प्रबल इच्‍छा : यही पहला कदम है

क्या इच्छाओं को त्याग कर हम अध्यात्म में आगे बढ़ सकते हैं? इच्छाओं को त्यागकर हम पहला कदम भी नहीं उठा सकते, जानें कैसे इच्छा ही अध्यात्म की शुरुआत है…

(विडियो में हुआ संवाद )

प्रश्न : नमस्कारम सद्‌गुरु, तैयारी कैसे करें सद्‌गुरु?

सद्‌गुरु : तैयारी कैसे करें? देखिये जीवन के बहुत सारे पहलू हैं। सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है इच्छा। इच्छा का मतलब है एक गहरी आकांक्षा या लालसा। अगर इच्छा गहरी नहीं है, तो जैसे ही एक छोटी सी परेशानी आएगी आप बाहर का रास्ता ले लेंगे।

जब आप पहाड़ों पर चढ़ रहे होते हैं तो ऐसा आपके साथ होता है। इस बार हम – मुझे लगता है कि यह सब हर जगह लिखा जा चुका है, पर फि र भी’ – हम मनांग घाटी से होते हुए, थोर्लोंग ला पास – 18000 फीट से ज्यादा की ऊंचाई – पर गए, वहाँ की ढलानें 60 डिग्री पर स्थित हैं।

जीवन के हर क्षेत्र में लोगों ने मेहनत की है। यह लोगों की मेहनत का ही फल है कि आप आज बहुत सी चीज़ें का लाभ उठा रहे हैं – चाहे वो विज्ञान, तकनीक, भूगोल हो या फि र आध्यात्म।
जब आप चढऩा शुरू करते हैं तो आपका मन कहता है – ‘‘मनांग घाटी कितनी सुंदर है, यह सच में सुंदर है – क्या हमें वहाँ थोर्लोंग पास जाना जरुरी है? वहाँ सुनसान लग रहा है, बिलकुल भी हरियाली नहीं है, बस पत्थर ही हैं। यहां कितना अच्छा है – फूलों से भरी ये घाटी। जीवन में हमेशा आपके मन की यही चाल होती है। जो लोग इस चाल से परे चले जाते हैं, वे लोग जीवन में अलग आयामों का अनुभव कर पाते हैं। बाकी सभी बस नाश्ता करते हैं और सो जाते हैं। चाहे आप अध्यात्म से जुड़े हों, व्यापार से, संगीत या फिर कला से, हर जगह मन ये ही बात करता है। जब आप अपनी सीमाओं से परे जाने की सोचने लगते हैं तो मन कहता है – क्या यह वास्तव में जरुरी है? यहां सच में कितना अच्छा है, ऊपर पहाड़ तक जाने की जरुरत क्या है? यहां काफी अच्छा है। और फिर कोई फ़िलोसोफी गढ़ देगा – ‘‘बस इसी पल में रहने की जरुरत है, है न?’’ आपके आस पास कोई होगा और आप एक युवा पुरुष हैं और आस पास महिलाएं हैं तो ये सारी चीज़ें होंगी और आप कहीं और मुड़ जाएंगे।

तो सबसे पहला काम है एक इच्छा पैदा करना – मैं जानना चाहता हूँ, मैं जानना चाहता हूँ, मैं जानना चाहता हूँ, ये भीतर ही भीतर आपको झकझोर दे। अगर इच्छा आपको नहीं झकझोरेगी तो आपकी खोज आपको सीमाओं के परे नहीं ले जाएगी क्योंकि हर मनुष्य की सीमायें हैं, है न? क्या आप उनके पार चले जाएंगे या फिर आप उनके आगे घुटने टेक देंगे? ये ही सवाल है। ‘‘तो इससे फायदा क्या होगा, हमें क्या मिलेगा?’’ क्योंकि कुछ फिलोसोफर लोग कह रहे हैं कि न कुछ करना है और न कुछ पाना है। यह कोई उपलब्धि नहीं है। एक बहुत सुंदर विडियो है। अगर कोई उसे ढूंढ सके और हठ योग स्कूल में सभी को दिखा सके… इसमें बताया गया है कि एक पेड़ जंगल की जमीन के नीचे कितनी मेहनत करता है। जड़ें कितनी मेहनत करके पोषण पाती हैं और एक फ ूल या फि र फ ल पैदा करती हैं। किसी ने इसका विडियो बनाया है। मुझे पता नहीं कि कितने समय तक उन्होंने इसका विडियो बनाया पर अब वे इसे तेज़ गति से चलाते हैं और आप देख सकते हैं कि बस जीवित रहने और विकास करने के लिए जड़ें क्या क्या करती हैं।

तो, यह मेहनत और जीवन में कुछ ज्यादा बनने की चाहत किसी शिक्षा की वजह से नहीं आई है – यही जीवन के प्रकृति है। जीवन के हर क्षेत्र में लोगों ने मेहनत की है। यह लोगों की मेहनत का ही फल है कि आप आज बहुत सी चीज़ें का लाभ उठा रहे हैं – चाहे वो विज्ञान, तकनीक, भूगोल हो या फिर आध्यात्म। वरना कोई एक छोटा सा चैनल भिज पार नहीं कर पाता – महासागरों को तो छोड़ ही दें। बहुत लोगों की इसमें जान चली गयी। बहुत से इन चीज़ों को करते हुए मारे गए। कुछ लोग सफ ल हुए। उन कुछ लोगों के कारण आज इस धरती पर कई चीज़ें हुई हैं। अगर वे कुछ लोग नहीं होते तो हम लोगों में मनुष्यों जैसी कोई बात नहीं होती, है न?

तो, अध्यात्म में भी यही लागू होता है। क्या यह मुश्किल है? नहीं यह मुश्किल नहीं है पर अगर आप भीतर से सख्त हैं, तो यह मुश्किल है। कठोरता आध्यात्मिक प्रक्रिया में नहीं है , कठोरता आपके अंदर है।

तो अगर आपकी आकांक्षा एक ज्वलंत आकांक्षा में बदल जाती है – तो बाकी का सब कुछ आप मुझ पर छोड़ दें। मैं आपको हर कदम पर बताऊंगा कि क्या करना है।

आपकी आकांक्षा ही हर दिन डगमगा रही है। डगमगाती आकांक्षा के साथ कैसे काम किया जा सकता है? अगर मुझे सारे विश्व के लोगों को एक सरल 10, 15 या 20 मिनट की ध्यान प्रक्रिया में दीक्षित करना होता, तो हम यह कर सकते थे, ये बहुत आसान है। हम इसे और भी आसान बना सकते हैं। वैसे, ईशा क्रिया भी काफ ी है, ये सभी को दे दो। “मैं यह नहीं हूँ, मैं वो नहीं हूँ” – यह कारगर है। ऐसा नहीं कि यह काम नहीं करता।

अगर आप परम तत्व का स्वरुप बनना चाहते हैं तो जीवन जीने का एक अलग तरीका है। सबसे पहली चीज़ है आकांक्षा – आपके भीतर की आकांक्षा ज्वलंत होनी चाहिए।
कोई तीव्र साधक इसे अंतिम लक्ष्य तक ले जा सकता है, इसमें कोई दो राय नहीं है। पर हमारा उद्देश्य सबको ध्यान में सुलाने का नहीं है। उद्देश्य उन्हें नींद में भी जागरूक बनाने का है। मेरा उद्देश्य यह नहीं कि हर कोई सुख से सो सके। वे खुश हों, स्वस्थ हों, और सोते रहें – ये मेरा उद्देश्य नहीं है। चाहे वे खुश हों या न हों, इससे मुझे फ र्क नहीं पड़ता। मुझे इससे भी फ र्क नहीं पड़ता कि वे स्वस्थ हैं या अस्वस्थ, मैं चाहता हूँ कि वे एक अलग किस्म की रौशनी से जलें क्योंकि चाहे आप 90 साल जीते हैं या 100 साल या फि र तीस साल – मेरे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है। “क्या आपने अपने जीवन में परम तत्व को प्राप्त किया?” – बस यह ही मेरे लिए महत्वपूर्ण है। क्या आपमें मांस और हड्डी से परे की कोई रौशनी प्रज्वलित हुई? आपके जीवन में यह होना चाहिए वरना क्या फ ायदा है? क्योंकि इस मांस और हड्डी के रूप में अगर आप सौ साल भी जीएंगे तब भी आपको वही सब परेशानियां होंगी, मेरा विश्वास कीजिए – और भी ज्यादा परेशानियां होंगी। बस यह ही बात है, हां?

आप बड़ी उम्र के लोगों को देखिये – क्या उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी किया है उससे वे संतुष्ट दिखते हैं? मैं उन लोगों की बात कर रहा हूँ जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी जी है। वे हर कदम पर दर्द से भरे लगते हैं। हां या ना?

अधिकतर लोगों की सांत्वना ये ही है – ‘‘मैं उन मुश्किलों में नहीं फंसा जिनमें मेरा पडोसी फंस गया। मेरा जीवन ठीक ही है। हमें कभी ऐसी मुश्किलें नहीं हुईं।’’ हां? तो अगर आप इस धरती पर एक और संख्या या आंकड़े की तरह होना चाहते हैं, तो आप हो सकते हैं। पर अगर आप परम तत्व का स्वरुप बनना चाहते हैं तो जीवन जीने का एक अलग तरीका है। सबसे पहली चीज़ है आकांक्षा – आपके भीतर की आकांक्षा ज्वलंत होनी चाहिए।


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