अग्नि तत्व – कैसे मदद करता है आध्यात्मिक विकास में?

अग्नि तत्व - कैसे मदद करता है आध्यात्मिक विकास में?

सद्‌गुरुजिन पांच तत्वों से हमारा शरीर बना है, उनमें से अग्नि तत्व सबसे कम मात्रा में मौजूद है। सबसे कम होने के बाद भी ये हमारे जीवन में कई सारी चीज़ें तय करता है। अग्नि अलग-अलग प्रकार की होती है। जानते हैं भूख और प्रजनन से जुड़ी जठराग्नि, मन और बुद्धि से जुड़ी चित्ताग्नी, तत्वों से जुड़ी भूताग्नी, और परम-तत्व शून्य से जुड़ी सर्वाग्नी के बारे में।

किसी भी समाज में अग्नि शब्द का सिर्फ उच्चरण ही खासा रोमांच पैदा कर देता है। आमतौर पर अग्नि को एक खतरे के तौर पर देखा जाता है। यह एक खतरा है भी, अगर इसे ठीक तरह से नहीं संभाला जाए। आइए हम अग्नि तत्व के विभिन्न आयामों, उसके स्वरूपों, उसको संचालित करने के तरीकों और सबसे महत्वपूर्ण बात कि उस पर महारत हासिल करने के तरीकों के बारे में बात करते हैं।

अग्नि ही जीवन को चलाती है

हालांकि मानव शरीर की संरचना के लिए महत्वपूर्ण पांच तत्वों में अग्नि का अनुपात सबसे कम है, लेकिन इसका प्रभाव जबरदस्त है। कई रूपों में अग्नि जीवन का प्रतिनिधित्व करती है। आप जीवित हैं या नहीं, इसका एक बड़ा संकेत इससे मिलता है कि आप के भीतर अग्नि काम कर रही है या नहीं, यानी आपका शरीर गर्म है या फिर ठंडा पड़ गया है। इस धरती पर जीवन पूरी तरह से सूर्य से शक्ति पाकर संचालित होता है। जैसा कि आप जानते हैं कि सूर्य आग का एक बड़ा गोला है, जो धरती पर जीवन को ऊर्जा देता है।

लेकिन हम जिस हवा में सांस लेते हैं, उसे अलग नहीं किया जा सकता। इसका लगातार आदान-प्रदान चलता रहता है। हमारा अग्नि तत्व कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर साझा होता है। आकाश तत्व पूरी तरह साझा होता है। हम सभी एक ही आकाश में हैं।
कोई भी मशीन जब काम करती है तो यकीनन उष्मा या गर्मी पैदा करती है, क्योंकि अग्नि ही बुनियादी रूप से ईंधन है। आप चाहें इसे बिजली कह लीजिए या फिर पेट्रोल, लकड़ी, कोयला या चाहे जो कह लीजिए, लेकिन मूल रूप से यह अग्नि ही है, जो आपके शरीर सहित हर मशीन को चलाती है।

भारतीय संस्कृति में आग का मानवीकरण कर अग्नि देवता के रूप में देखा जाता है, जो दो मुंह वाले देवता हैं और क्रुद्ध भेड़ पर सवार रहते हैं। अग्नि देवता का दो मुंह इस बात का प्रतीक है कि अग्नि जीवन-दाता और जीवन भक्षक दोनों है। जब तक भीतर अग्नि है, तब तक हम जीवित हैं। लेकिन अगर आपने इस अग्नि की ठीक ढंग से नहीं संभाला तो यह जल्दी ही आपके नियंत्रण से बाहर होकर हर चीज को भस्म कर देगी। जब यह हमारे शरीर को जलाती है तो इसे दाह-संस्कार कहते हैं। आग के एक रूप का इस्तेमाल हम खाना पकाने के लिए करते हैं, ताकि हम भोजन को खा सकें। अगर भोजन को पकाया न जाए तो खाना स्वादिष्ट व खाने योग्य नहीं होगा।

हमारे भीतर मौजूद तीन प्रकार की अग्नि

हमारे भीतर और बाहर आग के कई आयाम और रूप हैं। पहले अपने भीतर जलने वाली अग्नि के तीन रूपों को जानते हैं।

जठराग्नि – भूख और प्रजनन की अग्नि

पहली अग्नि होती है – जठराग्नि। जठर का मतलब हुआ पेट या पाचन प्रक्रिया। आपके पेट में अगर थोड़ी भी अग्नि नहीं होगी तो आप जो खाना खाते हैं, उसे पचा नहीं पाएंगे। भोजन उस ईंधन के तौर पर काम करता है, जिसके जलने या कहें पाचन से आपको ऊर्जा मिलती है, जिसकी आपको जरूरत होती है। अगर आपकी जठराग्नि को अच्छे से ईंधन मिल रहा है, यह अच्छी तरह से पोषित है तो यह प्रजनन अग्नि भी बन जाती है। पाचन और प्रजनन दोनों ही जठराग्नि पर निर्भर करते हैं।

चित्ताग्नी – बुद्धि की अग्नि

हमारे भीतर मौजूद दूसरी आग चित्ताग्नि कहलाती है। यह मन और उससे परे का आयाम है। चित्त आपके भीतर मौजूद प्रज्ञा यानी बुद्धि का वो आयाम है, जो आपके भौतिक रूप से परे होता है। आपका शारीरिक स्वरूप आपके अनुवांशिक और कार्मिक याद्याश्त की देन है। इससे विपरीत चित्त प्रज्ञा का वह आयाम है, जो याद्याश्त से प्रभावित नहीं होता। प्रज्ञा की अग्नि कई स्तरों पर सामने आती है, इसका पहला स्तर बुद्धिमान होना है।

आमतौर पर जो योगी जीवन की प्रक्रिया तक पहुंचना चाहता है, उसकी दिलचस्पी जठराग्नि, चित्ताग्नि या भूताग्नि में नहीं होगी। उसका पूरा ध्यान सिर्फ सर्वाग्नि पर होगा, क्योंकि यह एक परम अग्नि है, लेकिन यह एक शीतल अग्नि है।
आपके भीतर मौजूद अग्नि के कई रूपों पर गौर करें तो अगर आपकी जठराग्नि अच्छा काम कर रही है तो आपकी प्रजनन अग्नि भी अच्छा काम करेगी। अगर आप अच्छी तरह से खाएंगे-पिएंगे नहीं, तो आपकी प्रजनन प्रवृत्ति भी काम नहीं करेगी। इसी तरह से अगर आपकी चित्ताग्नि अच्छी तरह से प्रज्ज्वलित नहीं होगी तो आपकी बुद्धि भी कमजोर व प्रभावहीन होगी। आपकी चित्ताग्नि अच्छी तरह से काम कर रही होगी तो यह आपकी बुद्धिमानी के तौर पर सामने आएगी, भले ही आप बुद्धि के दूसरे आयामों तक सचेतन रूप से पहुँच पाने की स्थिति में न हों।

अगर आपकी चित्ताग्नि प्रखरता से काम कर रही है तो आपकी रुचि भोजन, कामवासना, सेक्स व शरीर की दूसरी चीजों में से हटने लगेगी। इस संदर्भ में सबसे ज्यादा दुर्भाग्य की बात है यह है, कि जिसे त्याग या संन्यास की तरह प्रचारित किया गया है, वह वास्तव में ज्ञान की तरफ बढ़ने के रूप में देखा जाना चाहिए।

भूताग्नी – तत्वों की अग्नि

इंसान में मौजूद अगली अग्नि भूताग्नि है जो तत्वगत अग्नि है। अगर आपके भीतर भूताग्नि अच्छी तरह से काम कर रही है तो फिर आपके शरीर और मन का नाटक आपके लिए खास मायने नहीं रखेगा। आपकी दिलचस्पी शरीर व मन की हरकतों से हटकर सृष्टि के बुनियादी पहलू यानी जीवन के स्रोत की तरफ जाने लगेगी।

देखिए, अगर आप जठराग्नि पर नियंत्रण कर लेते हैं तो आप एक स्वस्थ और मजबूत शरीर के मालिक होंगे। अगर आप अपनी चित्ताग्नि पर नियंत्रण सीख लेते हैं तो आप अपने मन को कई तरीके से इस्तेमाल करना सीख लेंगे। अगर आपने भूताग्नि पर नियंत्रण सीख लिया तो आप जीवन प्रक्रिया पर महारत हासिल कर लेंगे।

शरीर की सीमा बहुत ही स्पष्ट और सीमित है। जबकि मन की सीमा काफी बड़ी है। उदाहरण के लिए अगर आप दुनिया के किसी और कोने के बारे में जानते हैं तो यह आपके मन की सीमा में आ जाएगा। जैसे-जैसे आपकी जानकारी बढ़ती है, आपकी मानसिक सीमाएं भी विस्तृत होती जाती हैं। लेकिन अगर आप भूताग्नि के आयामों के प्रति चेतन हो जाएंगे तो आप एक अनंत या सीमाविहीन अस्तित्व हो उठेंगे, क्योंकि तत्वों का खेल पूरी सृष्टि में हर तरफ हो रहा है।

इन तीनों से परे की अग्नि – सर्वाग्नी

इससे भी परे एक चीज होती है, जिसे सर्वाग्नि कहते हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इस सृष्टि का पांच फीसदी से भी कम हिस्सा भौतिक अस्तित्व है। इसका मतलब यह है कि अगर आप पूरी भौतिक रचना को जान भी गए तो आप सृष्टि का सिर्फ पांच प्रतिशत ही जान पाएंगे। सर्वाग्नि उस आयाम को स्पर्श करती है, जहां कोई तत्व नहीं होता, जहां कोई ऐसी सृष्टि नहीं होती जिसे हम जानते हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो जहां कोई भौतिक प्रकृति नहीं होती।

आमतौर पर जो योगी जीवन की प्रक्रिया तक पहुंचना चाहता है, उसकी दिलचस्पी जठराग्नि, चित्ताग्नि या भूताग्नि में नहीं होगी। उसका पूरा ध्यान सिर्फ सर्वाग्नि पर होगा, क्योंकि यह एक परम अग्नि है, लेकिन यह एक शीतल अग्नि है। जठराग्नि अग्नि का एक प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप है। चित्ताग्नि अपेक्षाकृत कम स्पष्ट है, लेकिन फिर भी वह मौजूद है। भूताग्नि उस तरह दिखाई या महसूस नहीं होती, फिर भी वह मौजूद होती है। जबकि सर्वाग्नि बड़ी मुश्किल से ही महसूस होती है, लेकिन इसके बिना कुछ नही होता। यह बुनियादी और परम अग्नि होती है, जिसमें सभी अग्नियां शामिल होती हैं।

आकाश तत्व के सबसे पास है अग्नि तत्व

अग्नि वो तत्व है, जो आकाश या ईथर के सबसे पास होता है। जहां अग्नि होती है, खासकर जहां विशेष तरह के ईंधन इस्तेमाल किए जाएं तो वहां आकाशिक आयाम तक पहुंचना ज्यादा आसान होता है। दक्षिण भारत में हम दिए में घी या तिल के तेल का इस्तेमाल करते हैं। अगर ये दोनों नहीं हैं तो मूंगफली का तेल इस्तेमाल करते हैं और अगर वह भी नहीं है तो नारियल का तेल। तेल से जलने वाली अग्नि में खास तरह के गुण होते हैं। इनमें दूसरे ईंधनों की अपेक्षा धुएं का बिंदु ज्यादा ऊंचा होता है। इसलिए अगर आप इनकी लौ का किनारा देखें – आपको लौ के बीच में नहीं देखना चाहिए – तो इसमें आपको आकाशीय आयाम ज्यादा मिलेगा।

क्या है घी या तेल का दिया जलाने का महत्व?

जब भी आप एक अनुकूल माहौल बनाना चाहते हैं तो सबसे पहली चीज आप घर में तेल या घी का दिया जलाएं। यह परंपरा भारतीय परिवार का एक अहम हिस्सा रहा है। अधिक लाभ के लिए दिए का ईधन विशेष तरह का होना चाहिए। मोमबत्तियों का, खासकर अगर वे रासायनिक मोम से बनी हों तो वैसा असर नहीं होता, जैसा दिए का होता है। बुनियादी रूप से आप एक ऐसे पदार्थ से आग जलाने की कोशिश कर रहे हैं, जो अपने आसपास एक खास तरह का आभामंडल तैयार करता है, जिससे आकाश तत्व को पाना आसान हो जाता है। तेल के एक दिए के जरिए आप अपने घर में एक आकाशिक क्षेत्र तैयार करते है, जिससे आपको और आपके घर में दूसरे लोगों को इसका लाभ मिल सके।

भारतीय संस्कृति में लोगों के जीवन में जितनी भी महत्वपूर्ण चीजें हैं, वे सब अग्नि के इर्द-गिर्द होती हैं। बिना अग्नि के न तो पूजा होती है, न शादी और न ही कोई अन्य महत्वपूर्ण आयोजन।
खासकर बच्चों, गर्भवती महिलाओं, रोगियों और सामान्य स्वास्थ्य के लिहाज से जरूरी है कि घर में तेल का जलता हुआ दिया रखें। यह अग्नि सिर्फ आपकी जठराग्नि को ही नहीं बढ़ाती, जो आपके स्वास्थ्य को बेहतर और शरीर को मजबूत बनाती है, बल्कि चित्ताग्नि को बेहतर बनाने और आकाश तत्व को सुगम बनाने में भी मददगार होती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि आपके भीतर प्रज्ञा की आग जलती रहे। अगर आपके भीतर सिर्फ भौतिक या शारीरिक आग ही जलेगी, प्रज्ञा की आंच नहीं होगी तो जीवन आपका दुखमय और भद्दा हो सकता है। जब लोगों में बहुत ज्यादा जठराग्नि होती है, और चित्ताग्नि पर्याप्त मात्रा में नहीं होती तो लोग अत्यंत मूर्खतापूर्ण हरकतें करते हैं।

भारतीय संस्कृति में लोगों के जीवन में जितनी भी महत्वपूर्ण चीजें हैं, वे सब अग्नि के इर्द-गिर्द होती हैं। बिना अग्नि के न तो पूजा होती है, न शादी और न ही कोई अन्य महत्वपूर्ण आयोजन। इस संस्कृति में अग्नि का इस्तेमाल कई अलग-अलग रूपों में होता रहा है, जिनमें यज्ञ की अग्नि जैसे होम व हवन भी शामिल हैं।

हम सभी एक आकाश में हैं

अग्नि आकाश को और सुगम बनाती है। हम जितने भी तत्वों से बने हैं, उनमें आकाश ही एक ऐसा तत्व है, जो सबसे ज्यादा पारदर्शी व तरल है। हमारे और आपके शरीर में जो भूमि तत्व है वह बुनियादी रूप से समान है, लेकिन अगर हम आपके और अपने शरीर में मौजूद चीजों के संदर्भ में बात करें तो यह साफ तौर से अलग हैं। हमारे और आपके भीतर मौजूद जल तत्व अलग-अलग हैं, आप कह सकते हैं कि यह दो अलग-अलग पात्रों में रखा हुआ है। लेकिन हम जिस हवा में सांस लेते हैं, उसे अलग नहीं किया जा सकता। इसका लगातार आदान-प्रदान चलता रहता है। हमारा अग्नि तत्व कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर साझा होता है। आकाश तत्व पूरी तरह साझा होता है। हम सभी एक ही आकाश में हैं। अगर आप किसी भी माहौल में आकाशिक तत्व को बढ़ा देते हैं तो वहां लोगों में एक खास तरह की नजदीकी या जुड़ाव होने लगता है। उसी तरह अग्नि के आस-पास घनिष्ठता और संवाद की संभावना कहीं ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि जहां भी अग्नि होती है वहां आकाश तत्व प्रबल हो जाता है।

ईश्वरत्व तक पहुँचने में मदद करता है अग्नि तत्व

हम कह सकते हैं, मात्रा के लिहाज से भले ही अग्नि आपके अस्तित्व का एक छोटा सा हिस्सा हो, लेकिन अपनी मौलिक प्रकृति के चलते यह काफी महत्वपूर्ण है। अग्नि को स्पर्श करने की आपकी क्षमता बेहद कम है। लेकिन साथ ही आग वो तत्व है, जिसके प्रति आप सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। आग संवाद स्थापति करने या संप्रेषण का एक जरिया भी है। इसके अलावा, अग्नि ग्रहणशीलता लाने, सीमाओं से परे जाने और उस आयाम को छूने का एक जरिया है, जिसे आप दैवीय, ईश्वर या इस सृष्टि का स्रोत, जो चाहे कह सकते हैं।

प्रेम व प्रसाद,

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