अमेरिका से वापसी

सद्गुरु आई. आई. आई. में

इस बार का स्पाॅट सद्‌गुरु अमेरिका से मुंबई लौटते हुए हवाई जहाज से लिख रहे हैं जिसमें वो बता रहे हैं अमेरिका के लोगों की हालत और चिंता व्यक्त कर रहे हैं उन तथाकथित सफल और संपन्न लोगों की हालत पर जो सब कुछ हासिल करने के बाद भी दुखी और परेशान हैं।

तकरीबन सात हफ्ते तक उस अमेरिका में रहने के बाद, जिसे इस धरती का सबसे महान देश माना जाता है, मेरे भीतर गहन रूप से यह विचार चल रहा है कि आखिर एक आदर्श दुनिया क्या होगी। ऐसा नहीं है कि मेरे मन में कोई आदर्श राज्य की अपनी परिकल्पना नहीं है। वह आदर्श व्यवस्था होगी जिसमें आध्यात्मिकता के साथ भौतिक-सामाजिकता का सुंदर मिश्रण होगा।

‘भौतिक-सामाजिकता’ से मतलब समाज और उसकी भौतिक सुख-सुविधाओं के साधनों से है।

अगर इस पर गौर किया जाए कि अमीरी और संपन्नता को हासिल करने के लिए कोई व्यक्ति या समुदाय क्या कीमत चुकाता है, तो यह तस्वीर जो अमीर और संपन्न लोगों की उभर कर सामने आ रही है, सुन्दर नहीं कही जा सकती।
भौतिक-सामाजिकता एक ऐसा पहलू है जो लगातार विकास की प्रक्रिया से गुजर रहा है, इसलिए इसमें परफेक्शन यानी निपुणता जैसी चीज की संभावना तो नहीं है, लेकिन इसकी दिशा हमेशा ज्यादा से ज्यादा लोगों के कल्याण की ओर होनी चाहिए। अमेरिका के रईस और प्रभावशाली लोगों को काफी नजदीक से देखने के बाद मुझे लगता है, कि इस दिशा में बहुत जल्दी कुछ किए जाने की जरूरत है। वो लोग, जिनके पास वो सब है जिसे हासिल करना एक बहुत बड़ी आबादी का सपना है, आज बहुत अच्छी हालत में नहीं हैं। बल्कि वो लोग दुख व निराशा की ऐसी स्थिति से गुजर रहे हैं, जो उनकी कोशिशों व उपलब्धियों के तो बिल्कुल अनुरूप नहीं है।
अगर इस पर गौर किया जाए कि अमीरी और संपन्नता को हासिल करने के लिए कोई व्यक्ति या समुदाय क्या कीमत चुकाता है, तो यह तस्वीर जो अमीर और संपन्न लोगों की उभर कर सामने आ रही है, सुन्दर नहीं कही जा सकती। अगर आर्थिक व भौतिक उपलब्धियों के साथ आध्यात्मिक कृपा हासिल नहीं हो तो सब कुछ व्यर्थ हो जाएगा।
शांति और खुशी न तो पहाड़ों की खामोशी में मिलती है और न ही बाजार के शोरशराबे में। ये केवल उन्हीं को मिलेगी, जिन्होंने अपने भीतर इसे ढूंढने की कोशिश की है।
और यह बर्बादी सिर्फ इंसानी जिंदगियों की ही नहीं होती, बल्कि इस धरती पर जीवन की रचना करने वाली सभी चीजों की होती है। स्वार्थ के वशीभूत सिर्फ अपनी भलाई की कोशिश में लगे रहने का ही नतीजा है कि आज हमारा पर्यावरण बर्बादी के इस कगार पर पहुँच गया है। हम भले ही इस धरती का सीना चीर दें, लेकिन उससे इंसान की भलाई नहीं होगी, क्योंकि यह उसके भीतरी आयाम से जुड़ा हुआ है। शांति और खुशी न तो पहाड़ों की खामोशी में मिलती है और न ही बाजार के शोरशराबे में। ये केवल उन्हीं को मिलेगी, जिन्होंने अपने भीतर इसे ढूंढने की कोशिश की है।
पिछले कुछ हफ्तों में तमाम तरह की गतिविधियों की वजह से अमेरिका के एक कोने से दूसरे के कोने के बीच भागदौड़ होती रही। विश्व शांति दिवस के मौके पर यूनाइटेड नेशंस में बोलने से लेकर पहली बार बाकायदा गोल्फ टूर्नामेंट खेलना तक इनमें शामिल था। यह टूर्नामेंट राॅबर्ट कैनेडी की 25 साल याद में आयोजित किया गया था। फिस्टी एथल कैनेडी और बाकी कैनेडी परिवार ने शानदार मेजबानी की।
मैं फिलहाल अपने ही यहां की एयरलाइंस एयर इंडिया की फ्लाइट से मुंबई के रास्ते में हूं। अगले 14 घंटों में मैं भारत पहुँच जाऊंगा। राइट बंधुओं का शुक्रिया।


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