सफलता न मिलने पर खीझते क्यों हैं?

सद्‌गुरु सद्‌गुरु बताते हैं कि ब्रह्माण्ड का कोई भी प्राणी अपने जीवन के किसी भी पल में निराश नहीं होता। वे हर पल अपनी ओर से कोशिश करते रहते हैं। लेकिन सिर्फ एक मनुष्य ऐसा प्राणी है जो मन में निराशा पैदा करता है और पस्त हो जाता है।

माना कि आपका लक्ष्य सफलता पाना था और आपने कड़ी मेहनत की, मगर नतीजा विपरीत हो गया। इसे लेकर किसलिए परेशान होना? तकलीफ किसलिए?

कभी उत्साह के साथ बढ़ रही चींटियों की कतार को देखिए। उनमें से एक चींटी की राह पर यूं ही उंगली रखकर रास्ता रोककर देखिए। वह रुकेगी नहीं। उंगली के चारों ओर घूमते हुए ढूंढ़ेगी कि रास्ता कहां है। उसके रास्ते पर चाहे जितने रोड़े अटकाएं वह किसी न किसी तरह अपनी यात्रा जारी रखेगी। मरकर गिर जाने तक वह अपना उत्साह नहीं खोती, न ही उम्मीद छोड़ती है।

पतली-सी घास को जमीन से उखाडक़र उसकी जड़ों को गौर से देखिए। कितने उत्साह के साथ जमीन के अंदर गहराई में जड़ों को फैलाकर वह धरती में टिकी होती है। आपकी छत के ऊपर जरा-सी मिट्टी और थोड़ी नमी मिल जाए तो कोई घास खुद को वहां खड़ा करने की कोशिश करेगी। दो पत्ते पैदा करके सूर्य की ऊर्जा पाने की कोशिश करेगी। यह प्राणशक्ति ऊबना नहीं जानती।

मनुष्य के संकीर्ण मन में ही गुस्सा , झुंझलाहट और नाउम्मीदी पैदा होती है। खुद को ‘पस्त’ होने की इजाजत देने वाला प्राणी इंसान ही है। आपकी इच्छा के मुताबिक किसी ने व्यवहार नहीं किया। आपकी उम्मीद के अनुसार कोई काम नहीं हुआ। सरल शब्दों में कहें तो आपको जो हासिल हुआ है, उसे स्वीकार करने में असमर्थ होकर आप मन ही मन नफरत करते हैं, विरोध करते हैं।

मुझसे किसी ने पूछा, ‘हार को न झेल पाने की वजह से मन में निराशा और खीझ आने पर ही तो कामयाबी पाने की तड़प और आक्रोश पैदा होते हैं?’ हार से गुस्सा आएगा, निराशा आएगी और ये आपको उठाकर विजय के द्वार पर पहुंचा देगी, यह हास्यास्पद विचार है। तड़प के बल से भले ही आप जीत हासिल कर लें, लेकिन वह नाममात्र की जीत होगी। उससे आपकी कोई भलाई नहीं होगी।
पस्त होने के बाद आप चाहते हैं कि अगला आदमी आपके मन को समझे, दूसरे लोग आपके साथ बैठकर रोएं। कैसा पागलपन है ये? ऐसी उम्मीद करना कहां का न्याय है कि दुनिया आपका मन रखने के लिए अपने साथ ठगी करे? निराशा आत्मविश्वास को ध्वस्त कर देती है। हथियार लेकर बाहर से हमला करने वालों से तत्काल आफत आ सकती है। उसी समय सही रणनीति बनाकर उनसे निपटना भी आसान है। लेकिन मन की निराशा जो है, अंदर बैठी हुई वह आपको चीर-कुतरकर बरबाद करने वाले विषैले हथियार के समान है। खुद अपने ऊपर हमला करके खुद को नष्ट करने जैसी मूर्खता है यह।

एक बार शैतान ने अपने धंधे को समाप्त करने का फैसला किया। वह जिन औजारों का उपयोग करता था, उन्हें हाट पर बिक्री के लिए रख दिया। काम, क्रोध, अहंकार, गुस्सा , लालच, शत्रुता की भावना, व्यर्थ का दंभ- ऐसे कितने ही औजार फैलाकर रखे गए। लेकिन सिर्फ एक थैली खोले बिना बंद पड़ी थी।

‘उसमें क्या है?’ लोगों ने पूछा।

‘मेरे पास बहुत से औजार हैं, पर उन सभी में से ये सबसे शक्तिशाली है। अगर किसी दिन मुझे फिर से धंधे में लौटना होगा तो मुझे औजारों की जरुरत होगी। उस दिन ये औजार काम आएँगे।” शैतान ने कहा।

“ठीक है, तो फिर खोल कर दिखाओ। ”

‘ये जीवन के सार-तत्व को ही मिटाने की क्षमता रखते हैं। ये औजार कभी हारे नहीं हैं।’ शैतान ने थैली खोल दी। पता है, वे औज़ार कौन-कौन से थे? ऊब, गुस्सा, निराशा, विरक्ति… यही थे। कुछेक औजार आपने भी खरीदे होंगे। मुफ्त में मिल गए हों तो भी उन्हें फेंक डालिए।

माना कि आपने सफलता को लक्ष्य करके कड़ी मेहनत की, मगर नतीजा विपरीत हो गया। इसे लेकर किसलिए खीझना? तकलीफ किसलिए? पहली बात तो यह है कि जो परिणाम निकला, उससे हार मानने की कोई जरूरत नहीं है। हार मानकर मन में कुढ़ते रहना ही असली हार है। वह खुद को हराने का रास्ता खोल देगा।

दूसरों के साथ तुलना करके देखने पर दुख और रंज ज़्यादा या कम हो सकते हैं। क्या ये बाहर से आ रहे हैं? नहीं, आपके मन के अंदर ही पैदा होते हैं। मन जो है आप ही के पास है। उसे खुश रखना या मायूस रखना आपके ही हाथ में है। दुनिया को मेरे इच्छानुसार चलना चाहिए, लोगों को वैसे काम करना चाहिए जैसे मैं चाहता हूं, इस तरह का घमंड बेकार का बोझ है। उसे पैरों तले कुचलकर अगर आप आगे नहीं बढ़ेंगे तो जीवन के पथ पर आपका रखा हरेक कदम दुखदायी होगा। हर मोड़ पर भय लगेगा। आत्मविश्वास कम होकर निराशा छा जाएगी।

दुनिया पर गुस्सा मत कीजिए। ऐसा अनुभव कीजिए कि यह अपनी कमियों और खामियों को जानकर उन्हें दूर करने के लिए मिला हुआ एक अनोखा अवसर है। दर्द और तकलीफों से पूर्ण अनुभवों को ही अपने जीवन के सबक के रूप में स्वीकार करके खुद को परिपक्व बना लेने के लिए दिया गया अद्भुत वरदान है यह!

समझ लीजिए कि उम्मीदों को पालने से ही निराशा होती हैं। अहंकार का त्याग कर दीजिए। किसी भी परिणाम का एतराज किये बिना उसे स्वीकार करने की आदत डालिए। ऐसी योजना बनाइए कि विपरीत नतीजों को भी कैसे अपने अनुकूल बना लिया जाए। अनुभवों को अपने लिए सही रूप में बदल डालिए। मकसद में स्पष्टता और मन में शान्ति के साथ काम करते रहेंगे तभी मनचाही मंजिल को हासिल करना संभव होगा।


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