आध्यात्मिक खोज – सद्‌गुरु की तेज़ रफ़्तार से ताल मिलाने की कोशिश

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सद्‌गुरुपेश है इस आध्यात्मिक खोज धारावाहिक की अगली कड़ी जिसमें शेरिल सिमोन सद्‌गुरु के साथ भारत के अलग-अलग शहरों की यात्रा की यादें साझा कर रही हैं।

सद्‌गुरु के साथ कार यात्रा का अनुभव

एक बार सद्‌गुरु और लीला के साथ मैं भारत में एक यात्रा पर गई। सद्‌गुरु गाड़ी चला रहे थे, हालांकि ये कोई कहने की बात है! रफ्तार बढ़ाने वाला ऐक्सिलरेटर तो दबा ही रहता था और स्पीडोमीटर 120 किलोमीटर प्रति घंटा से नीचे आता ही नहीं था। एक बार जब मैंने सद्‌गुरु से पूछा कि क्या उनको नहीं लगता कि हम सामने से आनेवाली ट्रक के बहुत पास हैं तो वे बोले, ‘अभी चार इंच दूर है।’

ओह! चार इंच दूर! कितनी राहत की बात थी!

उस यात्रा के दौरान दो बार वे दो अलग-अलग कस्बों में सत्संग के लिए रुके जहां कई हजार लोग उनके दर्शन के लिए आए थे। वे बिलकुल स्थिर बैठे तकरीबन दो घंटे बोलते रहे। फिर हम कार में बैठकर सड़क पर हवा से बातें करने लगे। पूरा दिन वैसा ही चलता रहा – तेज रफ़्तार से चलती गाड़ी और बीच-बीच में सत्संग में संपूर्ण सौम्य शांति और पूरा ध्यान। आखिरकार रात को दो बजे हम अपनी मंजिल पर पहुंचे। और बस चार घंटे बाद ही सद्‌गुरु फुटबॉल खेलने निकल गए।

सद्‌गुरु की गति से ताल मिलाना असंभव लगता है

यही गति वे दिन-ब-दिन, साल-दर-साल बनाए रखते हैं। ईशा योग के अभ्यास से मेरा ऊर्जा-स्तर चाहे जितना बढ़ गया हो मेरे लिए सद्‌गुरु की गति की कल्पना करना भी मुश्किल है।

मैंने आग जलाई और लीला सप्ताह भर के लिए रसोईघर को अपना बनाने अंदर चली गयीं।
उनके साथ के इन कुछ ही दिनों में (पूरा सप्ताह तो बहुत बड़ी बात है!) रात में अधिक-से-अधिक तीन-चार घंटे सोने के उनके कार्यक्रम से ताल मिलाते हुए मैं नींद को तरस गई थी। हालत यह हो गई थी कि मुझे सही वाक्य बोलने के लिए शब्द जोड़ने तक में दिक्कत होने लगी थी। लेकिन लीला हफ़्तों बिना रुके, बहुत कम सोकर, बिना किसी परेशानी के उनके साथ चलती चली जाती हैं।

अब हम अपने घर लौट आए थे। लीला और मैंने मिलकर कार का सामान नीचे उतारा। सद्‌गुरु अपने कमरे में चले गए। घर की तरह ही उनके कमरे में भी पुराना फर्नीचर था, लकड़ी के पैनल थे और दीवारों पर देसी अमेरिकन इंडियन दरियां टंगी हुई थीं। लिविंग रूम में बना अग्निस्थल (फायरप्लेस), सुखद गर्मी और गुनगुने आराम के अहसास को बढ़ा रहा था। मैंने आग जलाई और लीला सप्ताह भर के लिए रसोईघर को अपना बनाने अंदर चली गयीं। कुछ ही घंटों के अंदर, आधी रात से ठीक पहले, उन्होंने बेहद स्वादिष्ट दक्षिण भारतीय भोजन परोसा ‐ पूरे सप्ताह की स्वादिष्ट भोजन-श्रृंखला की पहली कड़ी ‐ व्यंजन पुस्तकों की मदद के बिना, एक भी व्यंजन बिना दोहराए।

सद्‌गुरु के साथ नौका यात्रा का अनुभव

सद्‌गुरु हमारे साथ भोजन के लिए बैठे और फिर हम उमंग और कौतूहल की एक लंबी रात की आशा में डूब गए। मैंने चाय बनाने के लिए पानी रखा। जैसे ही केतली सीटी बजाने लगी, सद्‌गुरु ने पूछा, ‘शेरिल, क्या अभी भी आपके पास वह नाव है?’ उनकी आंखों में नाचती रोशनी को देखकर मैं समझ गई कि वे अभी इसी समय उस नाव में जाना चाह रहे हैं। मैं मुस्कराई। दिनभर हमलोग यात्रा करते रहे थे, अब इस समय रात में उनको नौकायन करना था! हालांकि यह नाव मेरे पास कई वर्षों से थी पर एक बार भी मेरे मन में विचार नहीं आया कि मैं रात में कभी नौका यात्रा करूं। फिर से बाहर जाने की उनकी उत्सुकता देखकर मुझे उनकी अदम्य शारीरिक ऊर्जा पर अचंभा होने लगा।

आधी रात का समय आम तौर पर मेरे सोने का होता है, पर उस रात सद्‌गुरु के असामान्य निवेदन से मेरे अंदर भी ऊर्जा की तरंग जाग गई। मैं झट से उठी और उनको और लीला को स्लाइडिंग ग्लास के दरवाजों से होकर बाहर के रास्ते डॉक पर ले गई। ‘बिलकुल तैयार, आपकी प्रतीक्षा में,’ मैंने शेखी बघारी, इस बात से खुश कि नाव हर चीज से लैस थी और उसमें गैस भरी हुई थी।

फिर मुझे याद आया कि कुछ जरूरी चीजें छूट गई हैं ‐ जैसे कि नाव की चाभियां! मैं दौड़कर घर में दाखिल हुई और चाभियों के अलावा कुछ कंबल, एक बड़ी फ्लैशलाइट, माचिस और रात में देखने वाले चश्मे ले आई।

सद्‌गुरु के सान्निध्य में एक सुहानी रात

उत्तर कैरोलिना की गर्मियों की वह रात बड़ी सुहानी थी – ऊंचाई के कारण सुखद तापमान, हल्की-सी गर्मी लेकिन गर्मियों के दिनों से कम।

 हमारी नौका को झील का पानी हौले-हौले थपथपा रहा था और सद्‌गुरु की मुस्कान आगे की काली गहरी रात को सचमुच रोशन करती लग रही थी।
सामान हाथ में लिए कैबिन से बाहर निकलने के बाद मैंने एक पल रुककर बाहर की मोहक बयार का अनुभव किया और देखा कि अंधियारे अंबर में जाने कितने तारे टिमटिमा रहे हैं! झींगुरों और रइयों की सुरीली तान हवा में संगीत घोल रही थी और झील, मिट्टी और पर्वतीय जंगलों की आत्मा को पोसनेवाली भीनी सुगंध से हवा मदमस्त थी।

जब तक मैं पोतघाट पर पहुंची सद्‌गुरु ने कमान संभाल ली थी। लीला और मैं सामने बैठ गईं। उन्होंने नाव को पीछे चलाकर डॉक से बाहर निकाल लिया और देखते-ही-देखते हम आधी रात को ग्लेनव्यू झील के गहरी जामुनी अंधेरे में चल पड़े। जैसे उन्होंने मेरी कार चलाई थी वैसे ही उन्होंने नाव भी चलाई मानो वे उसे पूरा ठीक-ठीक जानते हों। हमारी नौका को झील का पानी हौले-हौले थपथपा रहा था और सद्‌गुरु की मुस्कान आगे की काली गहरी रात को सचमुच रोशन करती लग रही थी। आनंद से गद्गद् होकर मैंने देखा कि झील में हमारे सिवाय कोई नहीं है। सब-कुछ बिलकुल अद्भुत लग रहा था।


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