भीग रही धरती, सूख रहे मूल्य


मॉनसून

जब आता है मॉनसून
जब लगती है झड़ी बरसात की
तो कभी होता है ये उग्र व उद्दंड
तो कभी शिष्ट व सौम्य
कभी मोटी-मोटी बूंदें
जो होती हैं शोख
पहुंचा जाती हैं चोट
कभी मनमोहक सी भीनी भीनी फुहार
मिट्टी के रास्तों पर बने
लुभावने पानी से भरे गड्ढे

झूमते हैं पेड़ और पौधे
आनंद और मस्ती में डूबे हों जैसे
कभी वो हवा के साथ तो कभी हवा उनके साथ
कभी उग्र और प्रचंड
तो कभी शांत और अचल।
यह जीवन का नर्तन है
या जीवन को रचने का सामान
कितनी खूबसूरती से रचा गया है
इन बरसाती दो महीनों को
जो तय करते हैं
कि आने वाले पूरे साल में
कैसा होगा जीवन-
सारे जीवों का, मानव का भी
दुनिया के इस हिस्से में
देर कर दी आने में
इस मॉनसून ने
सहस्र अकुलाई आंखें छान रही हैं आसमान
कि देख सकें साक्षात जीवन-नृत्य 

वेलांगिरी में सबसे सुहाना और बढ़िया मौसम होता है मॉनसून का। आज से बीस साल पहले हम पहली बार इस जगह पर आए थे, उस समय मॉनसून सबसे तेज व सबसे बढ़िया रंग में था। व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह मौसम बहुत भाता है, मैं इसका सबसे ज्यादा आनंद लेता हूं। हालांकि इस वक्त सभी चीजें नम हो जाती हैं, धीमी हो जाती हैं या थम जाती हैं। कभी-कभी घुटनों तक पानी में डूबे रहना आपकी हड्डियों के लिए आम बात है। इस दौरान हवा के वेग के साथ रिमझिम फुहारें आपमें जीवन का संचार और रूपांतरण करने के लिए काफी होती हैं। मॉनसून के दौरान पिछले दो हफ्तों से मैं ईशा योग केंद्र में हूं और मेरा यह समय बहुत खूबसूरत रहा है। आज शाम से इनर-वे कार्यक्रम की शुरुआत हो रही है। मैं सोच रहा हूँ कि इस कार्यक्रम के बाद इस तरह पूरे दिन चलने वाले कार्यक्रमों से मैं बचूं।

दिल्ली में नई सरकार के आने के बाद हम रोजमर्रा के भ्रष्टाचार और घोटालों की घटनाओं से तो बच रहे हैं, लेकिन देश महिलाओं पर हो रहे यौन-उत्पीड़नों से परेशान है और इन घटनाओं से बच्चे भी अछूते नहीं हैं। इस मामले में विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं की मानसिकता भी मददगार साबित नहीं हो पा रही है। लगातार हो रहे बर्बर यौन उत्पीड़नों ने समाज को सुन्न और असहयाय बना दिया है। बलात्कारी व्यक्ति की मानसिक बनावट को समझना अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है। इस समस्या से निपटने के लिए हमें अपने सामाजिक जीवन, जीवन-मूल्यों और सामाजिक ताने-बाने को लेकर कई स्तरों पर गहन पुनर्विचार करना होगा। इसके साथ ही लिंग आधारित शिक्षा और जागरूकता पर भी गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
स्वस्थ समाज को बनाने के लिए अपनी बच्चियों की सुरक्षा करना बेहद जरूरी है। जो समाज अपने यहां की महिलाओं को सम्मान नहीं करता या उनकी समुचित परवाह नहीं करता, वह कभी भी आगे विकास नहीं कर सकता, फल-फूल नहीं सकता। उम्मीद है कि आने वाला समय नारीत्व के खिलने और महकने का होगा।

प्रेम व प्रसाद,

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