आध्यात्मिक खोज : उनके शब्दों में सत्य की गूंज थी

आध्यात्मिक खोज - उनके शब्दों में सत्य की गूंज थी

सद्‌गुरुइस स्तंभ में आप पढ़ रहे हैं ‘मिडनाइट विद द मिस्टिक’ का हिंदी अनुवाद जो एक खोजी शेरिल सिमोन की जीवन-यात्रा है। पेश है इस धारावाहिक की अगली कड़ी:

उनके बोलने से पहले ही मुझे लगा कि इनमें ‘वह बात’ है जो मैं खोज रही थी। मुझे यह अहसास हो गया कि वे जानते थे कि मैं क्या जानना चाहती हूं। मेरा अंतर यह कह रहा था कि वे मुझे ‘उस’ तक पहुंचा देंगे। आप जिनसे मिलते हैं उनमें कुछ ऐसे होते हैं, जिनका व्यक्तित्व जीवन से बड़ा होता है।

आत्म सिद्धि के लिए ईशा योग के साधन

वे बोलने में स्पष्ट और बेबाक, हंसी-ठिठोली करने वाले, त्रुटिहीन और तर्कसंगत थे। जीवन के सवालों के जवाब उनके मुख से लगातार निकल रहे थे।

उन्होंने जाने कितनी बातें बताईं – जीवन से जुड़ी रोजमर्रा की व्यावहारिक बातों से लेकर अस्तित्व के गहरे आयामों तक की बातें।
उन्होंने जाने कितनी बातें बताईं – जीवन से जुड़ी रोजमर्रा की व्यावहारिक बातों से लेकर अस्तित्व के गहरे आयामों तक की बातें। उन्होंने समझाया कि सदियों के योग-ज्ञान को आधार बनाकर उन्होंने ‘ईशा-योग’ नामक जिस योग पद्धति को आकार दिया है, उसका उपयोग कोई भी संपूर्ण व ऊर्जावान बनने, आत्मविकास और आत्मसिद्धि के लिए कर सकता है।

उन्होंने कहा, ‘आपके दुखी होने का एक ही कारण है कि जीवन वैसा नहीं चल रहा है जैसा आप चाहते हैं। इसके दो पहलू हैं। एक यह कि आप जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार चलने लायक बना लें या फिर आप ऐसी योग्यता पा लें कि आप जागरुकता के साथ अपने मन में वैसे विचार पैदा कर सकें जिसकी आपको जरूरत है।’

मानसिक तनाव जीवन का हिस्सा नहीं है

उन्होंने मानसिक तनाव के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि बहुत से लोगों ने तनाव को अपने जीवन का एक हिस्सा मान लिया है। कुछ ऐसे भी हैं जो इस बात को नहीं मानते कि उन्हें इसके साथ रहने की जरूरत नहीं है।

यदि हम खुद के अच्छे प्रबंधक हैं, तो हम बड़े होने पर अधिक आनंद पायेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से होता इसका उल्टा है। बच्चे खुशी से झूमते रहते हैं लेकिन बड़े होने पर खुशी घटती चली जाती है।
उन्होंने कहा, ‘कोई भी अपने काम की वजह से तनावग्रस्त नहीं होता, वह तनावग्रस्त इसलिए होता है क्योंकि वह स्वयं को ठीक से व्यवस्थित नहीं कर पाता। वह नहीं जानता कि अपनी प्रणालियों को किस तरह से संभाले। इसीलिए वह तनावग्रस्त होता है।’

‘हर व्यक्ति यह मानता है कि उसका काम तनाव भरा है। आप प्रधान मंत्री से पूछें कि क्या उसका काम तनावपूर्ण है या किसी उच्च अधिकारी से पूछें, हर कोई तनाव में है। आप ऑफिस के चपरासी से पूछें, उसको भी काम का तनाव है! मैं इस बात से राजी नहीं। कोई भी काम तनाव से भरा नहीं होता। आपकी अपनी प्रणालियां जब आपके काबू में नहीं होतीं तभी आप तनावग्रस्त होते हैं। आपका शरीर, दिमाग, रासायनिक प्रणालियां या आपकी जीवन ऊर्जाएं आपके मुताबिक नहीं चल रही हैं। कोई भी आपसे आदेश नहीं ले रहा है। यदि आपकी शारीरिक, मानसिक, रासायनिक और ऊर्जा प्रणालियां आपसे आदेश लें तो क्या आप कभी भी अपने अंदर कोई अप्रिय अनुभव पैदा करेंगे? आप अपने जीवन का हर पल पूरे आनंद में बितायेंगे। हम देखते हैं कि कुछ लोग तनाव में हैं, लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो उन्हीं कामों को बड़े मजे से कर रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि तनाव काम से नहीं जुड़ा है। यदि हम खुद के अच्छे प्रबंधक हैं, तो हम बड़े होने पर अधिक आनंद पायेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से होता इसका उल्टा है। बच्चे खुशी से झूमते रहते हैं लेकिन बड़े होने पर खुशी घटती चली जाती है।’

सद्‌गुरु के कमरे में घुसते ही संदेहों ने पीछा छोड़ा

उस रात सद्गुरु ने ऐसी अनेक चीजों के बारे में बेबाक बातें कही जो स्वाभाविक-सी लगती हैं, लेकिन उनको मैंने उस दृष्टि से नहीं देखा था। उनके सामने बैठे-बैठे मैं एक ऐसा खिंचाव महसूस कर रही थी कि मेरी रीढ़ सीधी होने लगी थी।

मैं अब भी नहीं जानती कि मैं सद्गुरु पर तुरंत क्यों विश्वास करने लगी थी, पर उनके कमरे में प्रवेश करते ही संदेहों ने मेरा पीछा छोड़ दिया था।
उनके शब्दों ने वर्षों से मेरी मानसिक स्थिति का हिस्सा रहे पुराने, रूढि़वादी विचारों की परतों को काट दिया। हरेक नए रहस्योद्घाटन के साथ और अधिक जानने की मेरी इच्छा तीव्र होती गयी। उनके तर्क इतने अकाट्य थे कि उन्होंने मेरी सोच को उसी जगह बदल डाला। लेकिन यह तर्क से कहीं बढक़र कुछ और था।

मैं अब भी नहीं जानती कि मैं सद्गुरु पर तुरंत क्यों विश्वास करने लगी थी, पर उनके कमरे में प्रवेश करते ही संदेहों ने मेरा पीछा छोड़ दिया था। मैं बिलकुल घर-जैसा आराम महसूस करने लगी थी और वहां आने के लिए धन्य अनुभव करने लगी थी। उनके कुछ ही मिनट बोलने के बाद मुझे लगा कि मेरा मन सुन्न हो गया है। उस पल मैं जान गयी थी कि मेरे खुद पर लादे प्रतिबंध और ऐशो-आराम अब खतरे में हैं। अब मैं किसी ऐसे दिव्यदर्शी के सान्निध्य में आ गयी हूं जो मुझे वास्तविक मुक्ति की ओर ले जाएंगे, ऐसी मुक्ति नहीं जो अधिकार जताती है या खुमारी के झटकों के लिए नशीली दवा लेती है ‐ बल्कि एक वास्तविक मुक्ति, जो अंदर से बाहर तक हमें मुक्त कर दे। मैं यह भी जान गयी थी कि मुक्ति पाने की इच्छा को जब तक मैं गंभीरता से न लूं, तब तक मुझे यहां नहीं होना चाहिए। वे ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो मुझे मेरी आदतों, विचारों और गलतफहमियों, या जो कुछ भी मुझे रोके हुए है, उसकी कैद में छोडक़र मुझे नजरअंदाज कर दें।

सत्य की गूँज

उनके बोले शब्दों को छोड़ भी दूं तो उनकी हृदयस्पर्शी उपस्थिति में मैंने पाया कि सद्गुरु प्यार से लबालब हैं, तो साथ ही घातक भी। होश संभालने और यह समझने के बाद कि मेरी साधना और बेचैनी के पीछे एक आंतरिक आध्यात्मिक आयाम है, मैं अनेक परंपराओं के अनगिनत गुरुओं के शब्द सुनती रही हूं। अंतर्दृष्टि के ये नगीने प्रेरक हो कर भी मेरे मन पर कभी कोई स्थाई छाप नहीं छोड़ पाए थे। सद्गुरु के समक्ष रहना उन सब बातों और उन सब लोगों से एकदम अलग था। जरूरी नहीं कि उनकी कही हर बात आप सुनना चाहते हों, लेकिन उनके शब्दों में सत्य की गूंज थी और वे पैने चाकू की तरह धारदार थे।


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