीर्तिमानों की बराबरी करते हों। आपका अनुभव अब सामने आना चाहिए। मुझे पता है वे सभी कीर्तिमान इसीलिए बने क्योंकि आपके भीतर एक खास तरह की आग थी, लेकिन अब उसी आग को अनुभव में रूपांतरित करने की जरूरत है।

सहवाग:

कभी-कभी ऐसा होता है कि जब मैं बल्लेबाजी कर रहा होता हूं, उस वक्त अगर कोई कुछ कह दे तो मैं बड़ी जल्दी परेशान हो जाता हूं, मेरा ध्यान भंग हो जाता है और मैं आउट हो जाता हूं। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि जब कोई विशेषज्ञ मेरी आलोचना कर रहा होता है या कोई कुछ कह रहा होता है तो मैं और भी ज्यादा रन बनाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हो जाता हूं। लेकिन मेरा ध्यान भी बड़ी आसानी से भंग हो जाता है। ऐसी हालत में मुझे क्या करना चाहिए? क्या मुझे उनकी बातों का जवाब देना चाहिए या खुद को काबू करने की कोशिश करनी चाहिए?

सद्‌गुरु:

सबसे पहले तो आपको अपनी प्राथमिकताएं और लक्ष्य तय करने चाहिएं। आप दूसरे देश गए हैं, क्या इसलिए कि किसी के कुछ कहने पर आप उसका मुंह तोड़ दें या इसलिए गए हैं कि अपने क्रिकेट को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाएं और वापस आएं? आपको यह तय करना होगा। आप दूसरे देश में क्रिकेट की खातिर जाते हैं, मुक्केबाजी या किसी लड़ाई झगड़े के लिए नहीं। आपका मकसद क्रिकेट खेलना है, यह बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए। यह बात बस क्रिकेट के मैदान पर ही लागू करने की नहीं है, जीवन के हर क्षेत्र में यह बात लागू होनी चाहिए। आपकी रोजमर्रा की जिंदगी में भी थोड़े बहुत ध्यान की जरूरत है, जैसे अगर आप कहीं बैठें भी तो पूरी तरह और पूरे मन से बैठें। ऐसा न हो कि शरीर यहां है और मन कहीं और भटक रहा है। इस बात को आपको अपने जीवन में उतार लेना चाहिए, इससे आपको मैदान में अच्छे नतीजे मिलेंगे।

लेकिन यह सब आप खेल के मैदान पर जा कर नहीं कर सकते। इसे आपको रोजमर्रा के जीवन में उतारना चाहिए कि आप जो चाहें, आपका मन वही करे। बॉल को मारना भी ऐसे ही है। आप बॉल मार पाते हैं और दूसरा व्यक्ति बॉल नहीं मार पाता, इसकी सीधी सी वजह यही है कि आपका शरीर वैसा ही कर रहा है जैसा आप चाहते हैं जबकि दूसरे व्यक्ति का शरीर उसकी इच्छा के मुताबिक काम नहीं कर पा रहा। यही बात मन पर भी लागू होती है। मेरा मन मेरे आदेशों को मान रहा है, जबकि आपका मन आपके दिए गए निर्देशों को नहीं ले रहा।

सहवाग:

लेकिन सद्‌गुरु यह तो हमारे जीवन का हिस्सा है।

सद्‌गुरु:

हां मैं समझ रहा हूं, लेकिन आपको यह समझने की जरूरत है कि आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जो आपके भीतर घटित हो रहा है। चाहे कष्ट हो या आनंद, सब कुछ आपके भीतर से ही आता है। तो अगर आनंद आपके भीतर से ही आना है तो ऐसा क्यों नहीं हो सकता है कि वह हर समय आता रहे। अगर दिल्ली के नलों से आनंद आ रहा होता तब तो मैं मान लेता कि यह कभी भी आना बंद हो सकता है, लेकिन अगर यह आपके भीतर से आ रहा है तो फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि यह हर पल बहता रहे? इसलिए कि हम इसका ध्यान नहीं रखते। आप कैसे हैं, यह इस बात से कभी तय नहीं होना चाहिए कि दूसरा कैसा है। एक बार अगर आपने ऐसा होने दिया तो आप हमेशा के लिए दूसरे के दास बनकर रह जाएंगे, क्योंकि फिर इस बात का फैसला कि आप खुश हैं या दुखी, वह शख्स करने लगेगा, खुद आप नहीं। सवाल न्याय या अन्याय का नहीं है, वह बिल्कुल अलग बात है। चाहे न्याय हो या अन्याय, आप अपने और अपने आसपास के लोगों के साथ, अगर कोई सबसे नाजायज काम कर सकते हैं तो वह है खुद को दुखी रखना।

खुद को दुखी बना कर रखने का अर्थ है कि आप एक जीवन के रूप में कमज़ोर हैं। आपके धंधे में जीवन की कमज़ोरी का अर्थ यह हो सकता है कि आपको बाहर निकाल दिया जाए। अलग-अलग लोगों के जीवन में इस कमज़ोरी का नतीजा अलग-अलग हो सकता है, लेकिन आपके मामले में इस कमज़ोरी का नतीजा यह होगा कि आपको जल्दी ही पविलियन लौटना होगा। दूसरे लोगों के जीवन की तुलना में आपके जीवन में इसका नतीजा ज्यादा स्पष्ट और सख्त होगा, क्योंकि दूसरे लोग अपनी कमज़ोरी के बारे में सफाई दे सकते हैं, आप अपनी कमज़ोरी की कोई सफाई नहीं दे सकते, क्योंकि वह सबको दिख जाता है।

 


संबन्धित पोस्ट


Type in below box in English and press Convert



  • kali

    35 की अवस्था के बाद ब्रेन कम नहीं होता,वरन वह एक नए आयाम में प्रवेश कर जाता है.अनुभव प्रगाढ होता जाता है. विवेकपूर्ण निर्णय महत्वपूर्ण हो जाते हैं.अनुभव का तात्पर्य पास्ट से सीखी गयी विवेकपूर्ण निर्णयों से हैं. सहवाग जी की बात सही है की कई बार एकाग्रता भंग हो जाती है और इसको(एकाग्रता) बनाये रखना ही उनकी पहचान होती है. यह हर मनुष्य का प्रश्न है की शरीर और मन में अगर अंतर आ गया तो कैसे सुधार करें? भूत वर्त्तमान पर हावी होता जाता है और जीवन की गति क्रमशः धीमी होती जाती है. अगर लाइफ में गति नहीं है तो जीवन निराशा से भर जाता है. क्या गति और विवेक/अनुभव एक साथ नहीं रह सकते?

  • Jaya

    जब मैं युवा था, हालांकि मैं अब भी युवा हूं , Namaskaram Sadhguru so age also matter regardless of mortal truth ;D