आध्यात्मिक खोज – पहली बार शामिल हुई सद्‌गुरु के कार्यक्रम में

आध्यात्मिक खोज – पहली बार शामिल हुई सद्‌गुरु के कार्यक्रम में

सद्‌गुरुइस स्तंभ में आप पढ़ रहे हैं ‘मिडनाइट विद द मिस्टिक’ का हिंदी अनुवाद जो एक खोजी शेरिल सिमोन की जीवन-यात्रा है। धारावाहिक की इस कड़ी जिसमें शेरिल हमसे उस दिन की यादें साझा कर रही हैं, जब वे पहली बार सद्‌गुरु के किसी कार्यक्रम में शामिल हुईं थीं।

जाने ऐसी कितनी घटनाओं का वर्णन मिलता है जब पूर्व के कुछ प्रसिद्ध गुरुओं ने जाने कितने लोगों को मायूस किया और इस कारण आम तौर पर गुरुओं का नाम इस देश में बदनाम हुआ। हमने मीडिया में कुछ ऐसे गुरुओं के बारे में सुना ही है, जिन्होंने आध्यात्मिकता को या तो एक बड़ा व्यापार बना लिया है या किसी-न-किसी प्रकार का घोटाला किया है।

सद्‌गुरु के बारे में जानने की उत्सुकता

अपने इन संदेहों के बावजूद मैं सद्‌गुरु के बारे में जानने को बेहद उत्सुक थी। क्योंकि अभी-अभी एक शिविर में भाग ले कर लौटने के बाद भी मुझे नहीं लग रहा था कि मैं स्वयं को बेहतर बनाने के लिए कुछ कर रही हूं।

केवल इस एक वार्तालाप के आधार पर मुझे लगा कि सद्‌गुरु सचमुच एक करिश्माई व्यक्ति होंगे, हालांकि मेरे अंदर के संदेही मन को ऐसी संभावना ही नहीं लग रही थी कि वे अंतर्ज्ञानी हो सकते हैं।
फिर भी उस युवक से एक सवाल पूछने से मैं स्वयं को रोक नहीं पायी, ‘तो फिर सद्‌गुरु के पास कितनी महंगी गाडिय़ां हैं?’ वे अवाक रह गये। वे भौंचक्के और निराश दिख रहे थे। उस नाजुक पल में मैं अपनी असंवेदनशीलता पर थोड़ी शर्मिंदा हुई। उन्होंने शीघ्र ही स्वयं को संभालते हुए सुझाव दिया कि मैं सद्‌गुरु के बारे में स्वयं जांच-पड़ताल कर लूं तो ठीक रहेगा। केवल इस एक वार्तालाप के आधार पर मुझे लगा कि सद्‌गुरु सचमुच एक करिश्माई व्यक्ति होंगे, हालांकि मेरे अंदर के संदेही मन को ऐसी संभावना ही नहीं लग रही थी कि वे अंतर्ज्ञानी हो सकते हैं। इस सबके बाद मेरे मन के एक कोने में संदेह उठने लगा कि क्या अंतर्ज्ञान जैसी कोई चीज सचमुच में होती है!

एक मददगार की जरुरत थी

जैसा मैंने बताया, एक और आध्यात्मिक शिविर से बिना-लाभ लौट आने के कारण मैं बहुत निराश थी। लगातार तीव्र वेदना के साथ यह स्पष्ट हो रहा था कि इतने परिश्रम और लगन के बावजूद मैं अपने लक्ष्य के पास नहीं पहुंच पा रही थी।

इस मुकाम पर मेरे मन में सचमुच एक सवाल उठा था। कोई आत्मज्ञानी व्यक्ति जिसकी कई दूसरे आयामों तक पहुंच है आत्मसिद्ध बनने में मेरी मदद कैसे कर सकता है?
अपने अहम् को पीछे छोडऩे के बाद मैंने जाना कि मुझे अपनी आध्यात्मिक यात्रा के लिए किसी मददगार की जरूरत थी। या हो सकता है मुझे मदद नहीं चाहिए थी, लेकिन मेरा दिल जानता था कि लाख कोशिश कर के भी मैं स्वयं में बदलाव लाने में सफल नहीं हो पाई थी। मुझे इंसान की महान क्षमता में विश्वास था। मैं जानती थी कि मैं उसका अनुभव नहीं कर पा रही हूं पर मुझे नहीं मालूम था कि संपूर्ण अनुभव करूं तो कैसे करूं। मैं समझ गई थी कि अपने दम पर कुछ जान पाना मेरे लिए संभव नहीं है और मुझे सचमुच मदद की जरूरत है। लेकिन मैं संदेह में डूबी हुई थोड़ा-सा ही विश्वास कर पा रही थी कि मेरी ऐसी मदद कर सकने वाला कोई सचमुच इस दुनिया में है। उस गाने की वह लाइन याद आने लगी ‐ ‘व्हाट इफ गॉड वाज वन ऑफ अस?’ हां, व्हाट इफ ? अगर ऐसा हो तो? मैं जिस मोड़ पर पहुंच गयी थी वहां मुझे लगता था कि यदि ईसा मसीह या बुद्ध भी मुझे मिल जायें तो शायद मैं उनकी आत्मसिद्धि को पहचान नहीं पाऊंगी या उसको नकार दूंगी। इस मुकाम पर मेरे मन में सचमुच एक सवाल उठा था। कोई आत्मज्ञानी व्यक्ति जिसकी कई दूसरे आयामों तक पहुंच है आत्मसिद्ध बनने में मेरी मदद कैसे कर सकता है?

घर के पास ही एक चर्च में सद्‌गुरु का संबोधन

कई महीने बीत गये, मैंने सद्‌गुरु के बारे में ज्यादा नहीं सोचा। वैसे मेरे मन में एक उड़ता हुआ-सा विचार कौंधा था कि यदि वे सचमुच में गुरु हैं और मुझसे और मेरे जीवन से उनका जरा भी संबंध है तो वे स्वयं मुझे ढूंढ़ लेंगे। शायद उन्होंने यही किया।

मेरे बैठ जाने के बाद कुछ स्वयंसेवकों ने मंच पर जा कर कुर्सियों का क्रम बदल दिया। अब सद्‌गुरु की कुर्सी ठीक मेरे सामने थी।
कई महीने बाद जब मैं अटलांटा के एक स्थानीय चर्च में होने वाले संगीतोत्सव के टिकट खरीदने के लिए ऑनलाइन थी, मुझे यह देख कर बड़ा अचंभा हुआ कि उनकी वेबसाइट पर एकाएक सद्‌गुरु की तस्वीर आ गई है। वे मेरे घर से पंद्रह मिनट की दूरी पर उसी चर्च में अगले सप्ताह एक संबोधन करने वाले थे। मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैंने वहां जा कर स्वयं उनके बारे में जानने का फैसला कर लिया। चर्च पहुंच कर मैंने कमरे में सामने एक तरफ बैठना पसंद किया ताकि मैं उनको पास से तो देख सकूं। सक्रिय सहभागी न बन कर एक दर्शक बनी रहूं। शायद भाग्य में यही लिखा था। मेरे बैठ जाने के बाद कुछ स्वयंसेवकों ने मंच पर जा कर कुर्सियों का क्रम बदल दिया। अब सद्‌गुरु की कुर्सी ठीक मेरे सामने थी। जितना पास से सोचा था अब उससे कहीं अधिक पास से मैं उनको देख सकती थी।

कमरे में एक तेज़ व्याप्त हो रहा था

इस संबोधन के लिए मैं मन पर एक रक्षा-कवच पहन कर गयी थी – यह आशा करते हुए कि सद्गुरु में सम्मोहित करने की तीव्र शक्ति होगी और यह विश्वास करते हुए कि मुझ पर इसका कोई प्रभाव नहीं होगा।

एक आध्यात्मिक तेज उनके व्यक्तित्व को दमका कर कमरे में व्याप्त हो रहा था। उनके अंदर एक विशेष शक्ति थी जो सूक्ष्मता को कोमलता के साथ मिश्रित करती थी और यह उनके संबोधन के तीखेपन को नरमी देती थी।
मैं इतना लंबा जीवन तो बिता ही चुकी थी कि किसी व्यक्ति के निजी या व्यावसायिक चुंबकीय आकर्षण से स्वयं को अकारण प्रभावित होने से रोक सकती थी। लेकिन उस रात वे जैसे ही कमरे में आये, तुरंत ऐसा लगा जैसे मैं उनको बरसों से जानती हूं, मैं उनको सदा-सदा से जानती हूं। उनको पहचान लेने के उस झटके के अलावा मेरे अंदर कुछ और भी जोर से खडख़ड़ाया। वे मौलिक गुरु-से लगे। प्राचीन, समयातीत, गंभीर और मैं क्या शब्द लिखूं। पगड़ी आदि लगाये वे बहुत सुंदर लग रहे थे। उन्होंने लंबा, पीला-सफेद, कच्चे रेशम का कुर्ता, एक सुंदर चित्रित दरी-जैसी रेशमी शॉल, एक केसरिया पगड़ी, और खूबसूरत सैंडल पहने थे। यह सब-कुछ तो अपनी तरफ खींच ही रहा था पर उनका सौंदर्य केवल शारीरिक नहीं था। एक आध्यात्मिक तेज उनके व्यक्तित्व को दमका कर कमरे में व्याप्त हो रहा था। उनके अंदर एक विशेष शक्ति थी जो सूक्ष्मता को कोमलता के साथ मिश्रित करती थी और यह उनके संबोधन के तीखेपन को नरमी देती थी। मैं एक दिव्यदर्शी के दर्शन करने आयी थी और मुझे निराशा हाथ नहीं लगी।


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