आप वही करें जिसे आप सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं

आप वही करें जिसे आप सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं

सद्‌गुरुसद्‌गुरु हमें बता रहे हैं कि अगर आप वो नहीं करते जो आपको सबसे महत्वपूर्ण लगता है तो आपका जीवन व्यर्थ है। ऐसा करने पर आपको ये सोचना नहीं होगा कि आपने जीवन ठीक से जीया या नहीं।

प्रश्न : नमस्कार सद्‌गुरु। मेरी इच्छा है कि मैं आपके लक्ष्य और स्वप्न का हिस्सा बनूं और जैसा कि आप कहते हैं इस तरह से अपने जीवन को पूर्ण कर लूं। ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ का जो हम जाप करते हैं, मैं चाहता हूं कि वह हकीकत बन जाए। लेकिन कहीं न कहीं मेरे भीतर एक डर है कि मैं इस रास्ते पर अंत तक नहीं चल सकूंगा। यही चीज मुझे कदम उठाने से रोकती है। मैं इस डर पर कैसे काबू पा सकता हूं?

सद्‌गुरु : मैं आपको यकीन दिला सकता हूं कि जब हमारा लक्ष्य इतना बड़ा हो कि हम पूरी दुनिया को आनंदमय बनाना चाहते हों, तो हम लक्ष्य के अंत तक नहीं पहुंच पाएंगे, हम सभी बीच रास्ते में ही मर जाएंगे। इसलिए अंत तक जाने को लेकर चिंता न करें। क्या आपको लगता है कि आप ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ का जाप करते हैं, इसलिए कल पूरी दुनिया सुखी हो जाएगी? पच्चीस साल की उम्र में जब मैं पहली बार आनंद से सराबोर हुआ था, तो मैंने भी सोचा था कि मैं पूरी दुनिया को आनंदमय बना दूंगा और हर कोई अपनी भलाई के लिए कुछ न कुछ करने को तैयार होगा। यह तीन दशक पहले की बात है। अब मुझे पता है कि यहां कितने सारे लोग ऐसे हैं, जो आत्महंता हैं, खुद ही अपना विध्वंस करने को तैयार हैं।

कुछ ऐसा करें जिसकी आप परवाह करते हों

हमने लाखों लोगों के जीवन को बदला है, फिर भी यह पूरी दुनिया तो नहीं है। मैं कहना चाहूंगा कि आप किसी भी हालत में वह सब मत कीजिए जिसकी मैं परवाह करता हूं।

मेरे लिए असली काम वे हैं जो दुनिया की जरूरतों के हिसाब से हों। नहीं तो जब मैं अकेला होता हूं तो मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ हालत में होता हूं।
आप वह कीजिए जिसकी आप परवाह करते हों। अगर आप वह सब नहीं करेंगे, जिसकी आप परवाह करते हैं, तो आपको यह देखने के लिए जीवन के अंत तक इंतजार नहीं करना होगा कि आपने सही से जीवन जिया या नहीं। अगर आपने ऐसा नहीं किया तो आपका जीवन तो यूं ही व्यर्थ है। इसलिए आपको जो काम महत्वपूर्ण लगता है, आपको वही करना चाहिए। दरअसल मैं जिस तरह से बना हूं, हो सकता है किसी दिन मैं अपनी आंखें बंद करूं, तो उन्हें फिर खोलूं ही नहीं। मेरे लिए असली काम वे हैं जो दुनिया की जरूरतों के हिसाब से हों। नहीं तो जब मैं अकेला होता हूं तो मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ हालत में होता हूं। तो मैं लोगों के साथ क्यों रहना चाहता हूं? मैं कुछ क्यों करना चाहता हूं? करने को बहुत कुछ है इसलिए हम बीस घंटे काम कर रहे हैं। जब मैं सुबह जागता हूं तो कोई न कोई पहले से ही किसी काम को लेकर इंतजार कर रहा होता है।

कुछ बनना पहले और काम बाद में होने चाहिएं

ये सब कार्य इसलिए नहीं हैं कि मुझे ये सब करने की जरूरत है। अगर आप मुझे बिना किसी कार्य के अकेले छोड़ दें, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है। मुझे एक शब्द भी नहीं कहना है।

ज्यादातर मनोवैज्ञानिक दिक्कतें इसी गलती की वजह से पैदा होती हैं कि इस दुनिया में लोग कुछ बनने के लिए कुछ करते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि पहले कुछ बनिए, फिर कुछ कीजिए।
मुझे एक शब्द भी नहीं लिखना है। मुझे कुछ भी नहीं करना है। लेकिन अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है, इसलिए काम करने की जरूरत है। कार्य कभी भी अपने बारे में नहीं होना चाहिए। आप अभी कैसे हैं – यह आपसे जुड़ा मुद्दा है। लेकिन आपके कार्य उन परिस्थितियों से संबंधित होने चाहिए जिनमें आप रहते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से बहुत सारे लोगों के लिए उनके कार्य सिर्फ  उनके लिए ही होते हैं। वे दुनिया में तमाम चीजें करते हैं क्योंकि वे अपने आप को कुछ बनाना चाहते हैं। यह गलत सोच है। ज्यादातर मनोवैज्ञानिक दिक्कतें इसी गलती की वजह से पैदा होती हैं कि इस दुनिया में लोग कुछ बनने के लिए कुछ करते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि पहले कुछ बनिए, फिर कुछ कीजिए। अगर आप इसके अनुसार चलते हैं, तो जो होगा, अच्छा ही होगा।

गलत कारणों से कार्य से न जुड़ें

करीब तीन दशक पहले, जब मैंने शिक्षण का काम शुरू किया था, तब भी मैं मूल रूप से वही बातें कहता था जो आज कहता हूं। कहने का तरीका थोड़ा अलग हो सकता है।

ऐसा सिर्फ  इसलिए है कि हम लोग अब मशहूर हो गए हैं। इसी वजह से वे भी अब इसका हिस्सा बनना चाहते हैं। आप ऐसे मत बनिए।
लेकिन पहले बीस सालों के दौरान हम जहां कहीं भी गए, हमें बड़े स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ा। जबकि आज हर कोई तालियां बजा रहा है। ऐसा इसलिए नहीं है कि उन्हें यह समझ आ गया है कि मैं कौन हूं, बल्कि इसकी वजह यह है कि हम दुनिया भर में कामयाब हो गए हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता है। जिन लोगों ने कभी हमारे खिलाफ  अभियान चलाए थे, आज वही लोग अपने अखबार या मैगजीन में हमारा इंटरव्यू छापने को लेकर आतुर रहते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि उन्हें हमारे काम की अहमियत समझ आ गई है। ऐसा सिर्फ इसलिए है कि हम लोग अब मशहूर हो गए हैं। इसी वजह से वे भी अब इसका हिस्सा बनना चाहते हैं। आप ऐसे मत बनिए।

आपके कार्य आपको संतुष्ट करने के लिए नहीं होने चाहिएं

अगर आप इस काम की अहमियत समझते हैं, अगर आपको लगता है कि यह सब किया जाना चाहिए, तो आपको करना चाहिए। कैसे और किस स्तर पर आप काम करते हैं, यह आप पर निर्भर है।

शुरुआती दिनों में जब हमने नब्बे दिनों का कार्यक्रम किया था, तो हमारे पास केवल छप्पर की छत और टीन का शेड था, जिसके नीचे एक महिला सत्तर से ज्यादा लोगों के लिए भोजन बना रही होती थी।
अगर रूपांतरण लाने के लिए हर कोई अपने तरीके से कोशिशें करे तो यह उसकी अपनी संतुष्टि के लिए होगा। अगर आप सचमुच एक बदलाव लाना चाहते हैं, तो हम सबको मिल कर पूरी दुनिया की सफ ाई करनी होगी। लेकिन आपका कार्य आपको संतुष्ट या पूर्ण करने के लिए नहीं होना चाहिए। मैं संतुष्ट हूं, इसलिए मैं ऐसे काम करता हूं। कोई भी काम इसलिए कीजिए कि उसको किए जाने की जरूरत है, इसलिए नहीं कि आप उसे करना चाहते हैं। अगर किसी काम को किए जाने की जरूरत है तो हर जिम्मेदार नागरिक को खड़ा होना चाहिए और उस काम को करना चाहिए। यह कोई मिशन नहीं है। यह आपकी मानवता की अभिव्यक्ति है। इस तरह की गतिविधियों की खूबसूरती यह है कि ये जबर्दस्त तरीके से आपका विस्तार भी करती हैं। आज ईशा फाउंडेशन अच्छी तरह से स्थापित है। शुरुआती दिनों में जब हमने नब्बे दिनों का कार्यक्रम किया था, तो हमारे पास केवल छप्पर की छत और टीन का शेड था, जिसके नीचे एक महिला सत्तर से ज्यादा लोगों के लिए भोजन बना रही होती थी। इसके अलावा हमारे पास दो कच्चे बाथरूम थे और एक कमरा था, जहां मैं अपना साजोसामान रखता था। जब हमें ध्यानलिंग बनाने की जरूरत महसूस हुई तो हमारे पास पैसा नहीं था। ऐसे में लोगों ने अपनी किडनी बेचकर हमें पैसा देने की पेशकश की। उन्हें यह भी नहीं पता था कि यह किस तरह का मंदिर होगा। इसके बावजूद इसके लिए अपने शरीर के एक हिस्से को बेचने के लिए वे तैयार थे। मैंने उन्हें ऐसा करने से रोका।

अब हमारी पहचान देश के साथ-साथ विदेशों में भी बन गई है। हम जहां भी जाते हैं, हमें जबर्दस्त मदद मिलती है। अब यह कोई जोखिम भरा काम नहीं है। आपको सिर्फ अपनी भीतरी समस्याओं को संभालना है, बाहरी चीजें तो अच्छी तरह से संभल गई हैं। हम जानबूझकर यह सब सादगी से रख रहे हैं। हम इसे ताबूत की तरह नहीं बनाना चाहते। हम चाहते हैं कि आप प्रकृति का अनुभव करें। हम चाहते हैं कि आप अपने आसपास के जीवन को अनुभव करें और सक्रिय रहें। क्या यह आराम से होगा? मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि ऐसा न हो। लेकिन क्या यह संतुष्टिदायक होगा? बिल्कुल, सौ फीसदी।


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