भगवान राम से जब न्याय मांगने आया एक कुत्ता!

भगवान राम
भगवान राम

भारत में राम राज्य को सबसे न्यायपूर्ण व्यवस्था माना जाता है। राम और सीता की कहानी तो भारत में सबने सुनी है जिसमे राम सीता को रावन से बचाते हैं लंका पर आक्रमण करके। पूरी रामायन यही तो है। लेकिन वानर सेना और हनुमान जी से मिलने से पहले, यहाँ तक की अयोध्या से वनवास लेने से पहले श्री राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ जनता को न्याय देते थे। जानें भगवान राम राज्य से जुडी एक रोचक घटना के बारे में जो राम और रावण युद्ध से पहले, राम चरित मानस से पहले की है…

राम के न्याय की अनोखी कहानी

Sadhguru सद्‌गुरु: पुराणों में राम के बारे में एक बहुत ही सुंदर कहानी है। प्राचीन काल में इस देश के उत्तरी भाग में एक बहुत प्रसिद्ध मठ था जिसे कालिंजर के नाम से जाना जाता था। कालिंजर मठ उस समय का एक प्रसिद्ध मठ था। यह रामायण काल से पहले की बात है। रामायण का मतलब है, लगभग 5000 साल पहले। राम के आने से पहले भी कालिंजर मठ का खूब नाम था। राम को बहुत न्यायप्रिय और कल्याणकारी राजा माना जाता था। वह हर दिन दरबार में बैठकर लोगों की समस्याएं हल की कोशिश करते थे। एक दिन शाम को, जब दिन ढल रहा था, उन्हें दरबार की कार्यवाही समेटनी थी। जब वह सभी लोगों की समस्याएं सुन चुके थे, तो उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण, जो उनके परम भक्त थे, से बाहर जाकर देखने को कहा कि कोई और तो इंतजार नहीं कर रहा। लक्ष्मण ने बाहर जाकर चारो ओर देखा और वापस आकर बोले, ‘कोई नहीं है। आज का हमारा काम अब खत्म हो गया है।’ राम बोले, ‘जाकर देखो, कोई हो सकता है।’ यह थोड़ी अजीब बात थी, लक्ष्मण अभी-अभी बाहर से देख कर आ चुके थे, मगर वह फिर से जाकर देखने के लिए कह रहे हैं। इसलिए लक्ष्मण फिर से गए और चारो ओर देखा, वहां कोई नहीं था।

वह अंदर आने ही वाले थे, तभी उनकी नजर एक कुत्ते पर पड़ी जो बहुत उदास चेहरा लिए बैठा था और उसके सिर पर एक चोट थी। तब उन्होंने कुत्ते को देखा और उससे पूछा, ‘क्या तुम किसी चीज का इंतजार कर रहे हो?’ कुत्ता बोलने लगा, ‘हां, मैं राम से न्याय चाहता हूं।’ तो लक्ष्मण बोले, ‘तुम अंदर आ जाओ’ और वह उसे दरबार में ले गए। कुत्ते ने आकर राम को प्रणाम किया और बोलने लगा। वह बोला, ‘हे राम, मैं न्याय चाहता हूं। मेरे साथ बेवजह हिंसा की गई है। मैं चुपचाप बैठा हुआ था, सर्वथासिद्ध नाम का यह व्यक्ति आया और बिना किसी वजह के मेरे सिर पर छड़ी से वार किया। मैं तो बस चुपचाप बैठा हुआ था। मैं न्याय चाहता हूं।’ राम ने तत्काल सर्वथासिद्ध को बुलवा भेजा जो एक भिखारी था। उसे दरबार में लाया गया। राम ने पूछा, ‘तुम्हारी कहानी क्या है? यह कुत्ता कहता है कि तुमने बिना वजह उसे मारा।’ सर्वथासिद्ध बोला, ‘हां, मैं इस कुत्ते का अपराधी हूं। मैं भूख से बौखला रहा था, मैं गुस्से में था, निराश था। यह कुत्ता मेरे रास्ते में बैठा हुआ था इसलिए मैंने बेवजह निराशा और गुस्से में इस कुत्ते के सिर पर मार दिया। आप मुझे जो भी सजा देना चाहें, दे सकते हैं।’

फिर राम ने यह बात अपने मंत्रियों और दरबारियों के सामने रखी और बोले, ‘आप लोग इस भिखारी के लिए क्या सजा चाहते हैं?’ उन सब ने इस बारे में सोचकर कहा, ‘एक मिनट रुकिए, यह बहुत ही पेचीदा मामला है। पहले तो इस मामले में एक इंसान और एक कुत्ता शामिल हैं, इसलिए हम सामान्य तौर पर जिन कानूनों को जानते हैं, वे इस पर लागू नहीं होंगे। इसलिए राजा होने के नाते यह आपका अधिकार है कि आप फैसला सुनाएं।’ फिर राम ने कुत्ते से पूछा, ‘तुम क्या कहते हो, क्या तुम्हारे पास कोई सुझाव है?’ कुत्ता बोला, ‘हां, मेरे पास इस व्यक्ति के लिए एक उपयुक्त सजा है।’ ‘वह क्या, बताओ?’ तो कुत्ता बोला, ‘इसे कालिंजर मठ का मुख्य महंत बना दीजिए।’ राम ने कहा, ‘तथास्तु।’ और भिखारी को प्रसिद्ध कालिंजर मठ का मुख्य महंत बना दिया गया। राम ने उसे एक हाथी दिया, भिखारी इस सजा से बहुत प्रसन्न होते हुए हाथी पर चढ़कर खुशी-खुशी मठ चला गया।

दरबारियों ने कहा, ‘यह कैसा फैसला है? क्या यह कोई सजा है? वह आदमी तो बहुत खुश है।’ फिर राम ने कुत्ते से पूछा, ‘क्यों नहीं तुम ही इसका मतलब बताते?’ कुत्ते ने कहा, ‘पूर्वजन्म में मैं कालिंजर मठ का मुख्य महंत था और मैं वहां इसलिए गया था क्योंकि मैं अपने आध्यात्मिक कल्याण और उस मठ के लिए सच्चे दिल से समर्पित था, जिसकी बहुत से दूसरे लोगों के आध्यात्मिक कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका थी। मैं वहां खुद के और हर किसी के आध्यात्मिक कल्याण के संकल्प के साथ वहां गया और मैंने इसकी कोशिश भी की। मैंने अपनी पूरी कोशिश की। मगर जैसे-जैसे दिन बीते, धीरे-धीरे दूसरे छिटपुट विचारों ने मुझे प्रभावित करना शुरू कर दिया। मुख्य महंत के पद के साथ आने वाले नाम और ख्याति ने कहीं न कहीं मुझ पर असर डालना शुरू कर दिया। कई बार मैं नहीं, मेरा अहं काम करता था। कई बार मैं लोगों की सामान्य स्वीकृति का आनंद उठाने लगता था। लोगों ने मुझे एक धर्मगुरु की तरह देखना शुरू कर दिया। अपने अंदर मैं जानता था कि मैं धर्मगुरु नहीं हूं मगर मैंने किसी धर्मगुरु की तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया और उन सुविधाओं की मांग करना शुरू कर दिया, जो आम तौर किसी धर्मगुरु को मिलनी चाहिए। मैंने अपने संपूर्ण रूपांतरण की कोशिश नहीं की मगर उसका दिखावा करना शुरू कर दिया और लोगों ने भी मेरा समर्थन किया। ऐसी चीजें होती रहीं और धीरे-धीरे अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिए मेरी प्रतिबद्धता घटने लगी और मेरे आस-पास के लोग भी कम होने लगे। कई बार मैंने खुद को वापस लाने की कोशिश की मगर अपने आस-पास जबर्दस्त स्वीकृति को देखते हुए मैं कहीं खुद को खो बैठा। इस भिखारी सर्वथासिद्ध में गुस्सा है, अहं है, वह कुंठित भी है, इसलिए मैं जानता हूं कि वह भी खुद को वैसा ही दंड देगा, जैसा मैंने दिया था। इसलिए यह उसके लिए सबसे अच्छी सजा है, उसे कालिंजर मठ का मुख्य महंत बनने दीजिए।’

Bhagwan Ram

Ram Laxman and Sita

 

राम

तिथि निर्धारित करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार राम का जन्म 5016 ईसापूर्व हुआ था, जो करीब-करीब 7,000 वर्ष से थोड़ा ज्यादा है। सात हजार साल पहले जब दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में शासक बर्बर हुआ करते थे, राम ने एक राजा के रूप में मानवता, त्याग और न्याय की अद्भुत भावना दिखाई। उनका राज्याभिषेक बहुत कम उम्र में ही हो गया था मगर कुछ सरल परिस्थितियों के कारण उन्होंने राजगद्दी छोड़ दी। ऐसी छोटी-मोटी परिस्थिति को ज्यादातर लोग अनदेखा कर देते मगर राम उसे अनदेखा नहीं कर सकते थे क्योंकि उनके अंदर न्याय की भावना बहुत प्रबल थी। इसलिए उन्होंने राजा का पद छोड़ दिया और अपनी पत्नी तथा एक भाई के साथ राज्य छोड़ कर चले गए। वे उनका साथ नहीं छोड़ना चाहते थे और उनके पीछे-पीछे चल दिए। तीनों जंगल में सत्ता, सुख-सुविधाओं के बिना और गुमनामी में रहे, बहुत सी मुसीबतें झेलीं, राम ने अपनी प्रिय पत्नी को खोने की हृदयविदारक स्थिति का सामना किया जिसे कोई दूसरा पुरुष उठा कर ले गया था। उन्हें एक युद्ध लड़ना पड़ा और उनके जीवन में बहुत सी दूसरी दुर्भाग्यूपर्ण घटनाएं हुईं। मगर इन घटनाओं के दौरान भी उन्होंने न्याय और नि:स्वार्थ भावना दिखाई और किसी स्थिति में सबसे बदतर चीजों के लिए खुद तैयार रहे।

राम राज्य

भारत में राम राज्य को एक न्यायपूर्ण राज्य व्यवस्था के पर्याय के रूप में जाना जाता है। यही इस देश की सुंदरता, संयम और अनोखी प्रकृति है। सारी अव्यवस्था, भ्रम और भ्रष्टाचार की स्थिति के बीच से अचानक कोई बढ़िया उदाहरण सामने आकर हर किसी को चकित कर देता है। भारत के तौर तरीके हमेशा से ऐसे ही रहे हैं। जब हर किसी को लगता है कि यह संस्कृति नष्ट हो गई, हर सीमा से परे भ्रष्ट हो गई, तो अचानक कोई बहुत बढ़िया उदाहरण आपके सामने आ खड़ा होगा जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा, ‘हां अभी एक उम्मीद है।’ ऐसा अक्सर होता रहता है क्योंकि अव्यवस्था में हम सबसे बढ़िया काम करते हैं। जब बहुत ज्यादा व्यवस्था होती है, तो हमें समझ नहीं आता कि कैसे काम करें। भारतीयों का व्यवस्था में बहुत दम घुटता है, उन्हें थोड़ी अव्यवस्था चाहिए होती है। मैं जानता हूं कि पश्चिमी लोगों के लिए यह कुछ ज्यादा अव्यवस्था है, मगर यह बस थोड़ी सी ही है, ठीक है? क्या थोड़ा है और क्या ज्यादा, इसका मानदंड हर देश के लिए अलग-अलग होता है। भारतीय मानदंडों से यह बस जरा सी अव्यवस्था है और उसके बिना वे सहज महसूस नहीं करते, उन्हें इसकी जरूरत होती है। उन्हें यहां एक-दूसरे से थोड़ा टकराने की जरूरत पड़ती है, वरना उन्हें एक-दूसरे की कमी महसूस होती है।

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  • http://facebook.com/siddharth.vash Siddharth Vashishtha

    Nice story.

    But in puranas it is written that Ram was born in Tretayuga, which is 1,296,000 years. Then how can He be just 7000 years old? After that, we had dvapara yuga which is 864,000 years in duration. Kaliyuga itself is of 432,000 years. Please make me clear about this confusion.

    • Jitesh Verma

      That’s correct.
      It’s impossible for Lord Ram to be just 7000 years old.
      Historically,this age belongs to Mesolithic age or Middle stone age.
      No civilization was yet in site then

  • Gajraj Singh

    Wish you the very very auspicious (Puthandu, Tamil) Hindu New Year-2016! Nithyanandam! jGD!! jMD!!! https://youtu.be/srtuIN-aNXM