भगवान कृष्ण के भक्तों को क्यों झेलने पड़े कष्ट?

भगवान कृष्ण के भक्तों को क्यों झेलने पड़े कष्ट?

आध्यात्मिक पथ पर चलने वालों को बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना क्यों करना पड़ता है? आइये जानें कि कैसे ये हमारे प्रारब्ध कर्मों से जुड़ा है

जिज्ञासु: सद्‌गुरु, अगर हम मान लें कि कृष्ण भगवान थे, तो उनके भक्तों को इतनी मुश्किलों का सामना क्यों करना पड़ा? जहां तक मेरा सवाल है, जब तक मैं आपसे नहीं मिला था, मेरे जीवन से ज्यादातर लोगों को ईर्ष्या होती थी। अब भी लोग मेरे जीवन से ईर्ष्या करते हैं, मगर एक अलग रूप में। वास्तव में, मेरे जीवन में काफी उतार-चढ़ाव आए हैं। अगर कृपा का मकसद जीवन में सहजता और आराम लाना नहीं है, तो क्या है?

सद्‌गुरुसद्‌गुरु: आप जानते हैं, बलराम ने यही सवाल पूछा था, जब उन्हें मथुरा छोड़ना पड़ा था और वे मुश्किलों के दौर से गुजर रहे थे। उन्हें जंगल में भटकना पड़ रहा था और उनके पास पर्याप्त खाना और आराम का वक्त भी नहीं था। ‘हमारे साथ ये सब क्यों हो रहा है, वह भी तुम्हारे होते हुए?’ कृष्ण ने जवाब दिया, ‘जब जीवन आपके साथ बहुत अच्छी तरह घटित होता है, तो आप शिकायत नहीं करते। जब आप कुछ खास स्थितियों को अच्छा और बाकी को बुरा मानते हैं, या कुछ स्थितियों को मनचाहा और बाकी को अवांछित मानते हैं, तभी आप खुद से पूछते हैं कि आपके साथ ये चीजें क्यों हो रही हैं, आप जीवन को सिर्फ जीवन के रूप में नहीं देखते।

आध्यात्मिक पथ पर जीवन की गति बढ़ जाती है

जैसे ही आप आध्यात्मिकता में कदम रखते हैं, जीवन आपके साथ जबर्दस्त तरीके से घटित होता है, मानो सब कुछ तेजी से भाग रहा हो। अगर आप किसी चीज की पहचान अच्छे या बुरे के रूप में नहीं करते, तो आप देखेंगे कि जीवन बहुत जबर्दस्त तीव्रता से घटित हो रहा है, बस। अच्छी या बुरी जैसी कोई चीज नहीं होती। जीवन घटित होता है। कुछ लोग उसका आनंद उठाते हैं, कुछ लोग उसे झेलते हैं।’

हम बस इस बात का ध्यान रख सकते हैं कि हर कोई इसका आनंद उठाए। मूलभूत स्तर पर, इस धरती पर होने वाली घटनाएं कोई महत्व नहीं रखतीं। चाहे अभी स्पंदा हॉल पर बिजली गिर जाए और हम सब इसमें फंस कर जल जाएं, मैं नहीं समझता कि यह कोई मुसीबत है – यह बस एक घटना है। ‘फिर ईशा फाउंडेशन का क्या होगा, मेरे परिवार और मेरे बच्चों का क्या होगा?’ उन सब के लिए भी, जीवन बहुत जबर्दस्त तरीके से घटित होगा क्योंकि हम अचानक से गायब हो गए। मैं चाहता हूं कि आप सब अच्छे और बुरे की पहचान के बिना इसकी ओर देखें। जीवन जबर्दस्त तीव्रता में घटित हो रहा है, बस।

यदि आप आध्यात्मिकता की ओर मुड़ना चाहते हैं, तो कुदरती तौर पर आप जीवन के एक बड़े हिस्से की चाह करते हैं। बल्कि आप जीवन में जिस चीज को भी पाने की कोशिश करते हैं, वह जीवन का एक बड़ा हिस्सा पाने की कोशिश होती है। अगर आप सिर्फ जीवन की एक छोटा सी फांक खा रहे होते, तो भले ही वह पूरी तरह मिठास से भरा होता, मगर फिर भी वह रहेगा तो पतला सा टुकड़ा ही। अगर आप कोई केक लें और सिर्फ उसकी आइसिंग खाएं, तो कुछ समय बाद, मिठास आपके लिए ज़हर बन जाएगी।

एक मूलभूत कारण आपका प्रारब्ध है, मतलब इस जीवन के लिए आपको जो कर्म मिले हैं। सृष्टि बहुत करुणामयी है। अगर वह आपको इसी जीवन में आपके सारे कर्म दे देती, जिसे संचित कर्म कहते हैं, तो आप मर जाते।
आपने कहा, ‘मेरे जीवन से बहुत से लोगों को ईर्ष्या हो सकती थी,’ मगर आप जानते हैं कि वह कितना खोखला था। जिन लोगों के पास कार नहीं होती, उन्हें लगता है कि कार वाले लोग बड़े खुशकिस्मत होते हैं। कार निश्चित रूप से आरामदेह और सुविधाजनक होती है, मगर वह कोई खुशकिस्मती नहीं है। अगर दुनिया में कारें होती ही नहीं, तो किसी को कार पाने की इच्छा नहीं होती। समस्या यह है कि आप दूसरों से इस तरह अपनी तुलना करते हैं ‘अरे, उसके पास यह है, मेरे पास नहीं है।’ अगर जिन लोगों के पास कार नहीं है, वे कार वाले लोगों से अपनी तुलना न करें, तो उन्हें पैदल चलने या साइकिल चलाने में कोई समस्या नहीं होगी।

जब आपने कहा कि ‘मेरे जीवन से लोगों को ईर्ष्या होती थी’, तो आप मूलभूत रूप में जीवन के बारे में बात नहीं कर रहे थे। आप अपनी सामाजिक स्थिति बता रहे थे। मैं अस्तित्व के रूप में जीवन की बात कर रहा हूं। अभी, आप बहुत सी ऐसी चीजों को जीवन मानते हैं, जिनका गहराई में जीवन से कोई वास्ता नहीं है। इसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं है, यह एक मानसिक अवस्था है। सारे दुख उसी पागलपन से पैदा होते हैं।

आपके प्रारब्ध कर्म तेज़ी से चलते हैं

जब आप आध्यात्मिक रास्ते पर चलते हैं, तो आपके अंदरूनी हालात बहुत तेज गति से भागते हैं। इसकी तमाम वजहें हैं। एक मूलभूत कारण आपका प्रारब्ध है, मतलब इस जीवन के लिए आपको जो कर्म मिले हैं। सृष्टि बहुत करुणामयी है। अगर वह आपको इसी जीवन में आपके सारे कर्म दे देती, जिसे संचित कर्म कहते हैं, तो आप मर जाते। आपमें से बहुत से लोग इसी जीवन की स्मृतियों को नहीं झटक पाते। मान लीजिए, अगर मैं आपको गहरी तीव्रता में आपके सौ जीवनकालों की याद दिला दूं, तो ज्यादातर लोग उस याददाश्त का बोझ न सह पाने पर तुरंत प्राण त्याग देंगे। इसलिए, प्रकृति आपको उतना प्रारब्ध देती है, जितना आप संभाल सकें। अगर आप प्रकृति द्वारा सौंपे गए कर्मों पर ही चले और मान लीजिए, आप कोई नया कर्म उत्पन्न नहीं करते – जो संभव नहीं है- तो सौ जन्मों के कर्मों को नष्ट करने के लिए, आपको कम से कम सौ और जन्म लेने पड़ेंगे। मगर इन सौ जीवनकालों की प्रक्रिया में, आप और हजार जीवनकालों के लिए कर्म इकट्ठा कर सकते हैं।

आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँचने की जल्दी

जब आप आध्यात्मिक पथ पर होते हैं, तो आप अपने गंतव्य पर पहुंचने की हड़बड़ी में होते हैं। आप सौ या हजार जीवनकाल नहीं लेना चाहते, आप चाहते हैं कि आप जल्द से जल्द अपने लक्ष्य को पा लें। अगर एक खास रूप में दीक्षा दी जाए, तो उससे ऐसे आयाम खुलते हैं जो अन्यथा नहीं खुलते। अगर आप आध्यात्मिक रास्ते पर नहीं होते, तो हो सकता है कि आप ज्यादा आरामदेह और शांतिपूर्ण जीवन बिता रहे होते, मगर साथ ही एक निर्जीव जीवन भी जी रहे होते। जब आपके साथ कोई मूलभूत चीज घटित नहीं होती, तो आप जीवन से ज्यादा मौत के करीब होते हैं।

आध्यात्मिक प्रक्रिया में प्रवेश का मतलब है, जीवन को जबर्दस्त तरीके से अनुभव करने की इच्छा रखना। एक बार आप आकर मेरे साथ बैठते हैं, तो यह मेरा आशीर्वाद भी होता है कि जो कुछ भी जीवन है, वह आपके साथ घटित हो। ‘
अगर आप कोमा में अपना जीवन बिताना चाहते हैं, तो यह आपकी मर्जी है। मैं कहूंगा कि बहुत से लोग अपना जीवन कोमा में बिता रहे हैं। वे रोज एक ही समय पर उठते हैं, अपनी कॉफी पीते हैं, खाना खाते हैं, काम पर जाते हैं, एक और कॉफी पीते हैं, वापस आते हैं और सो जाते हैं। अपनी सुविधा को खोने के डर से, वे एक भी फालतू काम नहीं करेंगे या आजमाएंगे। बहुत से लोग चाहते हैं कि हर सुबह चटनी एक ही स्वाद की हो। खासकर, जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है, थोड़ा सा भी फर्क आने पर उनकी पूरी जिंदगी अस्त-व्यस्त हो जाती है। इसे अपनी मर्जी, अपना स्वभाव या और कुछ और बकवास बताते हुए, वे अपने जीवन को कोमा में बिताने की कोशिश कर रहे हैं। क्या आपका इरादा वही है?

अध्यात्म : जीवन को तीव्रता से अनुभव करने की इच्छा

आध्यात्मिक प्रक्रिया में प्रवेश का मतलब है, जीवन को जबर्दस्त तरीके से अनुभव करने की इच्छा रखना। एक बार आप आकर मेरे साथ बैठते हैं, तो यह मेरा आशीर्वाद भी होता है कि जो कुछ भी जीवन है, वह आपके साथ घटित हो। ‘अगर मौत हो जाए, तो?’ वह भी बढ़िया बात है। 75 साल में वहां तक पहुंचने की बजाय, आप 35 सालों में वहां तक पहुंच जाएं, तो क्या यह बढ़िया नहीं है? यह सिर्फ तर्क का विषय नहीं है, यह जीवन की हकीकत है। कृष्ण गीता में यही कहने की कोशिश करते हैं: अगर आप उन्हें सही स्थिति उपलब्ध करा सकते हैं, तो उन्हें जल्दी वहां पहुंचने दीजिए। एक बहुत सुंदर तमिल कविता है, जिसमें एक बालयोगी के विवाह और एक लड़की, जो खुद एक महान भक्त थी, के बारे में बताया गया है। उनका विवाह बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया, जिसमें 3000 अतिथियों को बुलाया गया। उन्होंने शादी की, फिर उस बालयोगी, जो एक म‍हान कवि भी था, ने बहुत सुंदर भक्ति कविता सुनानी शुरू की। हर किसी का ध्यान पूरी तरह उस पर था, वह बिल्कुल यही चाहता था। उसने पूर्ण ध्यान के इस पल का इस्तेमाल करके उन सभी को परम तत्व में विलीन कर दिया। उन सभी ने वहीं, उसी विवाह कक्ष में अपने शरीर त्याग दिए। कई सौ साल बाद, इस कवि ने एक कविता में बहुत खूबसूरती से शोक प्रकट करते हुए लिखा, ‘काश, उस विवाह में मुझे भी बुलाया गया होता, तो मुझे इस तरह मेहनत नहीं करनी पड़ती। मैं भी परमात्मा को प्राप्त कर लेता। मैं कुछ सौ साल बाद इस धरती पर आया। क्या मेरे लिए ऐसा कोई और विवाह होगा?’

उसने एक विवाह कक्ष में 3002 लोगों की मृत्यु को कोई त्रासदी नहीं माना। उसने इसे एक महान सौभाग्य समझा कि बालयोगी की मौजूदगी के कारण उन सभी लोगों को एक साथ मुक्ति मिल गई। एक आध्यात्मिक व्यक्ति किसी घटना को अच्छा या बुरा नहीं मानता, उसका सरोकार सिर्फ इस बात से होता है कि जीवन उसके लिए कितनी तीव्रता से घटित हो रहा है। अच्छाई और बुराई समाज से जुड़ी होता है, उनका जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता। जब आपको एक खास तरह से दीक्षा दी जाती है, तो आप अपने प्रारब्ध तक सीमित नहीं रह जाते।

संतुलन बनाएं रखने से आध्यात्मिक प्रगति महसूस होगी

अगर आप सौ जीवनकालों के कर्मों को अभी संभालना चाहते हैं, तो कुदरती तौर पर आपका जीवन बहुत तीव्रता से घटित होगा। अगर आप संतुलन बरकरार रखें, तो आप देखेंगे कि आपके जीवन में होने वाली हर घटना आपको एक कदम आगे ले जाएगी। अगर आप इसे नहीं देख सकते, अगर आप अपनी सामाजिक स्थितियों के असर में आ जाते हैं, तो जीवन जिस गति से घटित होता है, उससे आपको यह लग सकता है कि आपके जीवन में कुछ गड़बड़ है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं होता।

सकारात्मक शब्दों का लाखों अलग-अलग रूपों से गलत मतलब निकाला जा सकता है, क्योंकि आपका मन उस पर विचार करने लगता है। मैं जानबूझकर नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल करता हूं, क्योंकि आप उसका गलत अर्थ नहीं निकालेंगे। अगर आप आध्यात्मिक होना चाहते हैं, तो मूलभूत रूप से इसका मतलब है कि आप खुद को खत्म करना चाहते हैं, अभी आप जैसे हैं, उसे समाप्त करना चाहते हैं। इसे समझाने का एक सकारात्मक तरीका यह है कि आप मुक्ति चाहते हैं। आप अपनी चरम प्रकृति को प्राप्त करना चाहते हैं, आप ईश्वर को पाना चाहते हैं, आप असीमित होना चाहते हैं। जब आप असीमित होना चाहते हैं, तो अभी आपका जो अस्तित्व है, आप उसे समाप्त कर देना चाहते हैं। जब आप इस इच्छा को व्यक्त करते हैं, और आपके अंदर जरूरी ऊर्जा होती है, तो चीजें इस तरह घटित होती हैं जो आपके वर्तमान अस्तित्व को समाप्त कर देती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आपके साथ नकारात्मक चीजें होंगी। बस जीवन तेज गति से, जबर्दस्त गति से घटित होगा।

ये कृपा ही काम कर रही है

फिर कृपा क्या है? इस अस्तित्व में, उर्जा बहुत से रूपों में काम करती है। वह सूर्य की रोशनी के रूप में, ठंडी हवा, गुरुत्वाकर्षण के रूप में काम करती है, इसी तरह वह कृपा के रूप में भी असर करती है। गुरुत्वाकर्षण आपको नीचे की ओर खींचता है, ठंडी हवा आपको उड़ाने की कोशिश करती है, सूर्य आपको जलाने की कोशिश करता है – कृपा आपको इस धरती से उठा ले जाने की कोशिश करती है। यह नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल है।

सकारात्मक शब्दों का लाखों अलग-अलग रूपों से गलत मतलब निकाला जा सकता है, क्योंकि आपका मन उस पर विचार करने लगता है। मैं जानबूझकर नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल करता हूं, क्योंकि आप उसका गलत अर्थ नहीं निकालेंगे।
अगर आप इसी को सकारात्मक भाषा में व्यक्त करना चाहें, तो पृथ्वी आपको गले लगाने की कोशिश करती है, ठंडी हवा आपको ठंडा करने की कोशिश करती है। सूरज आपको गर्माहट देता है – कृपा आपको आगे बढ़ाने की कोशिश करती है। नकारात्मक शब्दों को ही अपनाएं क्योंकि आप उससे जुड़ेंगे नहीं। कृपा आपको अपनी सीमाओं से बाहर निकालने की कोशिश कर रही है, जिसमें अभी आप फंसे हुए हैं। पृथ्वी, लोग, शरीर, दिमाग, भावनाएं, सभी कुछ सीमाएं ही हैं। अगर आपने कृपा का आह्वान किया है और वह अपना काम कर रही है, अगर वह आपको ऊपर उठाना चाहती है मगर आप लंगर डाल देते हैं, तो आप फालतू का जद्दोजहद पैदा करते हैं। अगर आध्यात्मिक प्रक्रिया के कारण जीवन घटित हो रहा है, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं है। जद्दोजहद की वजह सिर्फ यह होती है कि आप कृपा को खुद को ऊपर उठाने के लिए आमंत्रित तो कर लेते हैं, मगर खुद लंगर डाल देते हैं। फिर स्वाभाविक रूप से आपको जद्दोजहद करनी ही होगा।


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  • gautam

    very thankful for this article
    as my life is also going through an upheavel right now.

    These words from sadhguru are telling me not to lose balance.

  • Prakash Dusadh

    I have a question why we asking for Kripa from god. Is that we are failer to survive given life of God? If so then I don’t want to go your root because I’m not a losser.