भविष्यवाणी : क्या आपका जीवन बदल सकती है?

भविष्यवाणी : क्या आपका जीवन बदल सकती है?
भविष्यवाणी : क्या आपका जीवन बदल सकती है?

भविष्यवाणी सुनने में हम कई बार रूचि दिखाते हैं। क्या भविष्यवाणी जानने का कोई फायदा है? क्या आपके जीवन में भविष्य के बारे में जानकार बदलाव आ सकते हैं?

 

जिज्ञासु: सद्‌गुरु, कहा जाता है कि व्यास मुनि ने महाभारत के घटित होने से पहले ही उसे लिख डाला था और ये सभी घटनाएं उसके बाद हुईं। यह भी कहा जाता है कि किसी ने कंस से कहा था कि कृष्ण आकर उसका वध करेंगे। लोग घटनाओं के घटित होने से पहले ही उनके बारे में कैसे जान सकते हैं?

 

सद्‌गुरु इसे भविष्यवाणी कहा जाता है। क्या हमारे जीवन का कुछ हिस्सा पहले से तय होता है और यदि ऐसा है तो हमारी कोशिशों का मतलब क्या है? मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं। धर्मयुद्ध नाम से प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र युद्ध सबसे भीषण युद्ध था जिसमें कोई भी निष्पक्ष नहीं रह सकता था। आप या तो कौरवों के पक्ष में हो सकते थे या पांडवों के पक्ष में। सैंकड़ों राजा एक या दूसरी ओर से लड़ाई में शामिल हो गए।

उडुपी के राजा ने कृष्ण से कहा, हर कोई लड़ाई में शामिल है। युद्ध लड़ने वालों को भोजन की जरूरत होती है। मैं कुरुक्षेत्र युद्ध के लिए खान-पान की व्यवस्था करूंगा। 
मगध राज्य के शक्तिशाली राजा जरासंध की मृत्यु हो चुकी थी, तो उसके पौत्र अलग-अलग हो गए। ज्यादातर मगधों ने कौरवों की सेना में शामिल होना पसंद किया और कुछ पांडवों की ओर चले गए। लगभग पूरा आर्यावर्त दो हिस्सों में बंट चुका था। सिर्फ एक ने निष्पक्ष रहने का फैसला किया, वह था उडुपी का राजा।

उडुपी के राजा ने कृष्ण से कहा, हर कोई लड़ाई में शामिल है। युद्ध लड़ने वालों को भोजन की जरूरत होती है। मैं कुरुक्षेत्र युद्ध के लिए खान-पान की व्यवस्था करूंगा। आप जानते होंगे कि उडुपी के व्यंजन काफी मशहूर हैं। उडुपी के बहुत से लोग आज भी इसी पेशे में हैं। कृष्ण बोले, ठीक है, किसी न किसी को तो खाना बनाना और परोसना है ही, तो आप यह काम कर लें। उडुपी के राजा ने दोनों पक्षों के लिए भोजन तैयार करने का जिम्मा लिया। कहा जाता है कि करीब 5 लाख सैनिक इस लड़ाई के लिए इकट्ठे हुए थे। लड़ाई अठारह दिन चली और रोजाना हजारों लोग मर रहे थे। उस स्थिति में खानपान की व्यवस्था करना एक चुनौती थी। पांच लाख लोगों के लिए भोजन पकाते रहने से बहुत सारा भोजन बर्बाद हो जाता। अगर वह कम भोजन पकाते, तो सैनिक भूखे रह जाते। यह भी कोई अच्छी बात नहीं थी।

भविष्यवाणी सुनकर खाना बनता था कुरुक्षेत्र में

लेकिन उडुपी के राजा ने भोजन का प्रबंध बहुत अच्छी तरह से किया। गजब की बात यह थी कि हर दिन पकाया गया भोजन सभी सैनिकों के लिए पूरा हो जाता और भोजन की कोई बरबादी भी नहीं होती थी। लोग हैरान होने लगे कि वह बिल्कुल सटीक मात्रा में भोजन कैसे पका पा रहे हैं क्योंकि कोई नहीं बता सकता था कि किसी दिन कितने लोगों की मृत्यु हुई या होगी। इन चीजों का हिसाब लगाने में बहुत देर हो जाती। निश्चित रूप से रसोइए के पास यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं था कि हर दिन कितने लोगों की मृत्यु हुई, लेकिन हर दिन वह ठीक उतना ही भोजन पकाता जो बाकी बचे सैनिकों के लिए काफी होता।

जब किसी ने उडुपी के राजा से पूछा कि वह ऐसी व्यवस्था कैसे कर पाते हैं, तो उसने जवाब दिया, ‘कृष्ण हर रात को उबली हुई मूंगफलियां खाना पसंद करते हैं। मैं उन्हें छील कर एक बरतन में रख देता हूं। वह उनमें से कुछ मूंगफली खाते हैं। उनके खाने के बाद मैं गिनती करता हूं कि उन्होंने कितनी मूंगफलियां खाईं। अगर उन्होंने 10 मूंगफली खाईं, तो मुझे पता चल जाता है कि अगले दिन 10,000 लोग मर जाएंगे। इसलिए अगले दिन दोपहर के भोजन में मैं 10,000 लोगों का खाना कम कर देता हूं। हर दिन मैं इन मूंगफलियों को गिन कर उसी के मुताबिक खाना पकाता हूं और वह सही निकलता है।’

 

जीवन बहुत से स्तरों पर काम करता है। ‘इटरनल इकोज’ में आरंभ और अंत को जानने के संबंध में ‘प्रणाम’ नाम की एक कविता है।

 

प्रणाम

 

मेरी जागरूकता जानती है

बीते हुए और आने वाले कल को

मेरा प्रेम सिर्फ आज को जानता है

आरंभ और अंत के बोध

के बीच है जीवन का खेल

घातक विष के साथ है प्रेम का आनंद

कठोर साधना में छिपी है

गुरु की अद्भुत कृपा

ज्ञान की आग निकली थी

उपहास और नाकामियों से

दुखते बदन की पीड़ा में था

जीव का परमानंद, तृप्ति की उमंग

क्या यह कोई ठिठोली है

या शिव की मर्जी

वह करुणामय हैं, या कठोर

ओ शंभो

मैं सब से कहना चाहता हूं

मैं इसके सिवा कुछ नहीं चाहता

मैं इसके सिवा कुछ नहीं चाहता

 

कृष्ण की स्थिति भी ऐसी ही थी। वह शुरुआत और अंत को जानते थे, मगर फिर भी उन्हें बीच में जीवन का खेल खेलना था। लोग हमेशा अपना भविष्य जानना चाहते हैं। आपको अपना भविष्य इसलिए नहीं जानना चाहिए क्योंकि यदि मैं आपको बता दूं कि कल क्या होगा, तो आप आज में भागीदारी नहीं करेंगे। अगर मैं आपको बता दूं कि आप कल मरने वाले हैं, तो आप कहेंगे, ‘अगर मैं मरने ही वाला हूं, तो ध्यान क्यों करूं? मैं काम पर क्यों जाऊं?’ आपकी मन:स्थिति ऐसी है। कृष्ण ऐसे नहीं हैं – उन्हें भविष्य पता है मगर फिर भी वह वर्तमान में पूरी तरह भागीदारी करते हैं।

शुरुआत और अंत को जानते हुए भी आपको बीच में जीवन का खेल खेलना पड़ता है। वरना कोई खेल होगा ही नहीं क्योंकि खेल सिर्फ इसी पल खेला जा सकता है। अब आप पूछ सकते हैं, ‘कल को जानते हुए भी आप हमें आज खेलने के लिए कह रहे हैं?’ आपको चाहे भविष्य के बारे में पता हो, तो भी आपको वर्तमान में खेलना चाहिए। या फिर पूरे खेल से ही पीछे हट जाना चाहिए। मगर आप ऐसा करने में समर्थ नहीं हैं। वैसे भी आपको खेलना ही है, तो बेहतर है कि अच्छी तरह खेलें। आपको काम करना ही है, तो उसे बेमन से क्यों करें? उसे अच्छी तरह करना बेहतर होगा।

 

 


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