आध्यात्मिक खोज : परमहंस योगानंद की पुस्तक से पैदा हुई आत्म खोज

आध्यात्मिक खोज : परमहंस योगानंद की पुस्तक से पैदा हुई आत्म खोज

सद्‌गुरुधारावाहिक  ‐ ‘आधी रात सद्‌गुरु के साथ शेरिल सिमोन और सद्‌गुरु के बीच हुए संवादों का संकलन है। इंग्लैंड में जन्मी और अमेरिका में पली-बढ़ी शेरिल सिमोन, उत्सुक व खोजी स्वभाव की हैं, और वे एक आध्यात्मिक जिज्ञासु हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंक में आपने पढ़ा कि शेरिल जब पहली कक्षा में थीं, तब पहली बार उनका मौत से सामना हुआ था। आइये जानते हैं, इसके बाद कैसे उनकी जिज्ञासा को एक नया मोड़ मिला…

मृत्यु से दूसरा सामना

अगली बार जब मैंने मौत को देखा तब मैं दस साल की थी। मेरे दादा चल बसे थे। मेरे दादा-दादी हमसे कुछ ही दूरी पर रहते थे। उस समय मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य होता था – मौज-मस्ती और बहादुरी। चूंकि मेरे दादा मुझे दौड़-भाग वाले ऐसे कामों की एक लंबी सूची पकड़ा देते थे जो मुझे नापसंद थे, इसलिए मैं हमेशा उनसे आंख चुराती थी। उनके घर जाने से भी कतराती थी। फि र एक दिन वे चल बसे। तब उनसे न मिलने के उन सारे मौकों को याद करके मुझे बहुत रोना आया।

मुझे याद है दस साल की उम्र में भी मैं सोचा करती थी कि मुझे ऐसा जीवन नहीं जीना चाहिए जिसमें मुझे किसी ऐसे काम के लिए दुखी होना पड़े जो मैंने किया हो या करने से मना किया हो। मेरे मन के अंदर सांसारिक चीजों के लगातार बदलते रहने और किसी भी पल मिट जाने की बात घर करने लगी थी।

इन अनुभवों ने मेरी जिज्ञासा के लिए ईंधन का काम करके उसको और अधिक तेज कर दिया। मैं अक्सर मृत्यु के बारे में सोचने लगी। इसने मुझे बीमार और उदास नहीं बनाया, बल्कि जिज्ञासु और बेचैन बनाया।

सभी गुरुओं के उपदेशों को पढ़ा

समय बीतने के साथ मैं दर्जनों किताबें पढऩे लगी। दर्शन, अध्यात्म, धर्म और हर वो पुस्तक जिसमें इस बात का वर्णन होता था कि हमारे मरने के बाद क्या होता है। जीवन के सवालों के जवाब खोजने के साथ-साथ मैं साधारण इंसान के बदले एक बेहतर मनुष्य बनने के तरीके भी ढूंढ़ रही थी। स्पष्ट है जीवन का उद्देश्य पैदा होने, बड़ा होने, काम करने, पैसा कमाने, खाने-पीने, सोने और फि र मर जाने से कहीं अधिक है। पुस्तकें पढ़ते समय मैंने ऐसे लोगों के बारे में जाना जो हम सबों से कई मायनों में अलग और बड़े हैं। मैंने ईसा मसीह, बुद्ध और कंफ्यूशियस के उपदेशों को पढ़ा। मैं वहां नहीं रुकी, तंत्र-मंत्र, परामनोविज्ञान और जादू-टोने के बारे में भी पढ़ा। मैंने हर वो चीज पढ़ी, जिसमें वैज्ञानिक बातों से आगे बढ़ कर कुछ अलग खुलासे किये गये हों। मुझे अलग-अलग सोच के विभिन्न गुरुओं की समझाई हर बात में गहरी रुचि थी। मैं जानना चाहती थी कि वे क्या जानते थे और उन्होंने वह कैसे जाना। मैं जानना चाहती थी कि वे गुरु कैसे बन पाये। क्या उनका जन्म ही मुझसे कुछ अलग रूप में हुआ था?

क्या मृत्यु से पहले पूरी होगी अध्यात्मिक खोज?

जब मैं छोटी थी तब जितने भी लोगों से आमने-सामने या पुस्तकों के जरिये मिली, वे सब केवल वही बातें हम तक पहुंचाते थे जो उनको पढ़ायी गयी थीं या उन्होंने खुद पढ़ी या सुनी थीं न कि वे जो उन्होंने स्वयं अनुभव की थीं। कई वर्ष खोजते रहने के बाद मुझे डर लगने लगा कि कहीं मैं जवाब पाये बिना ही इस दुनिया से चली न जाऊं। यह बड़ी निराश करने वाली बात थी क्योंकि मुझे बताया गया था कि मेरा दिमाग तेज है। स्कूल में मुझे होनहार बच्चों के लिए हो रहे कार्यक्रम में शामिल किया गया था। यह बात मुझे पागल किये जा रही थी कि तेज और अक्लमंद मानी जाने के बावजूद मैं अब तक स्वयं अपने सवालों के जवाब नहीं ढूंढ़ पाई थी।

पर आशा की एक किरण मेरे मन को प्रकाशित कर रही थी कि जब मेरी मृत्यु होगी तब मुझे इन सवालों का जवाब मिल जायेगा। शायद जवाब पाने के लिए यह दुनिया छोडऩी पड़ती है। मेरे मन ने कहा, रुको! हो सकता है हम मर जायें और फि र भी कुछ न जान पायें! मैं सोचती रही कि जीते-जी क्यों नहीं जान सकती! लगता है ईसा मसीह और बुद्ध जरूर जानते थे। पर वे तो बहुत प्राचीन काल में रहते थे। यों लग रहा था जैसे हर वह मनुष्य जो थोड़ा-बहुत भी जानता था इस दुनिया से जा चुका है – और वे अब भला कैसे बता पायेंगे!

परमहंस योगानंद की पुस्तक मिली भेंट में

फि र एक अजीब-सी बात हुई। जब मैं पंद्रह बरस की थी और फ्लू से पस्त घर पर पड़ी थी तब मेरे सामने वाली पोर्च में एक दिन अचानक एक पुस्तक पड़ी दिखी, एक पृष्ठ की टिप्पणी के साथ जिस पर लिखा था, ‘शेरिल के लिए’। मैं यह पुस्तक ढूंढऩे कभी किसी पुस्तक-दुकान पर नहीं गयी थी। मुझे तो इस पुस्तक के बारे में मालूम भी नहीं था। पर अचानक जादू की तरह यह मेरे दरवाजे पर पड़ी थी। मैं यह कभी नहीं जान पायी कि यह पुस्तक किसने वहां डाल दी थी। पर मैं खुश थी, भला हो उस आदमी का जिसने यह पुस्तक मेरे लिए छोड़ दी थी।

योगियों और आत्म-बोध के पथ के बारे में पता चला

यह पुस्तक मेरी अब तक की पढ़ी सारी पुस्तकों से बिलकुल अलग थी। यह पूरब के योगियों और योग के मार्ग के बारे में थी। यह पुस्तक यह भी बताती थी कि योग मनुष्य को अपनी पूरी क्षमता हासिल करने के लिये कहां तक ले जा सकता है। यह बात मेरे लिए बिलकुल नई थी। पहले मैंने हठयोग देखा था और मुझे ऐसा लगा था जैसे यह पूरे शरीर और हाथ-पैर को खींच-तान कर शरीर को लचीला बनाये रखने वाली कसरतों की एक लंबी कड़ी है। लेकिन यह पुस्तक भारत के एक दिव्यदर्शी के बारे में थी और बताती थी कि योग ने किस तरह से उनको और कुछ अन्य लोगों को अत्यंत प्रगतिशील अंतर्ज्ञानी व्यक्तियों में रूपांतरित कर दिया था। बुद्ध और ईसा मसीह जैसे अत्यंत प्राचीन धार्मिक उपदेशकों को छोड़ कर जो कि बहुत पहले इस दुनिया से जा चुके थे, मैंने कभी भी किसी और के बारे में ऐसा नहीं सुना था।

यह पुस्तक थी भारतीय दिव्यदर्शी परमहंस योगानंद की ‐ ‘दि ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’। योगानंद की कृपा से मैं जिस मुक्ति की खोज कर रही थी उसको एक नाम मिल गया था ‐ आत्मबोध।

आत्मज्ञान : हर तरह के भ्रम से छुटकारा

आत्मबोध जिसको अंतर्ज्ञान भी कहा जाता है, हर प्रकार के छलावे से ऊपर आंतरिक व्यक्तित्व के वास्तविक रूप के ज्ञान के रूप में समझाया गया था। ऐसा लग रहा था मानो हम सब यथार्थ का एक टूटा-फूटा रूप पाले हुए हैं, जिससे हमें लगता है कि हम हर किसी दूसरे व्यक्ति और चीज से भिन्न हैं, जबकि सच यह है कि हम सब एक ही ऊर्जा हैं। इस सोच से जुड़ी हुई कुछ बातें आइंस्टाइन ने भी कही थीं। उन्होंने कहा था, ‘मनुष्य ब्रह्मांड नाम की पूर्णता का एक अंश है, समय और स्थान के दायरे में बंधा हुआ। वह स्वयं को, अपनी सोच और भावनाओं को बाकी सबसे अलग मानता है। यह एक तरह से उसकी चेतना का दृष्टिभ्रम है। यह भ्रम हमारे लिए एक जेल की तरह है जो हमें अपनी निजी इच्छाओं तक और हमारे प्रेम को हमारे सबसे समीपी लोगों तक सीमित कर देता है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम स्वयं को इस जेल से बाहर निकाल लें ……….।’ उन्होंने यह भी कहा था, ‘यथार्थ केवल एक छलावा है, अलबत्ता एक बेहद जिद्दी छलावा।’

आत्मबोध पाने की आशा जागृत हुई

योगानंद के अनुसार हम इस छलावे से छुटकारा पा सकते हैं और जीवन को एक बिलकुल दूसरे ढंग से जान, समझ और अनुभव कर सकते हैं। इसका वर्णन एक ऐसे ज्ञान के रूप में किया गया है जो केवल अनुभव करके ही मिलता है न कि बौद्धिक समझ से और यह शरीर की हर कोशिका में महसूस होता है। मुझे तुरंत समझ आ गया कि यही वह चीज है जो मैं खोज रही थी!

इस पुस्तक ने न केवल मेरी साधना को एक नाम देने में मेरी मदद की, इसने मेरे मन में एक आशा भी जगायी कि मुझ जैसा साधारण व्यक्ति भी आत्मबोध पा सकता है। इसने मुझमें विश्वास जगाया कि मैं सचमुच में अपने छोटे-से अलग अहं की जेल से बाहर निकल कर सच्ची अनुभूति के साथ जीवन को जान सकती हूं। योग एक मार्ग है, सीमित से असीमित तक पहुंचने का, अंतिम खोज की यात्रा का। जो जानने के लिए मैं बेचैन थी वह जानना अब मेरे लिए संभव था। यह सोच कर मैं रोमांच से भर उठी।

आध्यात्मिक खोज में प्रत्यक्ष गुरु की कमी महसूस हुई

लेकिन एक बड़ी कमी जरूर थी। योग एक गुरु के मार्गदर्शन में ही अच्छी तरह सीखा जा सकता है। योगानंद गुरु का वर्णन एक ऐसे आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में करते हैं जो पूरी तरह से मुक्त है। अहं के भ्रम वाले बंधन से मुक्त एक ऐसा व्यक्ति जिसकी अनेक आयामों तक पहुंच है और जिसे जीवन की बेहतर समझ है। कहा जाता है कि गुरु ऐसा व्यक्ति होता है जो अंधेरा चीर कर सारी बाधाएं तोड़ सकता है, जिनमें अहं की नादानी से बाहर निकलने में दूसरों की मदद करने की क्षमता होती है। मेरे मन में तुरंत एक बात कौंधी कि यदि मैं ऐसे आध्यात्मिक गुरु के सान्निध्य में रह सकूं तो मेरे लिए सब-कुछ सरल हो जायेगा। फि र मैं सोचने लगी क्या ऐसे गुरु मेरे भाग्य में हैं!

गुरु और शिष्य के सम्बन्ध का असमंजस

योगानंद खुलासा करते हैं कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह हुई कि उनको सौभाग्य से अपने गुरु को पाने का अविश्वसनीय मौका मिला। लेकिन ज्यों-ज्यों मैं पुस्तक को आगे पढ़ती गयी त्यों-त्यों मेरी चिंता बढ़ती गयी। गुरु और शिष्य के संबंध को देख कर मुझे लग रहा था कि मैं बिलकुल इसके योग्य नहीं हूं। योगानंद के गुरु बहुत तकाजा करने वाले लग रहे थे। आत्मबोध और आंतरिक आनंद सिर्फ अनुशासन से ही मिल सकता है। भला ऐसा क्यों? मैं सोचने लगी। मुक्ति और अनुशासन का क्या संबंध?

अब मैं बड़ी दुविधा में थी। यह मेरे विचारों से कतई मेल नहीं खा रहा था। मैं स्वतंत्रता और आंतरिक आनंद चाहती थी। खुले विचारों और रोमांच के पीछे भागने वाली बिगड़ैल किस्म की बड़ी अनुशासनहीन लडक़ी थी मैं। मैं न तो कोई काम करना चाहती थी और न ही चाहती थी कि कोई मुझे काम करने को कहे। इसके अलावा यह संबंध भक्तिपूर्ण लग रहा था जिससे मुझे सचमुच कुलबुलाहट-सी होने लगी। इतना तय था कि मैं कभी भी किसी दूसरे आदमी के आगे सिर झुका कर उसकी पूजा नहीं कर सकती थी।

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