सम्यमा ध्यान: आनंद के वो आठ दिन

सम्यमा ध्यान: आनंद के वो आठ दिन

भीतरी आनंद और तृप्ति पाने का एक आमंत्रण है सम्‍यमा। यह आठ दिन का एकआवासीय कार्यक्रम है, जो सद्‌गुरु द्वारा ईशा योग केंद्र में कराया जाता है। सम्‍यमा ध्यान में लोगों को ऐसे अनुभव होते हैं, जिनसे शरीर और मन शुद्ध होकर ऊर्जा के नए स्तरों को ग्रहण करने के काबिल हो जाते हैं। यह कार्यक्रम ध्यान, मौन और आनंद की नई ऊंचाईयों को छूने का एक अद्भुत अवसर है।

”सम्‍यमा आपको जागरूकता के एक नये आयाम में प्रवेश दिलवाता है, जहाँ आपको यह स्पष्ट अनुभव होता है, जहाँ आप इससे भली-भांति अवगत होते हैं कि आप यह शरीर नहीं हैं, आप यह मन नहीं हैं, आप यह जगत नहीं हैं।“ – सद्‌गुरु

 

सम्‍यमा: एक अनुभव

‘मुझे याद है कि मैं पहली बार फरवरी 2008 में सम्‍यमा के लिए आश्रम गई थी। उस समय यही वो एक चीज थी, जिसके बारे में हमेशा सोचा करती। मैं सांसारिकता से परे और अपने तर्कों से आगे जाकर कुछ जानने और अनुभव करने के लिए बहुत उत्सुक थी। तब मेरे लिए हर चीज गौण हो रही थी। हालांकि तब तक मुझे इस कार्यक्रम के बारे में सिर्फ इतना पता था कि इसमें सबको पूरी तरह से मौन रहना पड़ता है।लेकिन मैं इतना जरूर जानती थी कि यह जीवनकाल में आने वाला एक बहुत ही विशेष मौका होगा, जहां मुझे अपने गुरु की कृपा में रहने का मौका मिलेगा।

लेकिन सम्‍यमा में कोई इंसान जिस तरह से जिंदगी को अनुभव करता है, वैसा मैंने जिंदगी को इससे पहले कभी अनुभव नहीं किया था।
मुझे नहीं पता कि इसके बारे में क्या कहूं? सच पूछिए तो सम्‍यमा अपने आप में एक अलग ही दुनिया है। मेरे कहने का मतलब कतई यह नहीं है कि इसमें आपको किसी दूसरी दुनिया में ले जाया जाता है।लेकिन सम्‍यमा में कोई इंसान जिस तरह से जिंदगी को अनुभव करता है, वैसा मैंने जिंदगी को इससे पहले कभी अनुभव नहीं किया था। उन आठ दिनों में- भरपूर कोशिशें थीं, पीड़ा और आह्लाद था, प्रतिरोध और समर्पण था, जिसने मुझे अंतत: मौन की गहन अवस्था में ला खड़ा किया। यह मौन कोई महज चुप्पी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा मौन था जो शब्दों से परे था। इसने मुझे पूरी तरह से आंनदमय बना दिया। इसने मुझे अपने मानसिक संदेहों से, अपनी शारीरिक विवशताओं से और दुनिया के खिंचावों से अलग कर दिया। इसमें मुझे अपने गुरु की कृपा का अनुभव हुआ। उन्होंने मेरे भीतर सम्‍यमा का बीज बोया और अब मेरे ऊपर इसकी देखभाल और इसे खिलाने की जिम्मेदारी है। अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे सामने जिंदगी की कितनी मुश्किल परिस्थितियां आती हैं, कितनी चुनौतियां आती हैं, मुझे सिर्फ  इतना पता है कि जब तक मैं सम्‍यमा का अभ्यास करती रहूंगी, कोई भी चीज मुझे छू नहीं सकती। यह मुझे अपने आस-पास की हर चीज से जोड़ता है। इससे ‘मेरा क्या होगा?’जैसा तुच्छ विचार मेरे भीतर से गायब हो जाता है, और मैं खुद को इस पूरी कुदरत के एक अंश के रूप में देख सकती हूं। यह अपने आप में एक मुक्ति प्रदान करने वाला और ताजगी भरा अनुभव है।

मुझे सिर्फ इतना पता है कि जब तक मैं सम्‍यमा का अभ्यास करती रहूंगी, कोई भी चीज मुझे छू नहीं सकती।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब वापस घर गई तो मैंने महसूस किया कि मेरे भीतर बहुत सारे बदलाव आ गए हैं। ये बदलाव मेरे रिश्तों और जीवन के अन्य बहुत से पहलुओं में आये थे। मैं अब हर तरह की परिस्थिति का सामना करने को तैयार थी। मेरे भीतर सम्‍यमा के चलते एक खास तरह की ताकत और स्पष्टता आई। अगर ऐसा न हुआ होता, तो शायद पिछले कुछ सालों में घटी तमाम घटनाओं के चलते, मेरा जीवन कब का पूरी तरह से बिखर चुका होता। इन सबके अलावा, सम्‍यमा मेरे लिए अपने साथ हर पल रहने की एक संभावना है और इससे बढक़र शायद ही मैं अपने लिए कुछ और मांग पाती।’

– नवकिरण, पटियाला।


संबन्धित पोस्ट


Type in below box in English and press Convert