आध्यात्मिक खोज – मुझे छू गया अकेलेपन का अहसास

आध्यात्मिक खोज - मुझे छू गया अकेलेपन का अहसास-2

सद्‌गुरुपिछले अंक में शेरिल सिमोन के प्रश्न ‘सोल-मेट्स क्या वाकई में होते हैं?’ का सद्‌गुरु ने दिया सटीक व रोचक जवाब… पढ़ें धारावाहिक ‘मिडनाइट विद द मिस्टिक’ के हिंदी अनुवाद की अगली कड़ी:

 
मुझे उनका (सद्‌गुरु का) हास्य तब और अधिक मजेदार लगता, जब वे मुझे छोड़ किसी और को निशाना बनाते थे। ‘खुद के साथ ईमानदार होने पर ही आप इस सच्चाई को किसी दूसरे को देने के महत्व को समझ सकेंगी। आप किसी और के साथ क्या कर रही हैं उससे मुझे कोई लेना-देना नहीं। किसी और के साथ आप जो करती हैं वह केवल सामाजिक व्यवहार है। मेरा लेना-देना आपसे है, केवल आपसे। आपका अपने साथ ईमानदार होना जरूरी है।’

खुद के साथ पूरी तरह से ईमानदार होना होगा

‘आप अपने साथ जितनी अधिक ईमानदार होंगी चीजों को उतना ही साफ देखेंगी और उनमें नाटकीयता कम जोड़ेंगी। इससे आपका जीवन और अधिक गहरा और दिलचस्प होगा। नाटकीयता के न होने से आप अधिक स्वतंत्र होती जाएंगी और आपकी उलझनें तेजी से कम होती जाएंगी।’

आपने भले ही दुनिया के सबसे अच्छे आदमी से शादी की हो फिर भी यह जरूर बिखर जाएगा, क्योंकि आप हमेशा के लिए स्वयं को मूर्ख नहीं बना सकतीं।

‘यदि आप अपने साथ पूरी तरह ईमानदार नहीं होतीं तो आपको परेशान करने वाली छोटी-छोटी चीजों से जूझने में आपका पूरा जीवन बीत सकता है। और फिर आखिर में आप यह समझ पाएंगी कि आपकी सारी चिंताएं बेमानी हैं और वे आपको कहीं नहीं पहुंचाएंगी। आपका पूरा जीवन इसमें लग जाएगा। यह आपके समय और जीवन की बरबादी होगी।’

‘लेकिन यदि आप अपने साथ पूरी तरह ईमानदार हैं तो आप महसूस करेंगी कि संसार में जितनी भी चीजों को बेहद रूमानी बना दिया गया है वे सब बिलकुल बेमानी हैं। जीवन अपने-आप में ही भरा-पूरा है। उसको सजावट की जरूरत नहीं है। केवल वही लोग जो जीवन-प्रक्रिया की गहनता का अनुभव नहीं कर पाते, जो जीवन के अंदर की भव्यता का अनुमान नहीं लगा पाते, उन्हीं के मन में यह बचकाना विचार आता है कि जीवन को सजाना-बढ़ाना है।’ उन्होंने कहा और एक टहनी लेकर एक-दो लकड़ियों को आग की तरफ सरकाने लगे।

जीवन की सरल चीज़ों का आनंद लें, पर उन्हें परम न मानें

उन्होंने अपनी बात जारी रखी, ‘तो फिर क्या इसका अर्थ यह है कि आपको जीवन की छोटी-छोटी चीजों का आनंद नहीं लूटना चाहिए? नहीं, इसी पल को ले लीजिए। क्या आपको खाना खाने से आत्मज्ञान हो जाएगा? नहीं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम खाना न खाएं। हम जरूर खाएंगे। जीवन की सरल क्रियाओं का आनंद हम क्यों न लें? हम खाएंगे क्योंकि हम भूखे हैं। खाना हमें परम तक न ले जाए तो क्या, हम खाने का मजा जरूर लेंगे। हमार शरीर भूखा है। इसी तरह यदि आप अपनी भावनाओं, अपने तन और अपने मन से कुछ चीजों के लिए भूखी हैं तो आप शादी कर लेती हैं। पर आप अच्छी तरह जानती हैं कि यह परम नहीं है। अपनी शादी को संभालने का यह एक अच्छा और समझदारी का रास्ता है। यदि आप इसको लेकर बहुत-सी भ्रांतियां पाले हुए हैं, तो आपके हाथ निराशा के अलावा कुछ नहीं लगेगा। एक दिन यह अवश्य टूटकर बिखर जाएगा। आपने भले ही दुनिया के सबसे अच्छे आदमी से शादी की हो फिर भी यह जरूर बिखर जाएगा, क्योंकि आप हमेशा के लिए स्वयं को मूर्ख नहीं बना सकतीं। हमारी जीवनयात्रा हमारे और हमारे आसपास के लोगों के लिए सुखद हो इसके लिए ये व्यवस्थाएं की गयी हैं। आप जिसको शांति, आनंद और प्रेम कहती हैं वे सभी सुख के अलग-अलग पड़ाव हैं।’

‘सद्‌गुरु, जो लोग शादी को अपने लिए ठीक नहीं समझते क्या उन्हें शादी करनी ही नहीं चाहिए?’ मैंने पूछा।

दूसरों को देखकर शादी न करें

‘हां। यदि शादी की जरूरत नहीं लगती तो नहीं करनी चाहिए। भूख न लगने पर आप खाना नहीं खातीं, है न? बाकी सब खा रहे हैं इसलिए आप भी खा लें ऐसा नहीं होता, है न? आपके जीवन की हर चीज पर यही बात लागू होती है। आप तभी कोई काम करती हैं, जब आपको उसकी जरूरत महसूस होती है। जरूरी नहीं कि बाकी सब कर रहे हैं, इसलिए जरूरत न होने पर भी आप वह करें।’

उनकी बात सुन कर मैंने सोचा कि अभी भी मैं दूसरों से कितना अधिक प्रभावित हो रही हूं। अपने जीवन के इस पड़ाव में मुझे पूरा विश्वास था कि मैं ख़ुद के साथ बिलकुल ईमानदार हूं। फिर भी यह जानना बड़ा मुश्किल है कि दूसरों के विचारों का हम पर किन कपटी तरीकों से असर हो रहा है। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं ख़ुद के साथ कब पूरी ईमानदार हो पायी। तलाक के कुछ ही दिन बाद बरसात की एक ठंडी रात में काम से लौटते समय एक व्यस्त सडक़ पर मेरी कार खराब हो गयी थी। सुबह के तीन बज रहे थे और मैं क्रिस को लेने बेबीसिटर के घर जा रही थी। उस मूसलाधार बारिश में फोन बूथ ढूंढऩे जाते समय मैं सोच रही थी कि किसको फोन लगाऊं। उस समय मैंने बिलकुल अकेले होने के कड़वे सच को अंदर तक महसूस किया। कुछ समय से मैं अपने परिवार और मित्रों दोनों से कटी हुई थी। मैं आत्मग्लानि में गहरे और गहरे डूबती गयी, तभी मेरे अंदर से एक आवाज आयी, ‘तुम इस दुनिया में अकेली आयी हो और अकेली ही चली जाओगी। इस बीच तुम क्या करोगी यह सचमुच तुम्हारे ऊपर है।’ इस अकेलेपन का अहसास होने पर मैं समझ पाई कि मैं जीवन के छोर पर हूं। अब मुझे नहीं लगा कि मेरे पास परिवार या समीपी मित्रों का सुरक्षा-कवच है। मैं समझ गयी कि जिस सुरक्षा-कवच का मैं पहले अनुभव करती थी वह सुरक्षा का एक झूठा दिलासा ही तो था। सच देखें तो कभी भी किसी के साथ कुछ भी हो सकता है।


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