भैरागिनी : जो रंगी हुई है देवी के रंग में

ईशा आश्रम स्थित देवी मंदिर में कुछ भैरागिनी मां हैं। कौन होती हैं भैरागिनी, और कैसे ये ब्रह्मचारियों से अलग हैं, इसी की चर्चा कर रहे हैं सद्‌गुरु आज के स्पाॅट मेंः

प्रश्न: सद्‌गुरु, क्या आप हमें ‘भैरागिनी मां’ के मार्ग के बारे में बता सकते हैं? कृप्या हमें ‘भैरागिनी’ का मतलब बताएं और यह भी बताएं कि यह किस तरह से ब्रम्हचर्य से अलग है?

सद्‌गुरु: राग का अर्थ है – रंग। एक तरह से ‘भैरागिनी’ का अर्थ हुआ, जो देवी के रंग में रंगी हो। जबकि ब्रम्हचर्य का मतलब वैराग्य से है, जिसका मतलब ‘रंगहीन’ होना है। हालाँकि रंगहीन को एक नकारात्मक संकेत माना जाता है, लेकिन इसका एक मतलब ‘पारदर्शी होने’ से भी है। तो ब्रम्हचारी इसी कोशिश में लगा रहता है कि कैसे वैराग्य की स्थिति में पहुंचा जाए। जीवन को पारदर्शी कैसे बनाया जाए, जहां स्पष्टता ही जीवन का परम लक्ष्य हो। ऐसी स्पष्टता जो जीवन और मृत्यु के आरपार देख सके। भैरागिनी चंद्रमा की तरह होती हैं, चंद्रमा में अपनी चमक नहीं होती, वह सूर्य के प्रकाश से चमकता है।

आने वाले एक से दो सालों में और ज्यादा लोग इस मार्ग पर जा सकते हैं। अगर आप खुद को पूरी तरह से समर्पित कर सकते हैं, तो यह एक बेहद सुंदर मार्ग है।
सूर्य ही चंद्रमा को शक्ति व प्रकाश दे रहा है, फिर भी अधिकतर लोग सूर्य से ज्यादा चंद्रमा को पसंद करते हैं। वे लोग अकसर चांद की तरफ देखते हैं, क्योंकि उन्हें यह ज्यादा नजदीक व दर्शनीय लगता है। उन्हें चांद में ज्यादा विविधता नजर आती है, यह हर दिन अलग नजर आता है। चांद की अठ्ठाइस कलाएं हैं। जबकि सूर्य हर दिन सुबह से शाम तक एक सा नजर आता है।
भैरागिनी और ब्रम्हचारी दो अलग-अलग मार्ग हैं। अभी तक हमने भैरागिनी मार्ग पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। अभी हमारे पास सिर्फ छह भैरागिनी हैं, जो मंदिर से जुड़ी हैं, लेकिन और भी भैरागिनियां इस मार्ग पर जा सकती हैं। ये सिर्फ मंदिर की देखरेख या पूजा प्रक्रिया से जुड़ी हुई नहीं होंगी। दरअसल, ईशा के साथ अपनी प्रतिष्ठा यानी ब्रांड व छवि की भी समस्या है। हम नहीं चाहते कि बहुत ज्यादा लोग लाल परिधानों में आश्रम में नजर आएं। हम ऐसा इसलिए नहीं कर रहे कि लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे, बल्कि हम हम जो कुछ कर रहे हैं, उसकी प्रभावशीलता के लिए हमारी छवि बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि कई मायनों में हम अब वो समय पार कर चुके है, जब दुनिया में अपनी छवि को लेकर हमें चिंता होती थी या होनी चाहिए थी। आने वाले एक से दो सालों में और ज्यादा लोग इस मार्ग पर जा सकते हैं। अगर आप खुद को पूरी तरह से समर्पित कर सकते हैं, तो यह एक बेहद सुंदर मार्ग है। हां, अगर इस पर अपनी तर्क बुद्धि से विश्लेषण करेंगे तो आप पागल हो सकते हैं। लेकिन आपने अगर खुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया तो आप सुंदर व आनंदमय अवस्था में होंगे।

तो आप में से ऐसे लोग जिन्हें अपने ऊपर गर्व है कि उनके पास एक बड़ा सा दिल है, लेकिन दिमाग नहीं, उनके लिए यह मार्ग बेहद अच्छा है। या फिर आपका दिमाग इतना सूक्ष्म हो, जो श्वेत व श्याम और सही-गलत के बुनियादी तर्कों से परे जा सके, अगर आपकी समझ इन तर्काें व भेदों से अलग निकल कर जिंदगी को उसके वास्तविक रूप में देख सके तो निस्संदेह यह एक बेदह सुंदर मार्ग है। इसके लिए सूक्ष्म बुद्धि या समझ चाहिए, ताकि आप से परे जाकर देख सकें, वर्ना तर्क आपको समझाएंगे कि यह ठीक है और यह ठीक नहीं, यही स्वीकार्य है और यह अस्वीकार्य। देवी स्वीकार्य और अस्वीकार्य दोनों को अपने-आप में समाए हुए है, और अगर आप खुद को भैरागिनी के रूप में या जैसे आप हैं वैसे, पूरी समर्पित कर देते हैं तो देवी अपने आप में ऊर्जा का एक बिलकुल अलग आयाम हैं। जबकि ध्यानलिंग ऐसा नहीं है। वह हर दिन एक जैसा है, पूरी तरह से विश्वसनीय। लेकिन देवी तो पूरी तरह अपने ही तरीके से काम करती हैं। मैं उनके मंदिर के पिछवाड़े में ही रहता हूं, इसलिए मुझे पता है।

भैरागिनी के मार्ग पर चलने का मतलब है कि आपने देवी का रंग ले लिया यानी आप देवी के रंग में रंग गए। ये रंग सिर्फ आपके परिधानों पर ही न आए, बल्कि हर तरह से आप पर चढ़ जाए। आपके खून का रंग तो लाल है ही, आपका मन भी लाल हो जाना चाहिए, आपके भीतर की हर चीज लाल रंग में रंग जानी चाहिए। आपको अपने भीतर ‘मैं’ का कोई भी अंश नहीं रखना होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस तरह मेरा ‘मैं’ को खोना जरूरी है। अगर आप जीवन में कुछ महत्वपूर्ण पाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको खुद को खोना जरूरी है। इसके अलावा कोई और रास्ता है ही नहीं। अगर आप अपनी इस तुच्छ पहचान ‘मैं’ को यानी आप जो हैं, उसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं तो आपको पहचान मुबारक हो। लेकिन ऐसे में विश्वास कीजिए कि आपके अंतिम दिनों तक आपके जीवन की ये तमाम समस्याएं व मुद्दे ऐसे ही अंतहीन चलते रहेंगे।

मैं चाहता हूं कि आप अपने जीवन में पीछे मुड़कर जरा अपने सफर पर नजर डालें। हो सकता है कि आप कुछ अलग हालात में हों, लेकिन आपके जीवन की समस्याएं और संघर्ष एक से रहे होंगे, आपके दिमागी परिदृश्य में आपकी समस्याएं एक सी रही होंगी। हो सकता है कि इस दौरान माहौल बदला हो, उनका स्वरूप या विषयवस्तु बदली हो, लेकिन उनकी बुनयिादी चीजें जरा भी नहीं बदली होंगी। मेरा यकीन कीजिए कि बहुत सारे लोग इसी तरह मर जाते हैं।
एक बार की बात है। अपने एक जन्म में शंकरन पिल्लई अपनी मृत्यु शैया पर था। वह कभी बेहोश हो जाता तो कभी होश में आ जाता, जैसे कि नींद से जाग रहा हो और फिर सो रहा हो। इस बीच वह एक बार जब थोड़ा होश में आया तो उसने अपनी पत्नी से पूछा- ‘हमारा बड़ा बेटा रामू कहां है?’ बड़े बेटे ने तुरंत पास आते हुए जवाब दिया, ‘पिताजी आप चिंता न करें।

राग का अर्थ है – रंग। एक तरह से ‘भैरागिनी’ का अर्थ हुआ, जो देवी के रंग में रंगी हो। जबकि ब्रम्हचर्य का मतलब वैराग्य से है, जिसका मतलब ‘रंगहीन’ होना है। हालाँकि रंगहीन को एक नकारात्मक संकेत माना जाता है, लेकिन इसका एक मतलब ‘पारदर्शी होने’ से भी है।
मैं आपके पास यही हूं।’ इतना सुनकर वह फिर बेहोशी की नींद में डूब गया। कुछ देर बार उसे होश आया तो उसने अपनी पत्नी से फिर पूछा- ‘हमारा दूसरा बेटा बीमू कहां है?’ बीमू ने कहा, ‘पिताजी मैं आपके पास हूं। मैं कहीं नहीं जाउंगा। आपके पास ही रहूंगा।’ उसके बाद शंकरन फिर से बेहोशी की नींद में डूब गया। काफी देर बार जब उसे होश आया तो उसने पत्नी से फिर पूछा- ‘हमारा तीसरा बेटा सोमू कहां है?’ सोमू ने कहा, ‘ पिताजी मैं आपके बिलुकल नजदीक आपके पैरों के पास हूं।’ यह सुनकर शंकरन ने अपनी पत्नी की ओर देखा ओर बोला, ‘अगर सब यहीं हैं तो फिर अपनी दुकान पर कौन गया है?’ तो जिदंगी इसी तरह से गुजर जाएगी।

अपनी पेट की भूख शांत करने और बच्चे पैदा करने में ही इंसान की पूरी जिंदगी निकल जाती है। आप इस जीवन को महिमामंडित कर सकते हैं, इसे लेकर रुमानियत भरी कल्पना कर सकते हैं, लेकिन समझने की कोशिश कीजिए कि यह ऐसे ही गुजर जाएगी। मैं इस बात को बार-बार नहीं दुहराउंगा। मैं इसे पहले भी कई बात बता चुका हूं। आपमें से जिसके पास सक्रिय ओर तेज दिमाग है, वे लोग अपने दिमाग को किसी चीज में लगाएं। मैं अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर बता रहा हूं कि जीवन के प्रति जिज्ञासा को लेकर जितनी खोज और संघर्ष मैंने की है, वो चीज आपको बड़ी आसानी से हासिल हो रही है।
इसलिए अगर आप भैरागिनी बनना चाहते हैं तो यह अस्तित्व में होने का एक सुन्दर तरीका है। ईशा में बाकी चीजों की तरह ही भैरागिनियों पर भी अब तक मैंने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। अब मुझे अपनी यात्राओं को बंद करने के बारे में सोचना होगा, तभी ये चीजें साकार होंगी। तब शायद आप हैरान होना शुरू कर दें, कि सद्‌गुरु यात्रा पर कब जा रहे हैं?

 

प्रेम व प्रसाद,

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