आध्यात्मिक खोज : 60 का दशक – आत्म खोज के लिए नशीली दवाओं का प्रयोग

आध्यात्मिक खोज : 60 का दशक - आत्मखोज के लिए नशीली दवाओं का प्रयोग

एक जिज्ञासु ‐ शेरिल सिमोन की बेचैनी भरी यात्रा के अनुभवों ने एक पुस्तक का रूप लिया – ‘मिड्नाइट विद द मिस्टिक’। इस स्तंभ में आप पढ़ रहे हैं उसी पुस्तक का हिंदी अनुवाद, एक धारावाहिक के रूप में। इस लेख में वे साठ के दशक के नशीली दवाओं के चलन की यादें हमसे साझा कर रहीं हैं।

यह साठ का दशक था। और शायद मैंने पहले बताया है कि मैं जिज्ञासापूर्ण ललक के साथ खोज रही थी। बुद्धि और संतृप्ति की खोज मेरे जीवन के रग-रग को छू रही थी। मैंने अपनी किशोरावस्था निरंतर प्रयोग और खोजबीन की तेज आपाधापी में बितायी।

कार से जाने पर हार्वर्ड विश्वविद्यालय से लेक्सिंग्टन 20 मिनट की दूरी पर है।

हमारी पीढ़ी को सच्चा रास्ता दिखानेवाला कोई नहीं था। हम शासन से जुड़े या तीस बरस से अधिक की उम्र वाले किसी भी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करते थे।
वहां उन दिनों तिमोथी लियरी और रिचर्ड अल्पर्ट (जो बाद में राम दास बन गये) प्रोफेसर थे और उन्होंने एलएसडी (एक तरह का नशा) के साथ प्रयोग करना शुरू किया था। फि र क्या था एलएसडी को हमारे स्कूल तक पहुंचने में देर नहीं लगी। हममें से बहुतों ने इसको आजमाना शुरू कर दिया। उन दिनों के मेरे एक गहरे दोस्त बैरी की एक बहन थी जो हार्वर्ड जाती थी, उसने अपने भाई को थोड़ी एलएसडी ला कर दी। उसने उसको आजमाया और खूब पसंद किया।

एसिड ट्रिप लेने की शुरुआत

वैसे रात की खबरों में एलएसडी को ले कर तरह-तरह की पागलपन करने वाले युवाओं के कई दर्दनाक-खौफ नाक किस्से सुर्खियों में होते थे, पर बैरी ने मुझे बताया कि यह मुझे समझ-बूझ की एक नयी ऊंचाई तक ले जायेगा। फि र क्या था विभ्रम पैदा करने वाली उस चीज को आजमाने में मैं उसके साथ हो ली।

मेरे घर के पास ही एक बड़ा मैदान था जहां मेरे स्कूल के ढेरों बच्चे मिल कर पार्टी किया करते थे। हमारी कार के स्टीरियो पर साज-ओ-संगीत गूंजता था। यह ‘एसिड ट्रिप’ लेने के लिए बिलकुल सही जगह थी। जैसे ही एलएसडी का मुझ पर असर हुआ मैंने अनुभव किया कि घास, आकाश और पेड़-पौधे, सब पर जीवन की रागिनी थी और वे सब एक तेज नूर से दमक रहे थे।

ग्रेड स्कूल की उस छोटी-सी लडक़ी के साथ शुरू हो कर, जिसको मैं जानती तक नहीं थी, मेरे मित्रों तक फैल कर, मेरे जवानी में घटित हुई मृत्यु की इन घटनाओं ने जीवन को पास से समझने की मेरी साधना को आगे बढ़ाया।
मानो हर वस्तु सब-कुछ एक साथ कर रही हो ‐- जीना, प्यार करना, हंसना, उडऩा, बिलखना और मरना। जिसको मैं ‘स्व’ समझती थी वह फैल कर धमाके के साथ ब्रह्मांड को अपने में समेट रहा था। विश्वास नहीं हो रहा था। बिना अनुशासन के इतना आंतरिक आनंद! क्या बात है! मैं खुश होने लगी कि कोई काम किये बिना मैं योगानंद की बतायी कुछ बातों का अनुभव कर रही हूं। क्या बात है! क्या किस्मत है! क्या शॉर्टकट है!

नशा उतरने पर आनंद भी चला गया

मैं हमेशा यह अनुभव करती रही थी कि मेरा कोई एक अंश मेरे जीवन जीने के ढंग का लगातार निरीक्षण कर रहा है। एलएसडी ट्रिप के दौरान मैं अपने उस अंश का यों अनुभव कर रही थी मानो वह मेरा वास्तविक आंतरिक ‘स्व’ हो। पर नशा उतरते ही यह अहसास भी छू हो जाता था। हर बार मेरे और मेरे मित्रों के साथ यही होता था। इस विराट चेतना में हमारा विस्तार होता था और फि र हम वापस इसी वास्तविकता में लौट आते थे।

वैसे रात की खबरों में एलएसडी को ले कर तरह-तरह की पागलपन करने वाले युवाओं के कई दर्दनाक-खौफ नाक किस्से सुर्खियों में होते थे, पर बैरी ने मुझे बताया कि यह मुझे समझ-बूझ की एक नयी ऊंचाई तक ले जायेगा।
मैं कुछ भी संभाल कर रख नहीं पाती थी, बुद्धि भी नहीं, और इस अनुभव से प्रेम या किसी स्थाई विस्तार का तो कोई सवाल ही नहीं था। बस यह केवल एक निराशा छोड़ जाती थी कि मैं जितना आम तौर पर अनुभव कर रही हूं जीवन सचमुच उससे बहुत-बहुत ज्यादा है। ऐसा क्यों था कि मैं एकात्मता, बिना-शर्त प्रेम और आंतरिक आनंद की झलक सिर्फ कुछ पल के लिए ले पा रही थी? इस बात ने मुझमें पहले से अधिक गहरी ललक और बेचैनी पैदा कर दी।

उस समय जब इतने सारे लोग जीवन का अर्थ ढूंढऩे में लगे थे, सब-कुछ इतना वास्तविक और गहरा लग रहा था। एक मिनट के लिए तो हम अजेय थे। हम दुनिया को बदल देने वाले थे! वे थे दीवानगी से भरी बेचैनी के दिन, बेफि क्री के दिन, जब हम सब-कुछ अलग और बेहतर कर डालने की युवा ललक से लैस थे। तब शांति थी, प्रेम था, शानदार गीत-संगीत था, नाच-गाना था और था सडक़ों पर गुस्सा और विरोध। इतना बढिय़ा खुशियों-भरा मौसम, इतने सारे लोग, होशियार-बेदार, हर समय जीवन को पल-पल पूरा जीते हुए।

पर साथ ही हमारे चारों ओर लोग मौत को प्यारे हो रहे थे!

एक तरफ हम शांति की मांग करने के लिए फौजियों के राइफ लों में डेजी फूल लगा रहे थे तो दूसरी तरफ हम टीवी पर शहीद फौजियों की शवपेटिकाओं के आने के चित्र देख रहे थे। हमने अपनी आंखों से वियतनाम के युद्ध में दोनों तरफ के लोगों को मरते हुए देखा। हमने इतिहास बनते हुए देखा। हमारे पैरों तले की जमीन खिसक गयी थी।

बिना अनुशासन के इतना आंतरिक आनंद! क्या बात है! मैं खुश होने लगी कि कोई काम किये बिना मैं योगानंद की बतायी कुछ बातों का अनुभव कर रही हूं।
देश में हमारे मित्र नशीली दवाओं की लत के मारे या फि र संयोग से या जानबूझ कर अधिक मात्रा में नशीली दवा लेकर मर रहे थे। योग्य युवा कारों और मोटरसाइकिलों को इतना तेज और खतरनाक ढंग से दौड़ा रहे थे मानो मौत उनको कभी छू ही नहीं सकती, लेकिन वे दुर्घटनाओं में उतनी ही तेजी से मरते जा रहे थे। कितना दर्दनाक था इतना सब खो देना!

बैरी बहुत स्मार्ट था और हमेशा कुछ नया सीखने की धुन में लगा रहता था। उसके पिता हार्वर्ड में प्रोफेसर थे। मेरी जान-पहचान में बैरी ही अकेला ऐसा था जो मजे के लिए कुछ और करने के बजाय एन्साइक्लोपीडिया उठा कर पढऩे लगता था। उसको हर विषय में दिलचस्पी थी। लेकिन साथ ही उसके व्यक्तित्व का एक लापरवाह पहलू भी था। मैं हमेशा सोचती रहती थी कि आगे चल कर इसका क्या होगा!

नशीली दवाओं का अत्यधिक सेवन बना मौत का कारण

एक दिन वह और एक दूसरा मित्र माइक, जिनके बारे में कहा जाता था कि स्कूल में किसी भी दूसरे छात्र से उनका आईक्यू सबसे अधिक है, इस बात पर बहस कर रहे थे कि उनमें से अधिक स्मार्ट कौन है। वे एक-दूसरे से एक या दो आईक्यू पॉइंट ऊपर-नीचे माने जाते थे और उस तेज-तर्रार समूह में उनको लग रहा था कि यह बहुत बड़ी बात है। उन दोनों ने मुझसे पूछा कि उनमें अधिक स्मार्ट कौन है। मैं माइक को बरसों से जानती थी पर मेरा बॉयफ्रेंड होने के नाते बैरी ने बेफि क्री से सोच लिया कि मैं उसका पक्ष लूंगी।

मैंने यह कह कर उसको जोर का झटका दिया, ‘बैरी, स्पष्ट है माइक तुमसे अधिक स्मार्ट है!’

मेरी बात सुन कर वह चौंक गया। ‘क्या!! ये तुम कह रही हो! तुम तो मुझे अच्छी तरह जानती हो।

मृत्यु का महत्व और उसका अवश्यंभावी होना अक्सर मेरे विचारों में होता जिसके कारण मेरी साधना जारी रही।
तुम जानती हो मैं कितना स्मार्ट हूं। अगर कोई जानता है कि मैं कितना स्मार्ट हूं तो वो तुम हो।’

‘हां,’ मैंने कहा, और इसीलिए नि:संदेह मैं जानती हूं कि माइक तुमसे अधिक स्मार्ट है। माइक अवश्य कुछ बन कर दिखायेगा और मैं जो तुम्हारे बारे में जानती हूं वो ये है कि तुम शायद खुद को बर्बाद कर लोगे।’

हमारी दोस्ती टूटने के बाद भी बैरी और मैं दोस्त बने रहे, अक्सर टेलीफोन पर बातें करते रहे और जब तक मैं कॉलेज में रही वह मुझे चिट्ठियाँ लिखता रहा। लेकिन बाद में मैं उससे दूर रहने लगी। मैं नशीली दवाओं से बिलकुल दूर रहना चाहती थी। मैं जानती थी कि अगर मैंने अपना जीवन नहीं बदला तो स्वयं को नष्ट कर लूंगी।

मैं नहीं जानती कि माइक का क्या हुआ लेकिन बैरी पच्चीस बरस की उम्र में बड़ी मात्रा में नशीली दवा लेने के कारण मरा पाया गया। कुछ बरस पहले उसकी बहन ने आत्महत्या कर ली थी। जब मैंने उसकी बहन का समाचार सुना तो मैं अंदर तक हिल गयी।

मेरे घर के पास ही एक बड़ा मैदान था जहां मेरे स्कूल के ढेरों बच्चे मिल कर पार्टी किया करते थे। हमारी कार के स्टीरियो पर साज-ओ-संगीत गूंजता था। यह ‘एसिड ट्रिप’ लेने के लिए बिलकुल सही जगह थी।
मैं उसके लिए बहुत तड़पी और इस चिंता में डूब गयी कि बैरी पर इसका क्या असर होगा! जब बैरी की मृत्यु हुई तो मुझे लगा, काश! मैं या कोई और कुछ कर पाते! मुझे बड़ी आशा थी कि वह जिस गलत रास्ते पर जा रहा था वहां से किसी तरह बाहर निकल आयेगा। जो नशीली दवाएं मौज-मस्ती के लिए शुरू हुई थीं वे जानलेवा बन गयी थीं। उन दोनों को परिपूर्ण और गुणी जीवन मिला था, पर उन्होंने इतनी कच्ची उम्र में उसको गवां दिया! उनके मां-बाप के बारे में सोच कर मेरा दिल रो पड़ा। उन्होंने अपने दोनों बच्चे खो दिये थे। यह मेरी समझ के बिलकुल बाहर था कि वे बेचारे इतनी दर्दनाक बेमानी मौत को कैसे सह पा रहे होंगे! बैरी की मृत्यु के समय मैं तीन साल के एक बच्चे की मां बन चुकी थी और यह सोच भी नहीं पा रही थी कि बैरी की मां अपने बच्चों को खो देने के बाद कैसे जिंदा रह पा रही होंगी!

एक के बाद एक मृत्यु की घटनाएँ

ग्रेड स्कूल की उस छोटी-सी लडक़ी के साथ शुरू हो कर, जिसको मैं जानती तक नहीं थी, मेरे मित्रों तक फैल कर, मेरे जवानी में घटित हुई मृत्यु की इन घटनाओं ने जीवन को पास से समझने की मेरी साधना को आगे बढ़ाया।

हमने अपनी आंखों से वियतनाम के युद्ध में दोनों तरफ के लोगों को मरते हुए देखा। हमने इतिहास बनते हुए देखा। हमारे पैरों तले की जमीन खिसक गयी थी।
मैं यह भी जान गयी कि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि मृत्यु किसी भी समय मुझे और मेरे करीबी प्रियजनों को घेर सकती है। मृत्यु का महत्व और उसका अवश्यंभावी होना अक्सर मेरे विचारों में होता जिसके कारण मेरी साधना जारी रही।

हमारी पीढ़ी को सच्चा रास्ता दिखानेवाला कोई नहीं था। हम शासन से जुड़े या तीस बरस से अधिक की उम्र वाले किसी भी व्यक्ति पर विश्वास नहीं करते थे। मैं सोचती हूं कि उस समय बेकाबू और छितरा हुआ यौवन का वह जोर हमारे और दुनिया के भीतर एक गहरा और टिकाऊ रूपांतरण कर सकता था, यदि उस ऊर्जा को सही रचनात्मक रास्ते पर ले जाने में मदद करनेवाला सही नेतृत्व और मार्गदर्शन हमें मिल पाता।


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